मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली, अब क्या रास्ता बचा है? – BBC

इमेज स्रोत, SHEKHAR YADAV/The India Today Group via Getty Images
सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन की याचिका ख़ारिज करते हुए कहा है कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान अदालत आमतौर पर हस्तक्षेप नहीं करती और ऐसे मामलों में हाई कोर्ट में इलेक्शन पिटिशन दाखिल करना ही विकल्प है.
इलेक्शन पिटिशन वह कानूनी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से संसद, विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनावों के परिणामों की वैधता की जांच की जाती है.
दूसरे शब्दों में, यह कानून के तहत किसी उम्मीदवार के निर्वाचन को चुनौती देने का एक माध्यम है.
मध्य प्रदेश की तीनों राज्यसभा सीटों पर बीजेपी के उम्मीदवार तरुण चुघ, रजनीश अग्रवाल और महेश केवट निर्विरोध निर्वाचित घोषित हो चुके हैं.
लेकिन इस फैसले के बाद भी विवाद ख़त्म नहीं हुआ है. अब बहस दो सवालों पर केंद्रित है.
पहला, क्या मीनाक्षी नटराजन के पास अभी कोई क़ानूनी रास्ता बचा है? और दूसरा, क्या रिटर्निंग ऑफिसर को नामांकन रद्द करने की इतनी व्यापक शक्ति प्राप्त है कि वह किसी उम्मीदवार को चुनावी मैदान से ही बाहर कर दे?
मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद कांग्रेस ने पहले चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाया था.
पार्टी के वरिष्ठ नेताओं केसी वेणुगोपाल, जयराम रमेश, सचिन पायलट और भूपेश बघेल ने नई दिल्ली स्थित चुनाव आयोग के दफ़्तर पहुंचकर हस्तक्षेप की मांग की थी.
समाप्त
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद मीनाक्षी नटराजन ने कहा, "यह मेरी व्यक्तिगत हार नहीं है. यह भारत के लोकतंत्र और संविधान के लिए झटका है."
उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने उनकी शिकायत पर समय रहते कोई फैसला नहीं लिया.
नटराजन ने कहा, "हमारे नेता चुनाव आयोग गए थे, लेकिन 48 घंटे तक हमें कोई जवाब नहीं मिला. कम से कम सुप्रीम कोर्ट ने हमारी बात सुनी और फ़ैसला दिया."
इमेज स्रोत, Ishant Chauhan/Hindustan Times via Getty Images
वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं.
एपिसोड
समाप्त
शुक्रवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 329(बी) चुनावी प्रक्रिया के दौरान अदालतों के हस्तक्षेप पर रोक लगाता है.
अदालत ने कहा कि नामांकन स्वीकार या निरस्त किए जाने जैसे विवादों को आम तौर पर चुनाव पूरा होने के बाद चुनाव याचिका के जरिए चुनौती दी जाती है.
कोर्ट ने यह तर्क भी स्वीकार नहीं किया कि अगर नामांकन कथित रूप से गलत या मनमाने तरीके से रद्द किया गया हो तो भी तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप ज़रूरी हो जाता है.
इसके साथ ही अदालत ने मीनाक्षी नटराजन की याचिका ख़ारिज कर दी लेकिन यह स्पष्ट किया कि उनके लिए चुनाव याचिका दायर करने का रास्ता खुला रहेगा.
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत किसी चुनाव को चुनौती देने का मुख्य तरीका चुनाव याचिका है. यह याचिका परिणाम घोषित होने के 45 दिनों के भीतर संबंधित हाई कोर्ट में दायर की जा सकती है.
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 100 में यह भी प्रावधान है कि यदि किसी उम्मीदवार का नामांकन "गलत तरीके से खारिज" किया गया हो तो अदालत चुनाव को निरस्त कर सकती है.
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागड़िया ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "देखिए अब तो कोई और रास्ता बचा नहीं है, सिवाय हाई कोर्ट में इलेक्शन पिटिशन यानी कि चुनाव याचिका लगाने के. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने कमेंट करने से मना कर दिया है और जिस इलेक्शन कमीशन को रिटर्निंग अधिकारी के मनमाने फैसले पर हस्तक्षेप करना था उस बॉडी ने पूरे दो दिन कुछ कहा ही नहीं. उनकी चुप्पी के चलते रिटर्निंग अधिकार ने कल तीनों बीजेपी के नेताओं को जीत का सर्टिफिकेट थमा दिया".
अजय ने कहा कि मीनाक्षी नटराजन के पास अब हाई कोर्ट का ही रास्ता बचा है लेकिन उन्होंने यह भी कहा, "हाई कोर्ट में जाने के बाद कोई भी चुनाव याचिका पर फैसला आने में बहुत समय लगता है. इतना समय लगता है कि फैसला आने तक अगले चुनाव का समय आ जाएगा".
बहरहाल, इस पूरे मामले ने चुनाव में रिटर्निंग ऑफिसर की शक्तियों पर बहस छेड़ दी है.
समाप्त
इमेज स्रोत, RAHUL KOTHARI/FACEBOOK
पूरे विवाद की शुरुआत उस शिकायत से हुई जिसे बीजेपी के प्रदेश महामंत्री राहुल कोठारी ने रिटर्निंग ऑफिसर के समक्ष दायर किया था.
शिकायत में कहा गया था कि हैदराबाद की एक अदालत में लंबित एक निजी परिवाद में मीनाक्षी नटराजन आरोपी क्रमांक चार के रूप में नामजद हैं और इसकी जानकारी उन्होंने नामांकन के साथ दाखिल फॉर्म 26 में नहीं दी.
सुनवाई के बाद रिटर्निंग ऑफिसर अरविंद शर्मा ने उनका नामांकन निरस्त कर दिया.
