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जब इसी महीने की शुरुआत में मुंबई के एक स्टार्टअप ने अपने नए इंटर्न का परिचय कराया, तो सोशल मीडिया को उम्मीद थी कि कोई कॉलेज पास आउट फ्रेशर सामने आएगा. लेकिन सबके सामने आया एक 64 साल का बुजुर्ग!
‘हॉबी ट्राइब’ के फाउंडर जोशुआ सालिंस द्वारा शेयर किया गया यह वीडियो देखते ही देखते वायरल हो गया. वीडियो में यह सीनियर इंटर्न अपने से कई दशक छोटे सहकर्मियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करता नजर आ रहा है. खास बात यह है कि उन्हें वहां सिर्फ एक अजूबे या ‘कौतूहल’ के तौर पर नहीं देखा गया, बल्कि कंपनी को खड़ा करने और उसे स्केल करने के उनके “अनमोल ज्ञान” के लिए टीम ने उनकी जमकर तारीफ की. वे टीम के वर्क कल्चर को भी संवार रहे हैं.
सोशल मीडिया पर कमेंट्स की बाढ़ आ गई. कई लोगों ने उनकी तुलना हॉलीवुड फिल्म ‘द इंटर्न’ में रॉबर्ट डी नीरो के मशहूर किरदार से कर दी. कुछ लोगों ने लिखा कि ‘सीखने की ललक और जिज्ञासा कभी 60 की उम्र में रिटायर नहीं होती.’ ज्यादातर यूजर्स का कहना था कि रिटायरमेंट की एज को फिक्स मत करो.
यह कहानी दिल को छू लेने वाली तो है ही, लेकिन इसने देश के सामने एक बड़ा और गंभीर सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या भारत अपने लाखों सक्षम और अनुभवी लोगों को उस वक्त जबरन रिटायर कर रहा है, जब वे देश और इंडस्ट्री को बहुत कुछ देने की स्थिति में हैं?
लंबी जिंदगी, लेकिन छोटे होते करियर
पीढ़ियों से हमारे यहां 58 या 60 साल की उम्र को करियर की स्वाभाविक फिनिश लाइन (आखिरी छोर) मान लिया गया था. यह तब सही भी था जब औसत लाइफ एक्सपेक्टेंसी ककम थी और शारीरिक मेहनत वाले जॉब्स ज्यादा हुआ करते थे. लेकिन अब दुनिया बदल चुकी है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, साल 2000 के बाद से वैश्विक औसत जीवन प्रत्याशा में 6 साल से अधिक की बढ़ोतरी हुई है. वहीं, 60 साल और उससे अधिक उम्र के लोगों की आबादी 2020 के 1 अरब से दोगुनी होकर 2050 तक 2.1 अरब होने की उम्मीद है. लोग न सिर्फ लंबा जी रहे हैं, बल्कि वे इन अतिरिक्त सालों में कहीं ज्यादा स्वस्थ और एक्टिव भी हैं.
भारत में भी औसत जीवन प्रत्याशा पिछले कुछ दशकों में तेजी से बढ़कर 70 वर्ष को पार कर चुकी है. ऐसे में आज जो व्यक्ति 60 साल की उम्र में रिटायर हो रहा है, उसके पास स्वस्थ और उत्पादक जीवन के कम से कम दो दशक (20 साल) और बचे होते हैं. इसके बावजूद, नॉलेज सेक्टर्स (Knowledge Workers) में भी 60 की उम्र को एक ‘फुल स्टॉप’ की तरह देखा जाता है.
एक तरफ भारत अक्सर स्किल्ड प्रोफेशनल्स की कमी और अनुभवी लीडरशिप की जरूरत का रोना रोता है, वहीं दूसरी तरफ हर साल दशकों का अनुभव रखने वाले हजारों बेहतरीन दिमाग सिर्फ इसलिए वर्कफोर्स से बाहर कर दिए जाते हैं क्योंकि वे एक तय उम्र तक पहुंच चुके हैं. आज जब कंपनियों को मेंटर्स, कंसल्टेंट्स और स्पेशलाइज्ड टैलेंट की तलाश है, तब देश का यह ‘सिल्वर वर्कफोर्स’ (बुजुर्गों की कार्यबल आबादी) सबसे कम इस्तेमाल होने वाला रिसोर्स बना हुआ है.
‘केरियरनेट’ के चीफ बिजनेस ऑफिसर नीलाभ शुक्ला कहते हैं कि भारत के प्रोफेशनल वर्कफोर्स का एक बहुत बड़ा हिस्सा 60 साल की उम्र पार करने के बाद भी बौद्धिक रूप से पूरी तरह सक्रिय रहता है. 60 की उम्र में रिटायरमेंट का नियम किसी और दौर में बना था. आज की नॉलेज इकोनॉमी में काम करने की क्षमता उम्र पर नहीं, बल्कि आपकी अनुकूलनशीलता (Adaptability), स्किल्स और एक्सपीरियंस पर निर्भर करती है.
