गाजियाबाद में गेमिंग की लत में तीन नाबालिग बच्चियों ने आत्महत्या कर ली. इस घटना ने पूरे देश को हिला कर रख दिया है. लेकिन आपको जानना चाहिए जिस गेमिंग के कारण बच्चियों की जान गई है, उसका भारत में व्यापार काफी बड़ा है.
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DNA Analysis: ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े मौत के जो आंकड़े हैं, वो असल में इससे कहीं ज्यादा बताए जाते हैं. क्योंकि NCRB यानी National Crime Records Bureau में गेमिंग की वजह से होने वाली मौतों या आत्महत्याओं के आंकड़े अलग से किसी कैटेगरी में नहीं बताए जाते हैं. आज ऐसी ही एक और मौत हुई है.भोपाल में 14 साल के एक बच्चे ने भी ऑनलाइन गेमिंग की वजह से आत्महत्या कर ली. यहां आत्महत्या की वजह तो और चौंकाने वाली है.
यहां न तो बच्चे से मोबाइल छीना गया था न ही उसे गेम खेलने से रोका गया था. बल्कि यहां बच्चे ने इसीलिए मौत को गले लगा दिया क्योंकि वो गेम के स्टेज में फंस गया था. इस स्जेट को न पार करने की निराशा में बच्चे ने खुद को फांसी लगा ली. ये कैसी लत है. बच्चों की ये परेशानी बच्चों का ये हाल, माता-पिता क्यों नहीं देख पा रहे हैं. आज सबसे बड़ा सवाल तो ये भी है.. आज ये समझने की भी जरूरत है कि आखिर ये गेमिंग एप्स आपको और आपके बच्चों को अपना आदी कैसे बना रहे हैं. इसे समझने के लिए आपको गेमिंग कंपनियों का HOOK CHART देखना चाहिए. इसमें चार स्टेज होते हैं.. ट्रिगर, एक्शन, रिवार्ड और इनवेस्टमेंट पहला स्टेज है ट्रिगर- इसमें नोटिफिकेशन भेजा जाता है. जैसे आपका दोस्त आगे निकल गया है. इसके बाद आता है एक्शन- जिसमें आप गेम खेलकर स्टेज पार करने की कोशिश करते हैं. तीसरा स्टेज है रिवार्ड- आप कभी जीतते हैं, कभी हारते हैं. यह अनिश्चितता दिमाग में ‘डोपामाइन’ रिलीज करती है.
ये वही केमिकल है जो ड्रग्स लेने पर निकलता है. यही डोपामाइन आपको बार बार गेम खेलने पर मजबूर करता है.. मानो दिमाग को इसकी लग लग जाती है और इस HOOK CHART का आखिरी स्टेज होता है इनवेस्टमेंट- आप किसी गेम को अपना इतना समय और कभी-कभी पैसा लगा चुके होते हैं, कि गेम छोड़ना मुश्किल हो जाता है और अगर जबरन इसकी लत छुड़वाने की कोशिश की जाए, तो बड़े डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं और बच्चे आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं…
एक तरफ ऑनलाइन गेम्स भारत में वायरस की तरह फैल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ गेमिंग कंपनियां अपनी जेबें भर रही हैं..
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भारत में ऑनलाइन गेमिंग का बाजार करीब 31 हजार करोड़ का है.
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जो 2029 तक बढ़कर 75 हजार करोड़ का होने का अनुमान है.
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गेमिंग का बाजार बढ़ने से भारत सरकार को भी फायदा है.
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गेमिंग पर 28% GST लागू है. वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 1 अक्टूबर 2023 को 28% GST लागू होने के बाद, मात्र 6 महीनों में ऑनलाइन गेमिंग से राजस्व 412% बढ़कर लगभग 6,909 करोड़ रुपये हो गया था.
भारत में ऑनलाइन गेमिंग का बाजार करीब 31 हजार करोड़ का है.
जो 2029 तक बढ़कर 75 हजार करोड़ का होने का अनुमान है.
गेमिंग का बाजार बढ़ने से भारत सरकार को भी फायदा है.
गेमिंग पर 28% GST लागू है. वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 1 अक्टूबर 2023 को 28% GST लागू होने के बाद, मात्र 6 महीनों में ऑनलाइन गेमिंग से राजस्व 412% बढ़कर लगभग 6,909 करोड़ रुपये हो गया था.
ऑनलाइन गेमिंग के नियमों को सख्त करने की जरूरत
यहां सवाल तो ये भी उठता है कि ऑनलाइन गेमिंग से कमाई के साथ साथ क्या सरकार को इसे रेगुलेट करने की जरूरत नहीं है, जिन गेम्स की वजह से बच्चे मौत को गले लगा रहे हैं, उन्हें बैन क्यों नहीं किया जा रहा है बैन तो छोड़िये इन पर संसद में चर्चा भी क्यों नहीं की जा रही है. आज जब देश की संसद में भोपाल और गाजियाबाद में बच्चों की आत्महत्या पर माननीयों को बात करनी चाहिए थी. तब पक्ष-विपक्ष के सांसद एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप ही लगाते रह गए. जहां बच्चों की मौत पर चर्चा होनी चाहिए थी. वहां हंगामे की वजह से संसद को बार-बार स्थगित करना पड़ा.
