DNA: रामभद्राचार्य Vs प्रेमानंद पर संतों के बंटवारे का विश्लेषण – Zee News

अब हम, देश के दो सबसे चर्चित महाराज से जुड़े नए विवाद का विश्लेषण करेंगे. 36 घंटे पहले जगतगुरु रामभद्राचार्य ने प्रेमानंद महाराज को संस्कृत बोलकर दिखाने की चेतावनी दी थी. और आज जब रामभद्राचार्य इस विवाद पर अपना पक्ष रखने आए. तो संस्कृत के साथ-साथ संस्कृति पर चले गए.
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अब हम, देश के दो सबसे चर्चित महाराज से जुड़े नए विवाद का विश्लेषण करेंगे. 36 घंटे पहले जगतगुरु रामभद्राचार्य ने प्रेमानंद महाराज को संस्कृत बोलकर दिखाने की चेतावनी दी थी. और आज जब रामभद्राचार्य इस विवाद पर अपना पक्ष रखने आए. तो संस्कृत के साथ-साथ संस्कृति पर चले गए. यानी जिस बयान को सुनकर एक पल में ये लगा कि शायद विवाद को खत्म करने की कोशिश है, उसी बयान को ध्यान से और आराम से सुनने के बाद पता चलेगा कि शायद इससे विवाद खत्म होने के बजाय और ज्यादा बढ़ सकता है. ये विवाद इतना बढ़ चुका है कि हिंदुओं से नफरत करने वाला पड़ोसी देश पाकिस्तान भी मजे ले रहा है.

आखिर इस विवाद की शुरुआत कहां से हुई थी और अब विवाद किस तरफ जाता दिख रहा है ये समझना जरूरी है. कुछ घंटे पहले एक इंटरव्यू में जगतगुरू रामभद्राचार्य ने प्रेमानंद महाराज को चुनौती दी थी कि वो उनके सामने संस्कृत बोलकर दिखाएं. उनके कहे संस्कृत श्लोकों का अर्थ बताएं. जगतगुरू रामभद्राचार्य ने कहा था. प्रेमानंद जी उनके लिए एक बालक के समान हैं. जिन्हें ना तो वो विद्वान मानते हैं और न ही चमत्कारी. इस बयान पर विवाद के बाद अब जगतगुरू रामभद्राचार्य ने आज शाम को ही सफाई दी है और इस विवाद को संस्कृत सीखने से संस्कृति तक पहुंचा दिया. यानि जगतगुरू रामभद्राचार्य ने कह दिया है…प्रेमानंद महाराज को संस्कृत तो सीखनी ही पड़ेगी. क्योंकि जिसे संस्कृत नहीं आती वो कभी भारत की संस्कृति को नहीं समझ पाएगा..आज सबसे पहले आप जगतगुरू रामभद्राचार्य के इस पूरे बयान को बहुत ध्यान से सुनिए….क्योंकि इस बयान का असर देश ही नहीं पूरी दुनिया में इन दोनों संतों के फॉलोवर्स और सनातनियों पर पड़ेगा.

जगतगुरू रामभद्राचार्य ने अपने इस बयान में चार महत्वपूर्ण बातें कहीं…पहली बात सनातनी संतों को एक रहना चाहिए. किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहिए…दूसरी बात उन्होंने प्रेमानंद पर कोई अभद्र टिप्पणी नहीं की…उम्र में बड़ा होने के नाते प्रेमानंद को सही राह दिखाई…तीसरी बात वो प्रेमानंद को संस्कृत सीखने की बात पर अभी भी कायम हैं..उन्होंने कहा है कि अगर प्रेमानंद महाराज को संस्कृति को समझना है..तो उनको संस्कृत सीखनी होगी. चौथी बात…वो प्रेमानंद के हितैषी हैं…इसलिए उन्होंने प्रेमानंद को आशीर्वाद देने..उनको हृदय से लगाने और उनकी लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करने की बात कही.