क्यों हो रहा ‘सिल्वर गैप’?
सीनियर प्रोफेशनल्स में काम करने की डिमांड पहले से ही मौजूद है, लेकिन सिस्टम में उनके लिए जगह नहीं है. ‘केरियरनेट’ के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 73% बुजुर्ग प्रोफेशनल्स रिटायरमेंट के बाद भी काम जारी रखना चाहते हैं. लेकिन इनमें से सिर्फ 23.1% बुजुर्गों को ही वास्तव में दोबारा काम मिल पाता है.
नीलाभ शुक्ला आगे कहते हैं कि ये बाधाएं ढांचागत (Structural) भी हैं और सांस्कृतिक (Cultural) भी. देश का एक बहुत बड़ा, अनुभवी और इच्छुक टैलेंट पूल आज अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि इसलिए घर बैठा है क्योंकि हमारा सिस्टम उन्हें दोबारा वर्कफोर्स में बनाए रखने के लिए डिजाइन ही नहीं किया गया है.
‘ट्रू बैलेंस’ के सीएचआरओ (CHRO) गौरव शर्मा भी इस बात से सहमत हैं कि कंपनियां अभी भी रिटायरमेंट को करियर का अंत मानती हैं, बदलाव नहीं. वे कहते हैं कि ज्यादातर संस्थान रिटायरमेंट को औपचारिक योगदान का ‘एंड पॉइंट’ मान लेते हैं, जबकि इसे प्रोजेक्ट-बेस्ड, एडवाइजरी या कोचिंग रोल्स में बदलने के एक ट्रांजिशन (बदलाव) के रूप में देखा जाना चाहिए. वर्तमान में रिटायर्ड प्रोफेशनल्स को सिर्फ फ्रीलांसिंग या छोटे-मोटे कंसल्टेंसी असाइनमेंट तक सीमित कर दिया जाता है, जिससे उनके असली टैलेंट का एक छोटा हिस्सा ही इस्तेमाल हो पाता है.
वो अनुभव, जो कोई ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट नहीं सिखा सकता
अक्सर कहा जाता है कि अनुभव खरीदा नहीं जा सकता और न ही सिखाया जा सकता है. गौरव शर्मा के मुताबिक, इस अनुभव का असली मतलब है कि दशकों के वास्तविक संकटों से जूझकर हासिल की गई ‘सटीक निर्णय क्षमता’ (Judgement).
वे कहते हैं कि 60 की उम्र पार कर चुके प्रोफेशनल्स के पास जो तजुर्बा होता है, उसकी नकल किसी फॉर्मल ट्रेनिंग से नहीं की जा सकती. उनके पास एक लॉन्ग-टर्म विजन होता है, मुश्किल हालातों में बिखरने के बजाय टिकने का हौसला (Resilience) होता है. वे शानदार मेंटर्स साबित होते हैं जो कंपनियों में सही फैसले लेने, संस्थागत ज्ञान (Institutional Knowledge) को अगली पीढ़ी में ट्रांसफर करने और भविष्य के लीडर्स तैयार करने में मदद करते हैं.
एआई (AI) के इस मौजूदा दौर में इस तजुर्बे की कीमत और बढ़ गई है. लिंक्डइन की 2026 की लेबर मार्केट रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर की 75% कंपनियों का मानना है कि AI के आने के बाद ‘पीपल स्किल्स’ (बातचीत और व्यवहार की कला) और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई हैं. टेक्निकल स्किल्स सीखी जा सकती हैं, लेकिन चार दशकों में कमाया गया तजुर्बा और जजमेंट एआई से नहीं आता.
गौरव शर्मा के मुताबिक, सीनियर प्रोफेशनल्स के पास एक और खूबी होती है जिसे कंपनियां अक्सर कम आंकती हैं, ‘पैटर्न रिकग्निशन’. यानी संकट को पहले ही भांप लेने की कला. वे दबाव में भी संतुलित फैसले ले सकते हैं क्योंकि उन्होंने अपने करियर में कई आर्थिक मंदी, कंपनियों के उतार-चढ़ाव और मार्केट शिफ्ट्स को बहुत करीब से देखा होता है. उनके पास जो रिलेशनशिप कैपिटल (नेटवर्क) और क्रेडिबिलिटी होती है, उसे कोई भी ऑनबोर्डिंग प्रोग्राम रिप्लेस नहीं कर सकता. युवा कर्मचारी फ्रेश आइडिया और तेजी से सीखने की क्षमता लाते हैं, जबकि सीनियर प्रोफेशनल्स उन्हें सही कॉन्टेक्स्ट (संदर्भ) देते हैं. एक मजबूत कंपनी को दोनों की जरूरत होती है.
रिटायरमेंट सिर्फ पैसों का मामला नहीं है!
बहुत से लोगों के लिए नौकरी या काम सिर्फ हर महीने आने वाली सैलरी का जरिया नहीं होता. यह उनके जीवन को एक रूटीन, एक मकसद, दोस्त और हर सुबह उठने की एक वजह देता है.
