एक और अग्निकांड – Hindustan Hindi News

दिल्ली में एक बार फिर आगजनी की घटना ने नगर-व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं। आंशिक रूप से अवैध एक होटल में बुधवार सुबह लगी आग के चलते दोपहर ढलने तक 20 से ज्यादा लोग काल के गाल में समा गए। बताया जा रहा है, इस होटल को केवल छह कमरे की इजाजत थी, लेकिन वहां 25 कमरे बन गए थे। आग के कारणों का अभी स्पष्ट पता नहीं चला है, लेकिन जांच में दूध का दूध और पानी का पानी होना जरूरी है। दिल्ली पुलिस ने होटल में लगी आग की त्रासदी के लिए गैर-इरादतन हत्या के आरोप में एफआईआर दर्ज की है। यहां एक बार जरूर सोचना चाहिए कि जब नियम तोड़कर होटल चलाया जा रहा था, तब इस हादसे को इरादतन हत्या क्यों न माना जाए? जो लोग सुरक्षा मानकों से समझौता नहीं, बल्कि खिलवाड़ करते हैं, उन्हें अच्छे से पता होता है कि खतरा कितना बड़ा है। कम जगह में ज्यादा कमाई के लोभ में इंसानी जिंदगी से समझौता क्या गैर-इरादतन हत्या है? जरा सोचिए, उनके बारे में, जिनकी जान चली गई। पूछिए शाेक संतप्त परिजनों से कि जांच और न्याय की दिशा क्या होनी चाहिए?
मालवीय नगर के इस होटल में परत-दर-परत कोताहियां खुल रही हैं? अब इतने लोगों की जान जाने के बाद यह केवल कोताही नहीं, जघन्य अपराध है। क्या होटल में केवल एक ही प्रवेश-निकास द्वार था? ऐसे सवाल बहुत गंभीर हो गए हैं। पांच मंजिला इमारत में विदेशी भी मारे गए हैं। इस घटना ने पूरी राजधानी को झकझोर दिया है और यहां भवन सुरक्षा पर फिर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सुरक्षा के बुनियादी मानकों की अनदेखी अक्सर भारी पड़ती है, लेकिन वास्तव में पूरी कड़ाई से कार्रवाई और सुधार न करने की वजह से आगजनी की घटनाओं का सिलसिला थम नहीं रहा है। गर्मी के दिनों में वैसे भी आगजनी होती है और दमकल को कुछ मशक्कत के बाद आग पर काबू करने में कामयाबी भी मिल जाती है, लेकिन इस आगजनी में पीड़ित जन भाग नहीं पाए। अगर होटल से निकलना आसान रहता, तो इतनी मौतें न होतीं। अनेक होटलों में यह देखा जाता है कि मुनाफे के लिए सुरक्षा मानकों से तमाम मुमकिन समझौते किए जाते हैं। किसी भी भवन में एक से अधिक निकलने के मार्ग होने ही चाहिए। खासकर होटलों या विश्रामगृहों में तो दो से अधिक निकासी मार्ग जरूरी हैं। दिल्ली के इस होटल में अगर बाहर निकलने के एकाधिक मार्ग होते, तो मेहमानों की जान यूं न जाती।
यह अक्सर देखा जाता है कि होटलों को ऐसे किले में तब्दील कर दिया जाता है कि किसी हादसे की स्थिति में बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। तपते जून में ही साल 1997 में उपहार सिनेमा अग्निकांड को दिल्ली और देश ने अभी भुलाया नहीं है। बेशर्म लापरवाहियों के चलते तब 59 लोगों की जान गई थी और 103 लोगों की जिंदगी मुश्किल से बची थी। उपहार हादसे के समय भी सिनेमा देख रहे लोग जान बचाने के लिए भाग नहीं पाए थे। बिजली कटने से अंधेरा हो गया था और भागने के रास्तों पर भी लगा दी गई कुर्सियां मौत का जाल बन गई थीं। क्या हमने उपहार अग्निकांड से कुछ सीखा है? क्या तब सरकार व गैर-सरकारी दोषियों को पर्याप्त सजा हुई थी? कोई दोराय नहीं कि आग, जलभराव और भगदड़ से बचने के लिए दिल्ली में युद्ध स्तर पर इंतजाम होने चाहिए। सुरक्षा मानकों से खिलवाड़ थमना चाहिए। दिल्ली को एक मिसाल बनकर देश के सामने आना चाहिए। हर शहर को अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए कि वह कितना सुरक्षित है?
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