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किसी इंसान के दोनों पैर कट जाएं तो आमतौर पर उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है. कई लोग ऐसी स्थिति में अपने सपनों को छोड़ देते हैं. लेकिन एक शख्स ने साबित कर दिया कि अगर हौसला मजबूत हो तो कोई भी मुश्किल रास्ता रोक नहीं सकती. अफगानिस्तान में हुए एक बम धमाके में अपने दोनों पैर गंवाने के बावजूद उसने हार नहीं मानी और दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों में गिने जाने वाले सात बड़े पर्वतों पर चढ़ाई कर इतिहास रच दिया.
यह कहानी है 46 साल के हरी बुद्धा मगर की, जिन्हें अब दुनिया के पहले ऐसे डबल एम्प्यूटी (दोनों पैर गंवा चुके) पर्वतारोही के रूप में जाना जाता है. इन्होंने दुनिया के ‘सेवन समिट्स’ यानी सात महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों पर सफलतापूर्वक चढ़ाई की है. इस उपलब्धि के लिए उन्हें पांचवां गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड भी मिला है.
बम धमाके में गंवा दिए थे दोनों पैर
हरी बुद्धा मगर नेपाल में पैदा हुए थे. पहाड़ों के बीच एक बेहद साधारण परिवार में उनका बचपन बीता. बाद में वह ब्रिटिश सेना की प्रसिद्ध गोरखा रेजिमेंट में शामिल हुए. 12 हजार आवेदकों में से चुने गए 230 लोगों में उनका नाम था.
लेकिन साल 2010 में अफगानिस्तान में तैनाती के दौरान उनकी जिंदगी बदल गई. एक आईईडी यानी सड़क किनारे लगाए गए बम पर पैर पड़ने से जोरदार विस्फोट हुआ और उनके दोनों पैर घुटनों के ऊपर से कट गए.किसी के लिए भी यह जिंदगी का सबसे बड़ा झटका हो सकता था, लेकिन हरी ने इसे अपनी हार नहीं बनने दिया.
व्हीलचेयर से शुरू हुआ नया सफर
धमाके के बाद शुरुआत में उनका लक्ष्य सिर्फ इतना था कि वह जमीन से खुद को उठाकर व्हीलचेयर तक पहुंच सकें. लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने अपने सपनों को फिर से जीना शुरू किया.
बचपन से ही उनका सपना दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने का था. कृत्रिम पैरों (प्रोस्थेटिक लेग्स) की मदद से उन्होंने पर्वतारोहण की ट्रेनिंग शुरू की और असंभव लगने वाले लक्ष्य की तरफ बढ़ते गए.
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एवरेस्ट फतह कर रच दिया इतिहास
मई 2023 में हरी बुद्धा मगर ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक चढ़ाई कर इतिहास रच दिया. वह घुटनों के ऊपर से दोनों पैर गंवा चुके पहले व्यक्ति बने, जिन्होंने एवरेस्ट की चोटी पर कदम रखा. लेकिन उनका सफर यहीं नहीं रुका.
सात महाद्वीपों की सात सबसे ऊंची चोटियां कीं फतह
एवरेस्ट के बाद हरी ने दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पर्वतारोहण अभियानों में से एक ‘सेवन समिट्स’ पूरा करने का लक्ष्य रखा. इसमें नेपाल का माउंट एवरेस्ट, तंजानिया का किलिमंजारो, अमेरिका के अलास्का का डेनाली, अर्जेंटीना का एकोनकागुआ, अंटार्कटिका का विंसन मैसिफ, न्यू गिनी का कार्स्टेन्स पिरामिड और रूस का एल्ब्रुस पर्वत शामिल हैं.
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हालांकि रूस-यूक्रेन युद्ध और अन्य कारणों से पश्चिमी देशों के लोगों के लिए एल्ब्रुस पहुंचना मुश्किल था. इसलिए गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने फ्रांस के मोंट ब्लांक को वैकल्पिक पर्वत के रूप में मान्यता दी.
जनवरी 2026 में अंटार्कटिका के माउंट विंसन पर चढ़ाई के साथ हरी ने अपना मिशन पूरा कर लिया और सेवन समिट्स फतह करने वाले दुनिया के पहले डबल एम्प्यूटी पर्वतारोही बन गए.
पांच गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम
हरी के नाम अब पांच गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड दर्ज हैं. इनमें डबल एम्प्यूटी के तौर पर माउंट एवरेस्ट, डेनाली और पंकाक जया जैसी कठिन चोटियों पर चढ़ाई करने के रिकॉर्ड भी शामिल हैं.उनकी इस उपलब्धि को देखते हुए गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने उन्हें अपने प्रतिष्ठित ‘ICON’ सम्मान से भी नवाजा है.
हरी का कहना है कि उनका मकसद सिर्फ रिकॉर्ड बनाना नहीं है. वह दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि दिव्यांगता किसी व्यक्ति की पहचान नहीं होती. उनके मुताबिक, लोगों ने उन्हें कई बार कहा कि वह यह नहीं कर सकते, लेकिन उन्होंने हर बार अपनी मेहनत और जिद से गलत साबित कर दिया.
अब अंतरिक्ष या समुद्र की गहराई पर नजर
इतनी बड़ी उपलब्धियों के बाद भी हरी रुकने वाले नहीं हैं. उनका कहना है कि भविष्य में वह उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव तक पहुंचने या समुद्र की सबसे गहरी जगहों तक जाने जैसी नई चुनौतियों को आजमाना चाहते हैं. यहां तक कि वह अंतरिक्ष यात्रा की संभावना से भी इनकार नहीं करते.
हरी बुद्धा मगर की कहानी सिर्फ पर्वतारोहण की नहीं, बल्कि जज्बे, हिम्मत और कभी हार न मानने की मिसाल है. दोनों पैर खोने के बाद भी उन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों को फतह कर दिखाया कि इंसान की सबसे बड़ी ताकत उसका शरीर नहीं, बल्कि उसका हौसला होता है.
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