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जगतगुरू रामभद्राचार्य ने पहले भी कहा था…उनको प्रेमानंद से कोई द्वेष नहीं है…आज भी उन्होंने प्रेमानंद को गले लगाने की बात कही है…लेकिन विवाद जिस बात पर शुरू हुआ था..अब उससे आगे बढ़ गया है…क्योंकि आज भी जगतगुरू रामभद्राचार्य ने प्रेमानंद महाराज के लिए संस्कृत को सीखना जरूरी बताया है. और एक कदम आगे बढ़ते हुए ये भी कह दिया कि ये संस्कृति को समझने के लिए जरूरी है. तो क्या अभी प्रेमानंद महाराज का संस्कृति का ज्ञान नहीं…क्या वो जो कुछ अपने फॉलोवर्स को बता रहे हैं…क्या वो भारत की संस्कृति के अनुरूप नहीं है. आज आपको इन दोनों संतों के बारे में कुछ बातें जाननी चाहिए…ये कौन हैं..सनातनियों को ये क्या शिक्षा देते हैं. और इनके फॉलोअर्स की संख्या क्या है.
जगद्गुरु रामभद्राचार्य का जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ. 2 महीने की उम्र में आंख की रोशनी चली गई. लेकिन चार साल की उम्र से उन्होंने कविताएं लिखनी शुरू कर दीं और 8 साल की उम्र में रामकथा करने लगे. प्रेमानंद महाराज का जन्म भी ब्राह्मण परिवार में हुआ. प्रेमानंद महाराज खुद बताते हैं उन्होंने पांचवी क्लास से गीता का पाठ शुरू कर दिया था. 
जगद्गुरु रामभद्राचार्य  वेद, पुराण, उपनिषद के ज्ञाता हैं जो उन्होंने बहुत कम उम्र में कंठस्थ कर लिए थे. भारत में तुलसी रामायण के सबसे बेहतरीन विशेषज्ञों में उनका नाम गिना जाता है. प्रेमानंद महाराज जब 9वीं क्लास में पहुंचे तो उन्होंने तो आध्यात्मिक जीवन जीने का फैसला किया और तेरह साल की उम्र में संन्यास ले लिया. पहले काशी फिर मथुरा में अपना डेरा जमाया. प्रेमानंद महाराज ने भगवद् गीता का गहन अध्ययन किया है.
– रामभद्राचार्य ने संस्कृत में दो और हिंदी में दो यानी कुल चार महाकाव्य की रचना की है. रामभद्राचार्य को 22 भाषाओं का ज्ञान है और वो 230 पुस्तक लिख चुके हैं. सनातनियों को वो वेद, पुराणों और भारत के प्राचीन धर्म ग्रंथों पर आधारित ज्ञान देते हैं. जबकि प्रेमानंद महाराज जीवन के लिए व्यावहारिक और महत्वपूर्ण शिक्षाएं प्रदान करते हैं.
– रामभद्राचार्य जी ने चित्रकूट में श्रीरामचरितमानस विश्वविद्यालय की स्थापना की..इसके अलावा रामभद्राचार्य वेदांत विद्यापीठ और भक्तवत्सल आश्रम जैसे संस्थानों के जरिए वेद, उपनिषद और रामचरितमानस की शिक्षा देते हैं. वहीं प्रेमानंद महाराज ने वृंदावन धाम में एक बड़ी गौशाला स्थापित की है. उनके आश्रम के माध्यम से मुफ्त चिकित्सा शिविर और शिक्षा कार्यक्रम चलाए जाते हैं. गरीब, विधवाओं और अनाथ बच्चों को सहायता दी जाती है
– सोशल मीडिया पर फेसबुक..इंस्टाग्राम और यूट्यूब को मिलाकर रामभद्राचार्य महाराज के 15 लाख फॉलोवर्स हैं..जबकि प्रेमानंद महाराज के सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स की संख्या 2 करोड़ 20 लाख से ज्यादा है. यानि सोशल मीडिया पर भक्तों में वो काफी लोक​प्रिय हैं
सोशल मीडिया पर लोकप्रिय होना कोई बुरी बात नहीं है क्योंकि अपने भक्तों तक पहुंचने के लिए कई धर्मगुरू सोशल मीडिया का सहारा लेते हैं. सोशल मीडिया उनको लो​कप्रिय बनाता है उनकी बातों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाता है. लेकिन पहले ऐसा नहीं होता था कई पौराणिक कथाओं में आपने भारत के महान ऋषि मुनियों की कठोर तपस्या की कहानियां सुनी होंगी. किस तरह भारत में ऋषि मुनि दुनिया की मोह माया को छोड़कर गुफाओं, पहाड़ों, जंगलों में कई वर्षों तक कठिन तपस्या करते थे. ईश्वर से जगत कल्याण के लिए चमत्कारी शक्तियां और ज्ञान अर्जित करते थे. उनका आशीर्वाद और वरदान भगवान जैसा माना जाता था. यानी वर्षों की तपस्या के बाद किसी को साधु-संत. ऋषि-मुनि कहा जाता था.  जिन्हें लोग देवताओं जैसा दर्जा देते थे. उनकी वाणी को अमृतवाणी कहा जाता था. ये वाणी भी लोगों तक आसानी से नहीं पहुंचती थी. इसे सुनने के लिए भी लोगों को आध्यात्मिक होना पड़ता था. लेकिन आजकल आध्यात्म का रीलयुग चल रहा है. जिसमें संतों की बात लोगों तक बहुत जल्दी पहुंचती हैं. लेकिन कई बार वाणी विवादित भी हो जाती है. यानि सोशल मीडिया पर धर्म की चर्चा पर भी शास्त्रार्थ किया जा सकता है..आप सुनिए किस तरह सोशल मीडिया पर धर्मगुरूओं की बातें आजकल विवादित हो रही हैं
आप समझ सकते हैं…किस तरह रील वाला आध्यात्म कई बार विवाद को जन्म दे देता है. सोशल मीडिया पर ऐसे बयान कई बार बड़े विवादों को हवा देते हैं. और सनातन के संत भी आमने सामने आ जाते हैं. क्या रामभद्राचार्य महाराज और प्रेमानंद महाराज के बीच विवाद की वजह भी ऐसा ही कोई बयान था..आज आपको ये भी समझना चाहिए…रामभद्राचार्य महाराज से पहले उनके बयान पर उनके शिष्य और उत्तराधिकारी आचार्य रामचंद्र दास का बयान भी सामने आया. जिसके बाद सवाल उठने लगे क्या जगदगुरू रामभद्राचार्य की प्रेमानंद महाराज पर की गई टिप्पणी…सिर्फ संस्कृत जानने की लड़ाई थी…क्या रामभद्राचार्य ने सिर्फ शास्त्रों की समझ और वेद उपनिषदों के ज्ञान को आधार बनाकर प्रेमानंद महाराज को चैलेंज दिया था…या फिर बात कुछ और थी…आचार्य रामचंद्र दास ने वो वजह भी बता दी…जिसकी वजह से प्रेमानंद महाराज…से जगदगुरू रामभद्राचार्य नाराज़ हुए…आज आपको भी रामभद्राचार्य के शिष्य के बयान को बहुत ध्यान से सुनना चाहिए
यानि जगदगुरू रामभद्राचार्य के उत्तराधिकारी माने जा रहे…आचार्य रामचंद्र दास का मानना है…प्रेमानंद महाराज की लड़कियों को लेकर की गई टिप्पणी से रामभद्राचार्य आहत हुए…इस बयान की वजह से ही उन्होंने प्रेमानंद महाराज को सलाह दी कि वो ग्रंथों को पढ़ें..जगतगुरू रामभद्राचार्य चाहते हैं..कि जो कुछ ग्रंथों..वेदों और पुराणों में लिखा है…वो ही बात संत समाज को बताएं…और जिनके पास इसका अध्ययन नहीं है. वो इससे दूर रहें. आज आपको एक बार फिर से प्रेमानंद महाराज का वो बयान सुनना चाहिए…जिसकी वजह से जगतगुरू रामभद्राचार्य के नाराज़ होने की बात कही जा रही है
यानि जगतगुरू रामभद्राचार्य के शिष्य के मुताबिक प्रेमानंद महाराज के इस बयान से रामभद्राचार्य को परेशानी हुई और उन्होंने प्रेमानंद महाराज को संस्कृत और शास्त्रों को पढ़ने के लिए कहा..आज आपको ये भी जानना चाहिए आखिरकार भारतीय संस्कृति को जानने के लिए संस्कृत जानना क्यों जरूरी है.
– क्योंकि हमारे प्राचीन ग्रंथ, वेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण और शास्त्र संस्कृत में ही लिखे गए हैं.
– संस्कृत से ही हमें भारतीय दर्शन, योग, आयुर्वेद, खगोलशास्त्र, और गणित के मूल सिद्धांतों का ज्ञान मिलता है. क्योंकि प्राचीन भारत में इससे जुड़े ग्रंथ भी  संस्कृत में लिखे गए हैं.
– संस्कृत इसीलिए भारत के धार्मिक और दार्शनिक विचारों की गहरी समझ प्रदान करती है
– इसीलिए संस्कृत को भारत की सांस्कृतिक एकता और ऐतिहासिक परंपराओं को भी संजोए रखने वाली भाषा कहा गया है.
– यानि संस्कृत के बिना भारतीय ज्ञान और दर्शन को सही रूप में समझना मुश्किल है.क्योंकि ग्रंथों के अनुवाद भी कई बार कमियां रह जाती हैं
फिलहाल सनातन के दो संतों के बीच विवाद शुरू हुआ तो भारत के साधु संतों की प्रतिक्रिया भी आई है..आज आपको इस विवाद पर भारत के दूसरे साधु संतों को भी सुनना चाहिए
 
