आसमान का सिकंदर है एयरफोर्स का AN-32 विमान, जानिए इसके बारे में – AajTak

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भारतीय वायु सेना (IAF) के बेड़े में शामिल ‘एंतोनोव एन-32’ (An-32) को देश का सबसे भरोसेमंद और ‘वर्कहॉर्स’ ट्रांसपोर्ट विमान माना जाता है. सोवियत संघ के एंतोनोव डिजाइन ब्यूरो द्वारा विशेष रूप से भारत की जरूरतों के अनुसार तैयार किया गया यह विमान पिछले चार दशकों से भारतीय वायु सेना की रीढ़ बना हुआ है. 
उत्तर-पूर्व भारत के असम, अरुणाचल प्रदेश की ऊंची पहाड़ियों से लेकर सियाचिन और लद्दाख के दुर्गम इलाकों तक, इस विमान ने भारतीय सेना को रसद पहुंचाने और आपातकालीन अभियानों में अभूतपूर्व भूमिका निभाई है. असम और अरुणाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में हुए विमान हादसों के बाद यह जुड़वां इंजन वाला टर्बोप्रॉप विमान अक्सर चर्चा में रहता है. 
भारतीय वायु सेना में कब शामिल हुआ An-32?
वायु सेना में एंट्री (1984): एंतोनोव An-32 विमान को भारतीय वायु सेना में आधिकारिक तौर पर साल 1984 में शामिल किया गया था. 1970 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और सोवियत संघ के नेता लियोनिद ब्रेझनेव के बीच मजबूत रणनीतिक संबंधों के चलते इस विमान की खरीद का सौदा हुआ था. 
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वायु सेना को अपने पुराने हो चुके ‘डगलस सी-47 डकोटा’ और ‘फेयरचाइल्ड सी-119जी पैकेट’ विमानों को बदलने के लिए एक ऐसे विमान की तलाश थी, जो भारत के अत्यधिक गर्म और अत्यधिक ऊंचाई वाले हवाई अड्डों पर आसानी से काम कर सके.   
विमानों की कुल संख्या: भारत ने शुरुआत में सोवियत संघ से कुल 118 से 123 An-32 विमान खरीदे थे. फिलहाल भारतीय वायु सेना के बेड़े में लगभग 100 के करीब An-32 विमान सक्रिय सेवा में हैं. इनमें से कई विमानों को अपग्रेड करके ‘An-32RE’ संस्करण में बदला जा चुका है, जिसमें आधुनिक एवियोनिक्स, नया रडार सिस्टम और बेहतर केबिन लेआउट शामिल हैं.   
एंतोनोव An-32 की खासियत
An-32 के पंखों के ऊपर लगे विशालकाय इंजन इसकी सबसे बड़ी पहचान हैं.
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An-32 Aircraft Indian Air Force
सबसे ज्यादा खास है इसका इंजन… 
इसके इंजन पंखों के ऊपर 1.5 मीटर की ऊंचाई पर लगाए गए हैं. ऐसा इसलिए किया गया है ताकि कच्चे, रेतीले या बिना बने हवाई अड्डों पर लैंडिंग या टेक-ऑफ के दौरान जमीन का कंकड़-पत्थर या मलबा खिंचकर इंजन के अंदर न जाए और इंजन सुरक्षित रहे. यह विमान 4,500 मीटर की ऊंचाई वाले हवाई अड्डों और 55 डिग्री सेल्सियस तक के अत्यधिक गर्म तापमान में भी उड़ान भरने में सक्षम है.   
भारतीय युद्धों और सैन्य अभियानों में An-32 की भूमिका
भले ही An-32 एक लड़ाकू विमान नहीं है, लेकिन इसके बिना भारतीय सेना की कोई भी बड़ी जीत या ऑपरेशन अधूरा रहता। इसने भारत के कई ऐतिहासिक सैन्य ऑपरेशनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई…
ऑपरेशन पवन (श्रीलंका, 1987-1990): भारतीय शांति सेना को श्रीलंका भेजने और जाफना में एलटीटीई (LTTE) के खिलाफ युद्ध के दौरान सैनिकों, हथियारों और रसद की निरंतर आपूर्ति बनाए रखने में An-32 ने दिन-रात उड़ानें भरीं.
ऑपरेशन कैक्टस (मालदीव, 1988): जब मालदीव में तख्तापलट की कोशिश हुई, तो भारतीय पैराट्रूपर्स को तुरंत मालदीव के हुलहुले द्वीप पर सुरक्षित उतारने और वहां शांति बहाल करने में An-32 विमानों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
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कारगिल युद्ध (1999): कारगिल की बर्फीली चोटियों पर पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध के दौरान, इन विमानों का उपयोग श्रीनगर, लेह और थॉइस हवाई अड्डों पर भारी सैन्य साजो-सामान, गोला-बारूद और जवानों को आपातकालीन रूप से पहुंचाने के लिए किया गया था.
सियाचिन ग्लेशियर और एएलजी: यह विमान आज भी अरुणाचल प्रदेश के मेचुका, विजयनगर और लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी (DBO) जैसे दुनिया के सबसे खतरनाक एडवांस लैंडिंग ग्राउंड्स पर भारतीय सेना की जीवनरेखा बना हुआ है.
