वो 4 फैक्टर जिन्होंने वेस्ट यूपी को भाजपा के लिए 'चक्रव्यूह' बना दिया है! बढ़ा रही उलझन – AajTak

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उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव की राजनीतिक प्रयोगशाला पश्चिमी यूपी बनता जा रहा है. यहां की सियासी फिजाओं में गन्ने की मिठास कम और सियासत की गर्माहट ज्यादा महसूस हो रही है. सूबे में बीजेपी के लिए सबसे मजबूत दुर्ग माने जाने वाले वेस्ट यूपी के इलाके में लगातार सियासी उलझनें बढ़ती जा रही हैं. 
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के लिए पश्चिमी यूपी के लिए इलाके में हर रोज एक नई चुनौती खड़ी हो रही है. मेरठ में ‘बुलडोजर’ एक्शन का योगी सरकार डैमेज कन्ट्रोल भी नहीं कर पाई थी कि नोएडा में मजदूरों ने वेतन बढ़ोत्तरी के नाम पर आंदोलन कर बीजेपी की टेंशन को बढ़ा दिया है.  
वहीं,सपा प्रमुख अखिलेश यादव पश्चिमी यूपी पर ही खास फोकस कर रखा है. दादरी में गुर्जर समाज की रैली करने के बाद मुजफ्फरनगर में जाट समुदाय को साधने उतर रहे हैं. बीजेपी नेता संजीय बालियान बनाम संगीत सोम की सियासी अदावत से ठाकुर बनाम जाट की पॉलिटिक्स गहराती जा रही है. इस तरह बीजेपी के सामने अपने सियासी दुर्ग को बचाए रखने की चुनौती खड़ी होती जा रही है? 
बीजेपी के वोटबैंक पर सपा की नजर
पश्चिमी यूपी की सियासत में जाटों के साथ-साथ गुर्जर वोट बैंक को सत्ता की चाबी माना जाता है. अब तक बीजेपी के लिए मजबूत माने जाने वाले इस वोटबैंक अब सपा के रडार पर है.  अखिलेश यादव ने दादरी से मिशन-2027 का आगाज किया. सपा ‘पीडीए’ (PDA) के जरिए गुर्जर समाज को अपने पाले में लाने की बिसात बिछा चुके हैं, अगर गुर्जर-मुस्लिम-दलित का समीकरण बैठाने की है, जो बीजेपी का 2014 के बाद से मजूबत वोटबैंक बना हुआ है. सपा गुर्जरों को साधकर बीजेपी के समीकरण को बिगाड़ना चाहती है? 
अखिलेश यादव ने दादरी में गु्र्जर वोटबैंक को सियासी संदेश देने के बाद जाट समुदाय को साधने के लिए चौधरियों के सबसे बड़े मजबूत किले मुजफ्फरनगर में रैली करने की योजना बनाई है. मुजफ्फरनगर में योगी-जयंत की साझा रैली के बाद ही अखिलेश ने इस क्षेत्र में जाट और गुर्जर समीकरणों को साधने के लिए उतर रहे हैं. ये रैली सपा के स्थानीय सांसद हरेंद्र मलिक के द्वारा की जा रही है. जाट और गुर्जर के साथ अखिलेश यादव पश्चिमी यूपी में मुस्लिम समीकरण बनाकर बीजेपी को मात देना चाहते हैं. ये समीकरण सपा बनाने में कामयाब रहती है तो बीजेपी के लिए पश्चिमी यूपी के दुर्ग को बचाए रखना मुश्किल हो जाएगा. 
मेरठ में ‘बुलडोजर’ एक्शन बना टेंशन
मेरठ के शास्त्री नगर स्थित सेंट्रल मार्केट में बुलडोजर एक्शन के चलते बीजेपी के सियासी समीकरण को बिगाड़ दिया है.  सरकार के इस कदम के बाद स्थानीय लोगों और व्यापारियों में बड़ा असंतोष पैदा कर दिया है.  बुलडोजर कार्रवाई शुरू होते ही व्यापारियों ने भारी विरोध प्रदर्शन किया और आरोप लगाया कि वे सालों से बीजेपी को वोट देते आए हैं, लेकिन अब उन्हीं की दुकानें तोड़ी जा रही हैं.  अब व्यापारियों और मध्यम वर्ग में इस बात को लेकर सुगबुगाहट है कि क्या विकास के नाम पर सिर्फ उन्हीं को निशाना बनाया जा रहा है?