जी न्यूज के विशेष कार्यक्रम जी कचेहरी में मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री..देश की पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती आई थीं. आज उन्होंने भी भारत के दो संतों के विवाद पर अपनी राय दी है.
या​नि चाहें भारत के साधु संत हों या फिर सनातन को मजबूत करने की बात करने वाले नेता हों. कोई भी नहीं चाहता ऐसी वाणी बोली जाए जिससे सनातन के संत आपस में उलझें कोई विवाद बढ़े. लेकिन फिलहाल ये विवाद बढ़ता दिख रहा है. क्योंकि अब जगतगुरू रामभद्राचार्य और प्रेमानंद महाराज के बीच शास्त्रार्थ करवाने की मांग भी तेज हो गई.
हालांकि जगतगुरू रामभद्राचार्य इस विवाद को खत्म करना चाहते थे. लेकिन उनके बयान के बाद नई बहस शुरू हो गई. इसके अलावा मथुरा के साधु संतों की मांग के मुताबिक क्या दोनों संत शास्त्रार्थ करेंगे. इसका तो पता नहीं लेकिन जिस तरह सोशल मीडिया पर धर्मगुरुओं के बयानों से विवाद बढ़ रहा है. इस बात पर चर्चा जरूर होनी चाहिए कि कहीं रील वाले आध्यात्म से सनातन का नुकसान ना हो जाए.
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