मानवीय सहायता और रेस्क्यू मिशन्स 
युद्ध के अलावा, भारत में जब भी कोई प्राकृतिक आपदा आई, An-32 सबसे पहले देवदूत बनकर पहुंचा…
2004 की सुनामी: हिंद महासागर में आई सुनामी के बाद अंडमान-निकोबार द्वीप समूह तक आपातकालीन राहत सामग्री, दवाइयां और डॉक्टरों की टीम पहुंचाने का काम इसी विमान ने किया था.
केदरनाथ आपदा (2013): उत्तराखंड की भयंकर बाढ़ के दौरान पहाड़ी घाटियों के बेहद संकरे रास्तों के बीच से उड़ान भरकर इस विमान ने भारी मात्रा में राहत सामग्री पहुंचाई और फंसे हुए लोगों को एयरलिफ्ट करने में मदद की.
कोविड-19 महामारी (2020-21): कोरोना संकट के दौरान देश के दूरदराज के हिस्सों, विशेषकर उत्तर-पूर्व और लद्दाख के पहाड़ी क्षेत्रों में ऑक्सीजन सिलेंडर, टेस्टिंग किट और वैक्सीन की खेप पहुंचाने में वायु सेना के An-32 विमानों ने निरंतर उड़ानें भरीं.
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शुरुआत से अब तक का क्रैश रिकॉर्ड 
अपनी बेहतरीन क्षमताओं के बावजूद, An-32 का भारत में एक दर्दनाक क्रैश रिकॉर्ड भी रहा है. पहाड़ी इलाकों में खराब मौसम, घने कोहरे और ‘अंधेरी घाटियों’ के कारण यह विमान कई बड़े हादसों का शिकार हुआ है. शुरुआत से अब तक के कुछ सबसे प्रमुख हादसे इस प्रकार हैं…
25 मार्च 1986 (ओमान से भारत): सोवियत संघ से भारत लाए जा रहे तीन An-32 विमानों में से एक (रजिस्ट्रेशन K2729) मस्कट से जामनगर (गुजरात) की उड़ान के दौरान अरब सागर के ऊपर रहस्यमयी तरीके से लापता हो गया. विमान में सवार सभी 7 कर्मी कभी नहीं मिले.   
1989 और 1990 के दशक के हादसे: इस दौरान उत्तर-पूर्व के पहाड़ी और घने जंगलों वाले इलाकों में लैंडिंग के प्रयास के दौरान कुछ विमान क्रैश हुए, जिनमें वायु सेना के जांबाज सैनिकों ने अपनी जान गंवाई.   
7 मार्च 1999 (दिल्ली क्रैश): ग्वालियर से दिल्ली आ रहा एक An-32 विमान इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास घने कोहरे के कारण रनवे से महज 2.4 किलोमीटर पहले एक पानी की टंकी और बिजली के तारों से टकराकर पप्पू कॉलोनी (पालम) में क्रैश हो गया. इस हादसे में विमान में सवार 18 लोगों के साथ-साथ जमीन पर मौजूद 3 नागरिकों सहित कुल 21 लोगों की मौत हो गई थी.   
9 जून 2009 (अरुणाचल प्रदेश): असम के जोरहाट से अरुणाचल प्रदेश के मेचुका जा रहा एक An-32 विमान क्रैश हो गया, जिसमें सवार सभी 13 सैन्य कर्मियों की मौत हो गई.
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22 जुलाई 2016 (बंगाल की खाड़ी का रहस्यमयी क्रैश): ताम्बरम (चेन्नई) से पोर्ट ब्लेयर जा रहा वायु सेना का एक An-32 विमान (K-2743) अचानक रडार से गायब हो गया. इसमें 29 लोग सवार थे. यह भारत के इतिहास का सबसे बड़ा समुद्री खोज अभियान बना. करीब 8 साल बाद, जनवरी 2024 में गहरे समुद्र में खोज करने वाले ऑटोनॉमस सबमरीन (AUV) ने चेन्नई तट से दूर 3,400 मीटर की गहराई में इसके मलबे को खोज निकाला, जिससे पुष्टि हुई कि विमान समुद्र में समा गया था.   
3 जून 2019 (असम-अरुणाचल सीमा): असम के जोरहाट से उड़ान भरने के ठीक 33 मिनट बाद एक An-32 विमान अरुणाचल प्रदेश के घने जंगलों और परी पहाड़ियों के पास क्रैश हो गया. खराब मौसम के कारण हुए इस हादसे में विमान में सवार सभी 13 वायु सैनिकों की शहादत हो गई थी.   
Antonov An-32 भारतीय वायु सेना का एक ऐसा पुराना और वफादार सिपाही है जिसने मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में देश की सेवा की है. हालांकि इसकी उम्र और समय-समय पर होने वाले हादसों को देखते हुए भारत अब स्पेनिश-यूरोपीय मूल के आधुनिक Airbus C-295 परिवहन विमानों को अपने बेड़े में शामिल कर रहा है, जो धीरे-धीरे इस बूढ़े होते सिकंदर की जगह लेंगे.
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