अपने आदेश में उन्होंने कहा कि उपलब्ध अभिलेखों से यह सिद्ध होता है कि संबंधित मामले में अदालत संज्ञान ले चुकी थी, उम्मीदवार को समन जारी किए जा चुके थे और उन्होंने स्वयं उस मामले में जवाब भी दाखिल किया था.
समाप्त
इमेज स्रोत, Ishant Chauhan/Hindustan Times via Getty Images
कांग्रेस की ओर से पेश अधिवक्ता अजय गुप्ता ने कहा कि जिस नोटिस का उल्लेख किया जा रहा है वह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 223(1) के तहत जारी किया गया था.
उनका तर्क था कि अदालत ने अभी किसी आपराधिक मामले का संज्ञान नहीं लिया था और इसलिए इसका उल्लेख चुनावी हलफनामे में करना अनिवार्य नहीं था.
रिटर्निंग ऑफिसर के फ़ैसले के बाद सवाल यह है कि क्या उन्हें यह तय करने का अधिकार था कि मामला ऐसा है जिसे फॉर्म 26 में घोषित किया जाना चाहिए था या नहीं.
बीबीसी से बातचीत में मध्य प्रदेश विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव और पूर्व रिटर्निंग ऑफिसर भगवान देव इसरानी ने रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले पर सवाल उठाए.
उन्होंने कहा, "चुनाव आयोग की हैंडबुक और स्थापित चुनावी परंपरा का मूल सिद्धांत यह है कि जहां तक संभव हो, उम्मीदवार का नामांकन बचाए रखा जाए और चुनाव होने दिया जाए. चुनाव आयोग की हैंडबुक में भी यह उल्लेख है कि यदि निर्धारित हलफ़नामा दाखिल कर दिया गया है, लेकिन उसमें कोई त्रुटि, कमी या कथित गलत जानकारी पाई जाती है, तो केवल उसी आधार पर नामांकन खारिज नहीं किया जाना चाहिए."
इसरानी ने कहा, "रिटर्निंग ऑफिसर को दिए गए अधिकारों का इस्तेमाल बहुत सीमित परिस्थितियों में किया जाना चाहिए. उनका काम चुनावी प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है, न कि कानून की व्यापक व्याख्या करके उम्मीदवारों को चुनाव से बाहर करना."
उन्होंने झारखंड के राज्यसभा चुनाव का उदाहरण देते हुए कहा, "अभी झारखंड में परिमल नथवानी के मामले में नामांकन पत्र में पाई गई कमियों को सुधारने का अवसर दिया गया था. यहां भी ऐसी ही प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी".
इसी बातचीत में इसरानी ने यह भी कहा कि जिस व्याख्या के तहत मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द किया गया है वह गलत है.
उन्होंने कहा, " लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 कि धारा 33 के तहत ऐसे मामलों की जानकारी देना अनिवार्य है जिनमें कोर्ट ने आरोप तय कर लिए हों. मीनाक्षी नटराजन के मामले में तो एफ़आईआर तक दर्ज नहीं है इसलिए नियम के हिसाब से इस मामले की जानकारी देना अनिवार्य नहीं था".
वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी इस फैसले पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, ''सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव याचिका का रास्ता सुझाया है. ऐसी याचिकाओं पर फैसला आने में कम से कम दो से तीन साल लग जाएंगे और और उसके बाद अपील वगैरह को जोड़ लें तो पूरा राज्य सभा कार्यकाल ही खत्म हो जाएगा.''
उन्होंने रिटर्निंग ऑफिसर के फ़ैसले पर लिखा, "कुल मिलाकर स्थिति यह बनती है कि एक रिटर्निंग ऑफिसर किसी उम्मीदवार को पहली ही नज़र में और मनमाने तरीके से अयोग्य ठहरा सकता है और इस फैसले के ख़िलाफ़ तत्काल कोई कानूनी उपाय उपलब्ध नहीं है. क्या तो मास्टरस्ट्रोक है".
समाप्त
इमेज स्रोत, Getty Images
भारत में चुनावी इतिहास में नामांकन पत्रों को लेकर विवाद नए नहीं हैं.
अक्टूबर 2025 में पंजाब राज्यसभा उपचुनाव के दौरान निर्दलीय उम्मीदवार नवनीत चतुर्वेदी का नामांकन रिटर्निंग ऑफिसर ने ख़ारिज कर दिया था. इसके बाद आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार राजेंद्र गुप्ता निर्विरोध निर्वाचित हो गए.
रिटर्निंग ऑफिसर ने चतुर्वेदी का नामांकन यह कहते हुए ख़ारिज किया था कि नामांकन पत्र में प्रस्ताव विधायकों के हस्ताक्षरों को लेकर गंभीर आपत्तियां थीं और उन्हें फ़र्जी माना गया था.
चतुर्वेदी ने बाद में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में चुनाव याचिका दायर कर आरोप लगाया कि उनके नामांकन को गलत तरीके से ख़ारिज किया गया था और उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया.
मामला अदालत तक पहुंचा और हाई कोर्ट ने सुनवाई शुरू की है.
मीनाक्षी नटराजन के मामले में भी अब बहस का केंद्र यही है कि क्या रिटर्निंग ऑफ़िसर ने कानून की सही व्याख्या की थी और क्या उनका नामांकन वास्तव में खारिज किया जाना चाहिए था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
समाप्त
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
© 2026 BBC. बाहरी साइटों की सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है. बाहरी साइटों का लिंक देने की हमारी नीति के बारे में पढ़ें.

source.freeslots dinogame telegram营销

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Toofani-News