विभाजक ताकतों को उलाहना देती बाबुश्किन की हिंदी – Prabhasakshi

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आज के रूस और उसके पूर्ववर्ती सोवियत संघ में हिंदी की पढ़ाई-लिखाई 1957 से ही शुरू हो गई थी, इस लिहाज से रूस के किसी नागरिक का हिंदी बोलना महत्वपूर्ण नहीं माना जा सकता। लेकिन आज के दौर में भारत स्थित रूसी दूतावास के दूसरे नंबर के अधिकारी रोमन बाबुश्किन अगर हिंदी के चंद लफ्जों का इस्तेमाल करें तो वह अहम हो जाता है। रूस से तेल खरीद के चलते अंकल सैम की आंखें इन दिनों भारत पर लाल हैं। इसी संदर्भ में 20 अगस्त को रूसी दूतावास ने एक प्रेस कांफ्रेंस रखी। उस प्रेस कांफ्रेंस में अपने संबोधन की शुरूआत बाबुश्किन ने हिंदी के दो वाक्यों से करके भारतीय भाषा प्रेमी पत्रकारों का दिल जीत  लिया। बाबुश्किन का पहला वाक्य रहा, ‘सभी का हार्दिक स्वागत है।‘ पत्रकारिता जगत की हस्तियों की श्रवणेंद्रिय इस हिंदी प्रयोग का झटका झेल रही थीं, कि बाबुश्किन ने ठेठ भारतीय सांस्कृतिक अंदाज में दूसरा वाक्य छोड़ दिया, “हम शुरुआत करेंगे…भगवान गणेश के साथ। गणेश चतुर्थी आ रही है।”

बाबुश्किन का हिंदी बोलना भारतीय राजनीति और समाज के उस तबके के लिए सीख हो सकता है, जो हिंदी का सवाल आते ही भड़क उठते हैं। जिन्हें विदेशी अंग्रेजी तो ग्राह्य और स्वीकार्य है, लेकिन हिंदी उनकी अपनी अस्मिता पर सवाल उठाती लगती है। आजाद भारत की राजनीति जाति, धर्म और भाषा के आधार पर किस कदर विभाजित हुई है, इसे समाज तो रोज ही झेलता-देखता है। इस विभाजक सोच का ही असर है कि हमारी अपनी भाषाओं के बीच भी झगड़े पैदा किए जा रहे हैं। भारतीय भाषाओं को एक-दूसरे के विरोध में राजनीति खूब खड़ा कर रही है और इसके जरिए वह अपना सियासी उल्लू ही सीधा करती है। नैरंतर्य और सकारात्मकता के लिहाज से देखें तो इसके सामाजिक विघटन की नींव ही मजबूत हो रही है। अस्मिताबोध को जगाने की आड़ में भाषायी वैमनस्य की राजनीति का एक मात्र मकसद सामाजिक विघटन को  बढ़ाना और उस बंटे समाज के बीच से अपने खांचे में फिट बैठने वाला बड़ा समर्थक आधार वर्ग तैयार करना है। इसीलिए जब नई शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं के जरिए प्राथमिक शिक्षा की बात होती है तो हिंदी को किनारे लगाने के लिए तमिल राजनीतिक अस्मिता उठ खड़ी होती है। कन्नड़ और बांग्ला भाषा बोध भी हिंदी के खिलाफ उठ खड़ा होता है। दिलचस्प यह है कि स्थानीय भाषाबोध के इन खिलाड़ियों के लिए वह अंग्रेजी अपनी हो जाती है, जिसकी कथित तौर पर वैश्विक व्यापकता है। हालांकि हकीकत यह है कि अंग्रेजी की व्यापकता गहराई से देखें तो अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, ब्रिटेन, आयरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, भारत और हांगकांग में ही है।
अंग्रेजी को तो बाबुश्किन ने भी अपना रखा है। भारतीय पत्रकारों के लिए आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में बाद में वे अंग्रेजी में ही बोले। लेकिन हिंदी में बोलकर उन्होंने एक तरह से भारतीय लोगों का दिल जीतने की कोशिश की। ठीक उसी अंदाज में, जिस अंदाज में नरेंद्र मोदी स्थानीय समुदायों के दिल तक अपनी पैठ बनाने के लिए स्थानीय भाषाओं के कुछ शब्दों के साथ अपने भाषण की शुरूआत करते रहे हैं। पता नहीं, बाबुश्किन ने हिंदी बोलकर वहां उपस्थित कितने भारतीय पत्रकारों का दिल जीता, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों और सोशल मीडिया पर जब से उनकी मीठी प्रचारित हुई है,उन्होंने ठेठ भारतीयों का दिल जरूर जीत लिया है।

