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अशनीर ग्रोवर का 20,000 करोड़ रुपये के फंड का सुझाव दिल्ली यूनिवर्सिटी की सालों पुरानी बुनियादी ढांचे से जुड़ी कमियों को एक बार फिर बहस के केंद्र में ले आया है. हॉस्टल के कमरों की किल्लत, पुरानी होती इमारतें, फंड की कमी और नई कंस्ट्रक्शन में आ रही प्रशासनिक रुकावटें, ये तमाम खामियां अब एक बड़े सवाल को जन्म दे रही हैं कि क्या भारत की सबसे प्रतिष्ठित पब्लिक यूनिवर्सिटीज में से एक DU अपने छात्रों को वो सहूलियतें दे पा रही है, जिन्हें तलाशने के लिए युवा तेजी से विदेशों का रुख कर रहे हैं?
सत्य निकेतन में एक पीजी (PG) इमारत के ढहने के बाद देश के एजुकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर पर छिड़ी तीखी बहस में अब कॉर्पोरेट वर्ल्ड की भी एंट्री हो गई है. ‘शार्क टैंक इंडिया’ के पूर्व जज और भारत-पे के सह-संस्थापक अशनीर ग्रोवर ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के बुनियादी ढांचे पर उंगली उठाते हुए कहा है कि इस संस्थान को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए एक बड़े वित्तीय निवेश की सख्त जरूरत है.
अशनीर ग्रोवर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (ट्विटर) पर लिखा कि जो अफोर्ड कर सकते हैं और जिनके बच्चे होनहार भी हैं, वो भी फॉरेन यूनिवर्सिटी इसीलिए भेजते हैं अपने बच्चों को! कम से कम 2 बिलियन डॉलर (20,000 करोड़ रुपये) का इन्वेस्टमेंट चाहिए DU को वर्ल्ड क्लास बनाने के लिए.
ग्रोवर का यह बयान उस यूजर के पोस्ट के जवाब में आया, जिसने दावा किया था कि 2014 के बाद से दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक भी नया हॉस्टल नहीं बना है.
90 से ज्यादा कॉलेजों में सिर्फ 19 के पास हॉस्टल
6 सितंबर को सत्या निकेतन में हुए दर्दनाक हादसे के बाद से ही DU के इंफ्रास्ट्रक्चर पर सवाल खड़े हो रहे हैं. यूनिवर्सिटी में हॉस्टल क्षमता की हकीकत यह है कि 90 से अधिक संबद्ध कॉलेजों में से महज 19 कॉलेजों के पास अपने हॉस्टल की सुविधा है. इनमें भी सबसे ज्यादा क्षमता हिंदू कॉलेज के पास है, जहाँ लगभग 560 बेड ही उपलब्ध हैं.
इसके अलावा, DU के कई कॉलेज दशकों पुरानी इमारतों से चल रहे हैं, जहां किसी भी नए निर्माण या विस्तार को कई नियामक (regulatory) और लॉजिस्टिक बंदिशों का सामना करना पड़ता है.
श्री वेंकटेश्वर कॉलेज के प्रिंसिपल प्रोफेसर वजला रवि ने बताया कि साउथ कैंपस के कॉलेजों के भीतर नया निर्माण करना कितना जटिल है. उनके मुताबिक यहां एक सिंगल कमरा बनाने के लिए भी युद्ध स्तर पर प्रयास करने पड़ते हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि हवाई अड्डे की नजदीकी और क्षेत्र के खास नियमों के कारण इमारतों की ऊंचाई बढ़ाने पर सख्त पाबंदियां हैं.
देशभर से आते हैं छात्र, लेकिन सिर छुपाने की जगह नहीं
CUET-UG परीक्षा पास करके देश के कोने-कोने से और हर सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के छात्र बड़ी उम्मीदों के साथ DU पहुंचते हैं. लेकिन एक बार दाखिला मिलने के बाद उनके सामने सबसे बड़ा संकट आता है किफायती और सुरक्षित रहने की जगह ढूंढ़ना.
यहां फंडिंग की समस्या सबसे बीच में खड़ी है. हालांकि DU को सरकार से सहायता मिलती है, लेकिन बढ़ती जरूरतों के अनुपात में बजट नहीं बढ़ सका है. वहीं दूसरी तरफ, देश-विदेश के नए प्राइवेट संस्थान अत्याधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और वर्ल्ड क्लास सुविधाओं पर पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं.
इसीलिए विदेश भाग रहे भारतीय छात्र?
यही वजह है कि भारतीय छात्र उच्च शिक्षा के लिए तेजी से विदेशों का रुख कर रहे हैं. बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, आधुनिक लैब, अकादमिक विकल्प और पढ़ाई के बाद रोजगार के अवसर वे मुख्य कारक हैं जो छात्रों को विदेशी यूनिवर्सिटीज की तरफ खींचते हैं.
अशनीर ग्रोवर का 20,000 करोड़ रुपये का अनुमान भले ही कोई औपचारिक बजट आकलन न हो, लेकिन उनके इस तेवर भरे पोस्ट ने एक पुराना और कड़वा सवाल फिर से सतह पर ला दिया है कि अगर दिल्ली यूनिवर्सिटी को दुनिया के टॉप संस्थानों से मुकाबला करना है, तो क्या इसके इंफ्रास्ट्रक्चर की अनदेखी ऐसे ही जारी रहेगी?
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