अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध में भारतीय नाविकों की मौत के बाद कई सवाल उठ रहे हैं। संघर्ष शुरू होने के बाद अब तक 6 भारतीयों की मौत हो चुकी है। वहीं बीते एक सप्ताह में भारतीय नाविकों वाले 3 जहाजों पर हमले हुए हैं। अमेरिका स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ओमान के तट के पास इन जहाजों को लगातार निशाना बना रहा है। बीते बुधवार को पालाऊ के झंडे वाले तेल टैंकर ‘एमटी सेट्टेबेलो’ पर हुए हालिया हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई है। ये नाविक हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश के रहने वाले थे। इसके बाद अब इलाके में तैनात भारतीयों की सुरक्षा पर सवालिया निशान लग गया है। ऐसे में समझते हैं कि इस वक्त कितने भारतीय नाविक समंदर में तैनात हैं और किस तरह उन्हें हर रोज अपनी जान की बाजी लगानी पड़ती है।
आंकड़ों की बात करें तो भारतीय नाविक आज अंतरराष्ट्रीय कमर्शियल शिपिंग इंडस्ट्री की रीढ़ बन चुके हैं। भारत मर्चेंट नेवी वर्कफोर्स के मामले में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ग्लोबल मर्चेंट नेवी वर्कफोर्स के मामले में भारत की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत है। इसके अलावा इस वक्त 3 लाख से अधिक भारतीय अंतरराष्ट्रीय कंटेनर जहाजों, बल्क कैरियर और तेल टैंकरों पर सक्रिय रूप से तैनात हैं।
ये भारतीय अपनी बेहतरीन ट्रेनिंग, फर्राटेदार अंग्रेजी और तकनीक में निपुण होने की वजह से वैश्विक शिपिंग कंपनियां की पहली पसंद होते हैं। यही वजह है कि फारस की खाड़ी, लाल सागर या ओमान की खाड़ी से गुजरने वाले लगभग हर बड़े कमर्शियल जहाज पर भारतीय नाविक होते हैं।
हर साल हजारों भारतीय युवा इस नौकरी की तरफ क्यों आते हैं? इसके पीछे कई वजहें हैं। विदेशी झंडे वाले जहाजों पर मिलने वाली सैलरी डॉलर में होती है। यह सैलरी भारत में मिलने वाली किसी भी शुरुआती कॉर्पोरेट या इंजीनियरिंग नौकरी की तुलना में कई गुना अधिक होती है। वहीं भारतीय कानूनों के अनुसार, अगर कोई नाविक एक वित्तीय वर्ष में 183 दिनों से अधिक देश से बाहर बिताता है, तो उसे NRI का दर्जा मिलता है और कमाई पूरी तरह से टैक्स-फ्री हो जाती है। इस तरह युवा इस जॉब की तरफ आकर्षित होते हैं।
अब समझते हैं कि नाविकों को रिस्क क्यों लेना पड़ता है। जहाजों पर काम करने वाले नाविकों के लिए खतरा तब बढ़ जाता है जब वे अनजाने में ‘ग्रे फ्लीट’ या ‘डार्क फ्लीट’ का हिस्सा बन जाते हैं। ये वैसे संदिग्ध जहाज होते हैं जो अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को दरकिनार कर चोरी-छिपे तेल और ईंधन की सप्लाई करते हैं। इनमें क्रू मेंबर्स के पास यह चुनने का अधिकार बहुत कम या न के बराबर होता है कि उनका जहाज किस देश से होकर गुजरेगा। रूट शिपिंग कंपनियां ही तय करती हैं। समुद्री यूनियनों ने लगातार यह मांग उठाई है कि नाविकों को संकट की घड़ी में हाई-रिस्क जोन में जाने से इनकार करने का अधिकार मिलना चाहिए, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सख्त नियम न होने के कारण भारतीय नाविकों को मजबूरन इसी रास्ते से गुजरना पड़ता है।
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जागृति को छोटी उम्र से ही खबरों की दुनिया ने इतना रोमांचित किया कि पत्रकारिता को ही करियर बना लिया। 2 साल पहले लाइव हिन्दुस्तान के साथ करियर की शुरुआत हुई। उससे पहले डिग्री-डिप्लोमा सब जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन में। भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली से पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा और संत जेवियर्स कॉलेज रांची से स्नातक के बाद से खबरें लिखने का सिलसिला जारी। खबरों को इस तरह से बताना जैसे कोई बेहद दिलचस्प किस्सा, जागृति की खासियत है। अंतर्राष्ट्रीय संबंध और अर्थव्यवस्था की खबरों में गहरी रुचि। लाइव हिन्दुस्तान में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान शानदार कवरेज के लिए इंस्टा अवॉर्ड जीता और अब बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर रोजाना कुछ नया सीखने की ललक के साथ आगे बढ़ रही हैं। इसके अलावा सिनेमा को समझने की जिज्ञासा है।
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