सोवियत संघ में हिंदी फिल्में काफी पसंद की जाती रही हैं। एक दौर में राजकपूर की फिल्में खासा लोकप्रिय रही हैं। राजकपूर अभिनीत फिल्म श्री 420 का गीत ‘मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिस्तानी, सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ एक दौर में सोवियत संघ के घर-घर का पसंदीदा गीत बन गया था। कम्युनिस्ट शासन के दौर में रूस की राजधानी मास्को में हिंदी में दो प्रकाशक भी सक्रिय रहे, प्रगति प्रकाशन और रादुगा प्रकाशन। इन प्रकाशनों के जरिए रूसी लेखकों के साथ ही लेनिन, स्टालिन आदि की रचनाएं हिंदी में अनूदित होकर सस्ते में उपलब्ध होती थीं। एक दौर में सोवियत संघ की दो पत्रिकाएं ‘सोवियत देश’ और ‘स्पूतनिक’ भारत में बहुत प्रचलित थे। हिंदी की वहां पढ़ाई भी खूब होती है। इसकी शुरूआत 1955 में हुई। उसके पहले तक रूस की भारत में दिलचस्पी संस्कृत भाषा और साहित्य के अध्ययन तक सीमित थी। साल 1955 में सोवियत संघ के तत्कालीन प्रधानमंत्री निकिता ख्रुश्चेव ने भारत का दौरा किया। इसी दौरे में उन्होंने एक महत्वपूर्ण घोषणा की। उन्होंने कहा, “हम यह देखेंगे कि हमारे देश की शिक्षा प्रणाली ऐसी विकसित हो जिसमेँ सर्वश्रेष्ठ और सर्वगुण-सम्पन्न नई पीढ़ी हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को सीखें।”इसी के बाद सोवियत संघ में हिंदी प्रकाशन और पढ़ाई-लिखाई की शुरूआत हुई।

आज रूस के मास्को राजकीय विश्वविद्यालय, रूसी राजकीय मानविकी विश्वविद्यालय, अंतरराष्ट्रीय संबंध विश्वविद्यालय, सांक्त पितेरबूर्ग विश्वविद्यालय, विद्यालय क्रमांक 19, मॉस्को, फ़ार ईस्ट विश्वविद्यालय, ब्लादीवोस्तक आदि में हिंदी पढ़ाई जा रही है। इसके साथ ही मॉस्को स्थित भारतीय दूतावास के जवाहरलाल नेहरू साँस्कृतिक केंद्र में हिन्दी की कक्षाएँ चल रही हैं। जिनमें हर आयु वर्ग लोग हिंदी सीख रहे हैं। 

साफ है कि विदेशी लोग हिंदी सीख रहे हैं, भारत आए विदेशी हिंदी बोल रहे हैं। इस्कॉन के मंदिरों में जाकर देखा जा सकता है, भगवान कान्हा के विदेशी भक्त भी मीठी हिंदी में बात करते मिल जाएंगे। लेकिन हमारी ही राजनीति के ही एक वर्ग को हमारी हिंदी से परहेज है। ऐसे लोगों के लिए बाबुश्किन की मीठी हिंदी एक तरह मीठा उलाहना है। बाबुश्किन जैसों की जुबान से निकली हिंदी भारतीय भाषा प्रेमियों के लिए नव उत्साह के संचार का जरिया है। ऐसे सुखद हादसों से हिंदी ही नहीं, भारतीय भाषा प्रेमी भी प्रेरित होते हैं। काश कि हमारी राजनीति भी इसे समझती, इससे प्रेरित होने की कोशिश करती और भाषा के नाम पर होने वाली विभाजनकारी राजनीतिक कर्म से बचती।  

-उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं
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