‘हिंदुस्तान की लाडली उर्दू खड़ी हुई, कहती है मैं हिंदी में पली और बड़ी हुई, नारों ने मेरे गैरों के दिल तक हिला दिए, बेताब मेरे नारों से हर नौजवान हुआ, आजाद मेरे नारों से हिंदुस्तान हुआ’, राष्ट्रीयता के भावों से सराबोर ऐसे ही शायरियों की गूंज जवाहर कल
मौका था सांस्कृतिक सृजन पखवाड़ा के अंतर्गत जवाहर कला केन्द्र और राजस्थान उर्दू अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संवाद प्रवाह का। कार्यक्रम में वरिष्ठ शायर और जयपुर राइटर्स क्लब के अध्यक्ष लोकेश कुमार सिंह ‘साहिल’, शायर प्रेम पहाड़पुरी, शायर व आलोचक साबिर हसन रईस ने ‘उर्दू भाषा व राष्ट्रीय एकता’ विषय पर अपने विचार रखे। शायर एजाज उल हक शिहाब ने संवाद प्रवाह का संचालन किया।
साबिर हसन रईस ने कहा- उर्दू का पहला शायर अमीर खुसरो को माना जाता है। पहले हिंदी और उर्दू एक ही जुबां थी, अंग्रेजों ने बांटने का काम किया। हिंदुस्तानियों के जीवन में होने वाली आम घटनाओं का उर्दू की रचनाओं में जिक्र है, इस तरह यह हिंदुस्तानी जुबां राष्ट्रीय एकता से सराबोर करने वाली है।
रईस ने एकता का पयाम देते हुए अपनी नज्म पढ़ी ‘दरिंदे इसके आगे सिर झुकाते हैं इंसानों, तुम मोहब्बत को बरतों, इसकी ताकत को जानो’। प्रेम पहाड़पुरी ने कहा- उर्दू को मजहब से जोड़कर न देखा जाए।
उन्होंने दया शंकर निजाम, शीन काफ निजाम, नजीर अकबराबादी सरीखे शायरों की रचनाओं का जिक्र भी किया। उन्होंने बताया कि आजादी के जश्न में हर शख्स की जुबां पर अल्लामा मुहम्मद इकबाल की गजल ‘सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा’ रहती है, जो राष्ट्रीय एकता में उर्दू के महत्व को जाहिर करती है।
उन्होंने यह भी कहा कि उर्दू भारत में जन्मी है उसे अपना मानकर पढ़ना चाहिए। लोकेश कुमार सिंह ‘साहिल’ ने कहा- हिंदी और उर्दू एक ही भाषा है, बस इनकी लिपियां दो हैं। उन्होंने बताया कि उर्दू संस्कृत, ब्रज समेत 9 भाषाओं के शब्दों से मिलकर बनी है। 1947 से पहले सरकारी कामकाज की भाषा भी उर्दू ही थी, ये आम आदमी की जुबां है। सभी को जोड़ती है। राजस्थान उर्दू अकादमी के सचिव ने बताया- कार्यक्रम में साहित्य प्रेमी, कला प्रेमी एवं अन्य प्रबुद्ध जन उपस्थित रहे ।
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