#DNAमित्रों | बुरा मत मानिएगा! आप बहुत गलत कर रहे हैं..आप नहीं सुधरे तो बच्चे कूदकर जान देते रहेंगे!#DNA #DNAWithRahulSinha #Ghaziabad #GhaziabadCase #MobileAddiction @RahulSinhaTV pic.twitter.com/fZVLavHoHb
— Zee News (@ZeeNews) February 4, 2026
#DNAमित्रों | बुरा मत मानिएगा! आप बहुत गलत कर रहे हैं..आप नहीं सुधरे तो बच्चे कूदकर जान देते रहेंगे!#DNA #DNAWithRahulSinha #Ghaziabad #GhaziabadCase #MobileAddiction @RahulSinhaTV pic.twitter.com/fZVLavHoHb
— Zee News (@ZeeNews) February 4, 2026
गेमिंग के वायरस को रोकने की जिम्मेदारी किसकी?
बच्चों में फैलते गेमिंग के वायरस को रोकने की जितनी जिम्मेदारी माता-पिता की है, उतनी सरकार की भी होनी चाहिए. भारत सरकार ने कई गेम्स को बैन तो किया है, लेकिन जितनी तेजी से बैन किया जाता है, उससे दोगुनी तेजी से नए गेम्स लॉन्च हो जाते हैं, ऐसे में नई पॉलिसी लाने की जरूरत है. कुछ वैसी पॉलिसी जो चीन और दक्षिण कोरिया में है.
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चीन में गेमिंग को लेकर सबसे सख्त कानून हैं. 18 साल से कम उम्र के बच्चे हफ्ते में सिर्फ 3 घंटे गेम खेल सकते हैं. शुक्रवार, शनिवार, रविवार को सिर्फ 1-1 घंटा ही गेम खेल सकते हैं
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दक्षिण कोरिया में तो पहले ‘शटडाउन लॉ’ था जहां 16 साल से कम उम्र के बच्चे रात 12 बजे के बाद गेम नहीं खेल सकते थे. जिसे अब माता-पिता के कंट्रोल में बदल दिया गया है. यानी अगर माता पिता चाहें तभी रात 12 के बाद बच्चे गेम खेल सकते हैं.
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चीन और दक्षिण कोरिया में ये कड़े नियम क्यों लागू किए गए. ताकि बच्चे अपने परिवार के साथ समय गुजार सकें. माता-पिता से बातें कर सकें. वर्चुअल वर्ल्ड में नहीं बल्कि रियल वर्ल्ड में रहें क्योंकि वर्चुअल वर्ल्ड आपको कैसे मौत के मुंह में धकेल देता है. गाजियाबाद की घटना इसका भी एक उदाहरण है.
चीन में गेमिंग को लेकर सबसे सख्त कानून हैं. 18 साल से कम उम्र के बच्चे हफ्ते में सिर्फ 3 घंटे गेम खेल सकते हैं. शुक्रवार, शनिवार, रविवार को सिर्फ 1-1 घंटा ही गेम खेल सकते हैं
दक्षिण कोरिया में तो पहले ‘शटडाउन लॉ’ था जहां 16 साल से कम उम्र के बच्चे रात 12 बजे के बाद गेम नहीं खेल सकते थे. जिसे अब माता-पिता के कंट्रोल में बदल दिया गया है. यानी अगर माता पिता चाहें तभी रात 12 के बाद बच्चे गेम खेल सकते हैं.
चीन और दक्षिण कोरिया में ये कड़े नियम क्यों लागू किए गए. ताकि बच्चे अपने परिवार के साथ समय गुजार सकें. माता-पिता से बातें कर सकें. वर्चुअल वर्ल्ड में नहीं बल्कि रियल वर्ल्ड में रहें क्योंकि वर्चुअल वर्ल्ड आपको कैसे मौत के मुंह में धकेल देता है. गाजियाबाद की घटना इसका भी एक उदाहरण है.
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से भी आए ऐसे मामले
वर्ष 2023 में अमेरिका के कोलाराडो में एक ऐसा ही मामला सामने आया था. सिर्फ 13 साल की जूलियाना ने एक AI चैटबॉट से सवाल पूछे थे. सवाल के जवाब में चैटबॉट ने जूलियाना को सुसाइड करने का सुझाव दे दिया था जिसके बाद इस छोटी सी बच्ची ने अपनी जिंदगी खत्म कर ली थी. इसी तरह 2024 में सेवेल नाम के 14 साल के बच्चे ने AI से एक मशहूर वेब सीरीज के किरदार से जुड़ी जानकारी मांगी थी. AI ने बच्चे को बताया कि आपका फेवरेट कैरेक्टर कितने अलग-अलग तरीकों से सुसाइड कर सकता है. इसी जानकारी से प्रभावित होकर सेवेल ने आत्महत्या कर ली थी.