बुलडोजर एक्शन से नाराजगी इतनी बढ़ गई कि कुछ व्यापारियों ने विरोध स्वरूप अपनी दुकानों पर सपा के झंडे लगा दिए. मौके की नजाकत को देखते हुए सपा व्यापारियों के समर्थन में उतर गई और योगी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए . बुलडोजर एक्शन से खुद बीजेपी के स्थानीय नेता भी असहज नजर आए, भाजपा नेता विनीत अग्रवाल शारदा का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें वे व्यापारियों के लिए रोते हुए और अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते दिखे. 
नोएडा में मजदूर आंदोलन बनी चुनौती
दिल्ली से सटे नोएडा और ग्रेटर नोएडा में मजदूरों का बढ़ता आक्रोश बीजेपी के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है. वेतन वृद्धि, पीएफ और सुविधाओं को लेकर चल रहे आंदोलनों ने नोएडा ही नहीं पश्चिमी यूपी के औद्योगिक इलाके के माहौल को गर्म कर दिया है. नोएडा में मजदूरी कर रहे ज्यादातर श्रामिक भले ही पश्चिमी यूपी के न हो, लेकिन उनमें बड़ी संख्या में पूर्वांचल के हैं. 
हरियाणा में बीजेपी की सरकार ने मजदूरों के वेतन बढ़ाने का काम किया तो यूपी में योगी सरकार पर भी दबाव बन गया है, बीजेपी डैमेज कन्ट्रोल करने की कोशिश की है, लेकिन आंदोलन से यूपी की कानून व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. सरकार अब जिस तरह श्रामिकों के खिलाफ एक्शन ले रही है, उससे भी टेंशन बढ़ सकती है. अगर मजदूरों की यह नाराजगी वोट की चोट में बदली, तो नोएडा की चमकती सड़कों पर बीजेपी की सियासी राह पथरीली हो सकती है. 
बालियान बनाम संगीत सोम, जाट बनाम ठाकुर
पश्चिमी यूपी में बीजेपी ने जिस तरह से अलग-अलग जातियों में बिखरे हिंदुओं को एक छतरी के नीचे लाकर विपक्षी दलों का गेम बिगाड़ दिया था और अपना एकछत्र राज कायम रखा था. अब उसमें बिखराव होता दिख रही है तो दूसरी तरफ बीजेपी के नेताओं में सियासी अदावत ने सारे गेम को बिगाड़ रहा है.  संजीव बालियान और संगीत सोम के बीच की ‘कोल्ड वॉर’ अब जगजाहिर हो चुकी है, जिससे ठाकुर बनाम जाट होता दिखा रहा है.  
मुजफ्फरनगर से शुरू हुई यह चिंगारी पूरे वेस्ट यूपी में कार्यकर्ताओं को दो गुटों में बांट रही है.  बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व की तमाम कोशिशों के बाद भी संगीत सोम और संजीव बालियान की आपसी अदावत खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. 2024 के लोकसभा में बालियान अपनी हार के लिए संगीत सोम की भितरघात को वजह मान रहे हैं और 2027 में जाटों से हिसाब बराबर करने का चैलेंज भी कर रहे हैं. इस तरह से चुनाव में बीजेपी के लिए ‘भितरघात’ का बड़ा खतरा पैदा कर रही है. 
पश्चिम यूपी से तय होती यूपी की सत्ता 
पश्चिम यूपी के जरिए लखनऊ की सत्ता की दशा और दिशा तय होती है. बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में अपना राजनीतिक वनवास को पश्चिमी यूपी के जरिए ही खत्म करने में कामयाब रही है. 2014 और 2019 का लोकसभा चुनाव हो या फिर 2017 और 2022 का विधानसभा चुनाव, पश्चिमी यूपी में बीजेपी का पलड़ा भारी रही. 2024 में जरूर पश्चिमी के एक बेल्ट में बीजेपी को नुकसान उठाना पड़ा हो, लेकिन पूर्वांचल की तुलना में कम हुआ है. 
यूपी की कुल 403 विधानसभा सीटों में से 137 सीटें पश्चिमी यूपी में आती है, जो 26 जिलों में फैली हुई है. 2024 के लोकसभा चुनाव के लिहाज से विधानसभा सीटों में बढ़त देखे तो बीजेपी 78 विधानसभा सीट पर आगे थी तो सपा को 54 सीटों पर बढ़त मिली थी. दलित नेता चंद्रशेखर की पार्टी को 5 सीटों पर बढ़त मिली थी. बीजेपी ने इस चुनाव में जयंत चौधरी की आरएलडी से गठबंधन कर रखा था. अब सपा इस इलाके में जिस तरह से अपने सियासी समीकरण को दुरुस्त करने में जुटी है और बीजेपी के लिए लगातार बढ़ती चुनौती सियासी टेंशन बनती जा रही है. 
 
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