दुनिया भर के शोध बताते हैं कि अचानक और बिना मर्जी के होने वाला रिटायरमेंट लोगों को डिप्रेशन (अवसाद), अकेलेपन, याददाश्त की कमजोरी (Cognitive Decline) और खराब शारीरिक स्वास्थ्य की ओर धकेलता है. काम छूटने के बाद रोजमर्रा के अनुशासन और सोशल लाइफ का अचानक खत्म हो जाना कई लोगों के लिए बर्दाश्त करना मुश्किल होता है.
गौरव शर्मा कहते हैं कि रिटायर्ड प्रोफेशनल्स को एक साथ कई मोर्चों पर लड़ना पड़ता है. एक तरफ बढ़ती स्वास्थ्य लागत और फिक्स सेविंग्स की चिंता, तो दूसरी तरफ ‘रिटायरमेंट से जुड़ा डिप्रेशन’. ऐसे में सेकंड करियर, मेंटरिंग रोल्स या प्रोजेक्ट-बेस्ड काम सिर्फ कमाई का साधन नहीं हैं; ये बुजुर्गों को समाज से जोड़े रखने, उनका आत्मविश्वास बनाए रखने और जीवन को एक सार्थक मकसद देने का जरिया बनते हैं.
‘सेकंड करियर’ का उभरता नया दौर
अब रिटायरमेंट को करियर के अंत के बजाय एक नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है. वैश्विक स्तर पर ‘सेकंड करियर’ का यह ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है. अमेरिका के एक सर्वे (AIER) के अनुसार, लाखों लोगों ने 45 साल की उम्र के बाद अपना करियर बदला और उनमें से 10 में से 6 लोगों का कहना था कि इस बदलाव ने उन्हें सिर्फ पैसा कमाने के बजाय आखिरकार अपने ‘पैशन’ (जुनून) को जीने का मौका दिया.
आज के बुजुर्ग रिटायरमेंट के बाद वही पुरानी घिसी-पिटी नौकरी नहीं करना चाहते. वे नए शॉर्ट-टर्म कोर्सेज कर रहे हैं, नई डिजिटल स्किल्स सीख रहे हैं और कंसल्टिंग या एंटरप्रेन्योरशिप (स्टार्टअप) के क्षेत्र में उतर रहे हैं.
भारत में भी इसके लिए सारे जरूरी इनग्रेडिएंट्स मौजूद हैं. ऑनलाइन लर्निंग, इंडस्ट्री सर्टिफिकेशंस और टारगेटेड स्किलिंग प्रोग्राम्स के जरिए अनुभवी प्रोफेशनल्स अपनी डिजिटल स्किल्स को अपग्रेड कर रहे हैं. वे ऑपरेशनल भूमिकाओं से निकलकर कंसल्टिंग, मेंटरिंग, कोचिंग और एडवाइजरी वर्क की तरफ बढ़ रहे हैं. नीलभ शुक्ला के मुताबिक, हेल्थकेयर लीडरशिप, फाइनेंशियल सर्विसेज, कॉर्पोरेट गवर्नेंस और स्ट्रैटेजिक टेक्नोलॉजी रोल्स में इन अनुभवी दिग्गजों की डिमांड तेजी से बढ़ रही है. बस जरूरत है तो इस टैलेंट को सही रास्ता दिखाने वाले एक औपचारिक इंफ्रास्ट्रक्चर (Formal Infrastructure) की.
‘सिल्वर वर्कफोर्स’ को आर्थिक ताकत कैसे बनाएं?
यह सिर्फ एक सामाजिक सरोकार का मुद्दा नहीं है, बल्कि एक बड़ा आर्थिक अवसर है. जापान और सिंगापुर जैसे देश, जहां बुजुर्गों की आबादी तेजी से बढ़ रही है, वहां की सरकारें अपने सीनियर सिटिजन्स को फ्लेक्सिबल नौकरियों और ‘फेज्ड रिटायरमेंट’ (धीरे-धीरे रिटायर होने का मॉडल) के जरिए इकोनॉमी में एक्टिव रखने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं.
भले ही भारत के पास आज दुनिया की सबसे युवा आबादी हो, लेकिन अनुभवी टैलेंट को इस तरह वेस्ट करना सही नहीं ठहराया जा सकता.
जो कंपनियां सेकंड-करियर के स्ट्रक्चर्ड रास्ते बनाएंगी, वे अपने यहां के ‘संस्थागत ज्ञान’ को अपनी तिजोरी में सुरक्षित रख पाएंगी. उन्हें ऐसे मैच्योर डिसीजन-मेकर्स मिलेंगे जो युवा टीमों को गाइड कर सकते हैं और कंपनियों को भारी नुकसान वाले गलत फैसले लेने से बचा सकते हैं. गौरव शर्मा के शब्दों में कहें तो भविष्य का वर्कप्लेस किसी की उम्र से नहीं, बल्कि उसकी निरंतर सीखने की क्षमता और काबिलियत से तय होगा.
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