जिस तरह नशा इंसान को अपने चंगुल में जकड़ लेता है. कुछ इसी तरह आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने बच्चों और नौजवानों को मानो पिंजरे में कैद कर लिया है. अगर आज आप मिड-लाइफ यानी 40 या उससे ज्यादा की उम्र के हैं तो आपको वो दौर याद होगा जब खाली समय में आप बैठकर डीप थिंकिंग यानी गहरा चिंतन करते थे. अपने परिवार और जीवन के बारे में सोचते थे लेकिन क्या आज आप ऐसा करते हैं. हमें पता है अधिकतर लोग यही कहेंगे कि आज उनकी जिंदगी से डीप थिंकिंग की कोई जगह ही नहीं बची है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने ना सिर्फ हमारी जिंदगी से गहरे चिंतन को मिटा दिया है बल्कि हमारी दिमागी सक्रियता को भी कम कर दिया है.
AI पर बढ़ रही लोगों की निर्भरता
अमेरिकी संस्था MIT के एक सर्वे में सामने आया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बढ़ती निर्भरता की वजह से इंसानों के दिमाग की सक्रियता 32 प्रतिशत तक कम हो गई है. तकरीबन 83 प्रतिशत AI यूजर्स ये नहीं याद रख पाते कि चौबीस घंटे पहले उन्होंने क्या पढ़ा और लिखा था. एक रिसर्च ये भी कहती है कि लंबे वक्त तक आर्टिफिशियल इंटेजिलेंस को इस्तेमाल करने वाले लोगों का अटैंशन स्पैन यानी किसी वस्तु या घटना पर ध्यान लगाने का औसत समय 8 सेकेंड से भी कम हो गया है.
घंटों फोन के चंगुल में फंसा है इंसान
इन हालात आप कुछ इस तरह समझ सकते हैं कि अच्छे खासे इंसान को बैसाखी पकड़ा दी गई है. यानी आपके दिमाग की जैविक क्षमता जस की तस है लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने दिमाग को अपने ऊपर निर्भर बना दिया है. तकनीक ने हमारी जिंदगी को जितना आसान बनाया. उतना ही उसने जिंदगी पर कब्जा भी कर लिया. चाहे फिर वो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हो या फिर सोशल मीडिया. घंटों तक हम बेवजह फोन में घुसे रहते हैं. रील देखते रहते हैं और भूल जाते हैं कि हमारे इर्द गिर्द अपने भी हैं. परिवार है. बच्चे हैं. इसी वजह से आज बच्चों और उनके माता-पिता के बीच संवाद का समय भी कम हो गया है. मित्रों…ये एक बड़ी वजह है जिसकी वजह से माता-पिता बच्चों को समझ नहीं पाते और बच्चे भी अपनी बातें मम्मी-पापा को नहीं समझा पाते. जिंदगी की इसी कड़वी सच्चाई को समझने के लिए आपको कुछ आंकड़े ध्यान से देखने चाहिए .
सोशल मीडिया के कारण परिवारों में घट रहे संवाद
कई सर्वे बताते हैं कि स्मार्टफोन और सोशल मीडिया की वजह से परिवारों के अंदर संवाद की मात्रा 30 से लेकर 40 प्रतिशत तक कम हो गई थी. इस अध्ययन के अनुसार जब स्मार्टफोन नहीं आए थे तो परिवार के सदस्य रोजाना एक दूसरे से औसतन एक से डेढ़ घंटे तक बात करते थे लेकिन स्मार्टफोन आने के बाद ये समय घटकर 15 से 20 मिनट रह गया है. रिसर्च ये भी बताता है कि आज से 20 साल पहले पति-पत्नी औसतन हर दिन कम से कम दो घंटे एक साथ बिताते थे लेकिन आज ये औसत समय घटकर 30 से 45 मिनट पर आ गया है. इतना ही संवाद के इस कम हुए समय में भी सदस्य अपनी जरूरतों से जुड़ी बातें करते हैं . इसी वजह से परिवारों में भावनात्मक लगाव यानी इमोशनल जुड़ाव भी कम हो गया है.
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अभिनव त्रिपाठी जी न्यूज हिंदी में बतौर सब एडिटर कार्यरत हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में 3 साल से अधिक समय का अनुभव रखते हैं। डेस्क पर रियल टाइम की देश-विदेश की खबरों को कवर करते हैं। राष्ट्रीय राजन…और पढ़ें
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