पंजीकृत बिक्रीनामा कानूनी रूप से वैध, मामूली गलती पर नहीं किया जा सकता है संदेह- सुप्रीम कोर्ट – Live Hindustan

नई दिल्ली। विशेष संवाददाता सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि चूंकि पंजीकृत बिक्रीनामा (सेल डीड) कानूनी तौर पर वैध माना जाता है, इसलिए कुछ मामूली खामियों के चलते इसके निष्पादन पर संदेह नहीं किया जा सकता है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि पंजीकृत बिक्रीनामा अपनी वैधता गवाही से प्राप्त नहीं करती है।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और एन.वी. अंजारिया की पीठ ने चकबंदी अधिकारी (कंसोलिडेशन अधिकारियों) और हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दाखिल अपील को स्वीकार करते हुए यह फैसला दिया है। चकबंदी अधिकारी और हाईकोर्ट ने पंजीकृत बिक्रीनामा में कुछ खामियां होने के आधार पर ‌अपीलकर्ताओं के संबंधित संपत्ति पर मालिकाना हक को मानने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि बिक्रीनामा में गवाही देने वाले गवाह की जानकारी में अंतर था। बिक्रीनामा की सत्यापित कॉपी में गवाह को ‘निहंदपुर सुथारी का निवासी, बारू’ बताया गया था, जबकि लगभग चार दशक बाद गवाही देते समय गवाह ने खुद को ‘नासिरपुर कलां का निवासी, नत्थू का बेटा, बारू’ बताया। अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि ‘ऐसी विसंगतियां मामूली थीं और पंजीकृत सेल डीड की वैधता की धारणा को खत्म नहीं कर सकती थीं क्योंकि इसकी (सेल डीड) की वैधता की धारणा गवाही से नहीं आती है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया है कि ‘सेल डीड की वैधता के लिए गवाही कोई कानूनी आवश्यकता नहीं है। वसीयत या उपहार जैसे दस्तावेजों के विपरीत, सेल डीड अपनी वैधता गवाही से प्राप्त नहीं करती है। ऐसे में गवाही देने वाले गवाही की जानकारी से संबंधित मामूली विसंगतियां, अपने आप में, पंजीकृत बिक्रीनामा के निष्पादन को संदिग्ध नहीं बना सकती हैं, खासकर तब जब दस्तावेज में अन्यथा रजिस्टर्ड दस्तावेजों से जुड़ी कानूनी धारणा मौजूद हो।’

सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा है कि जब बिक्रीनामा की सत्यापित कॉपी में गवाह को निहंदपुर सुथारी का निवासी बारू बताया गया है, तो गवाह के बयान में मामूली अंतर, जो सेल डीड बनने के कई दशकों बाद दर्ज किया गया था, सेल डीड की असलियत पर सवाल उठाने का आधार नहीं हो सकता। ऐसा इसलिए है क्योंकि पंजीकृत सेल डीड को ‘वैध’ माना जाता है। पीठ ने कहा है कि मौजूदा मामले में पेश पंजीकृत ‌सेल डीड की सत्यापित कॉपी को असली और सही तरीके से सत्यापित माना जाता है, खासकर तब जब सेल डीड की असलियत पर कभी सवाल ही नहीं उठाया गया हो।

मौजूदा मामला हरिद्वार में मौजूद खेती की जमीन से जुड़ा है जिसे 4 जून 1957 को एक पंजीकृत बिक्रीनामा के जरिए खरीदा गया था। अपीलकर्ताओं का दावा था कि खरीद की तारीख से ही जमीन पर उनका कब्जा था और उन्होंने राजस्व रिकॉर्ड में अपने नाम दर्ज कराने (म्यूटेशन) की मांग की थी। हालांकि, चकबंदी अधिकारियों ने उनके दावे को खारिज कर दिया। चंकबंदी अधिकारियों ने कहा था कि बिक्रीनामा के निष्पादन को साबित नहीं किया जा सका और यह लेन-देन उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 154 का उल्लंघन है, जो तय सीमा से अधिक जमीन के हस्तांतरण पर रोक लगाती है।

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