नई दिल्ली, एजेंसी। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को चुनाव आयोग, पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य निर्वाचन कार्यालय से एसआईआर प्रक्रिया पर जवाब मांगा है। अदालत एसआईआर के दौरान हटाए गए मतदाताओं द्वारा दायर दावों और आपत्तियों का विधानसभावार आंकड़ा सार्वजनिक करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही है। याचिका में दावा किया गया है कि नाम हटने से कई लोगों को सरकारी राशन और अन्य योजनाओं का लाभ, जाति प्रमाणपत्र नहीं मिल पा रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची व वी. मोहना की पीठ ने पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी की एसआईआर समिति के अध्यक्ष प्रसेनजीत बोस की याचिका पर सुनवाई की। अधिवक्ता नेहा राठी के जरिये दायर याचिका में फॉर्म छह, सात की संख्या (दायर, स्वीकृत और अस्वीकृत) और अपीलीय न्यायाधिकरण के सामने अपील लंबित रहने पर निस्तारण से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की गई है। बोस की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकर नारायण ने कहा कि हटाए गए मतदाताओं के दावों-आपत्तियों के निस्तारण के लिए 18 न्यायाधिकरण जिस तरह काम कर रहे हैं, उससे कथित तौर पर देरी हो रही है। उन्होंने दावा किया कि मतदाता सूची से नाम हट जाने से लोग राज्य में सार्वजनिक वितरण प्रणाली और अन्नपूर्णा जैसी योजनाओं से बाहर हो रहे हैं और उन्हें जाति प्रमाणपत्र भी नहीं मिल पा रहे हैं。
याचिकाकर्ता ने कहा कि चुनाव आयोग ने निर्वाचन क्षेत्रों के हिसाब से यह डेटा जारी नहीं किया है कि कितने आवेदन मिले, कितने स्वीकार किए गए और कितने खारिज किए गए, जिससे इस प्रक्रिया की सार्वजनिक जांच सीमित हो गई है। अदालत ने 25 अगस्त को एसआईआर के मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका सहित पहले से लंबित याचिकाओं के साथ इस नई याचिका पर भी सुनवाई करने पर सहमति जताई।
पीठ ने बिहार एसआईआर मामले में दिए फैसले का जिक्र करते हुए कहा, ‘अगर कोई न्यायाधिकरण यह कहे कि कोई व्यक्ति एसआईआर सूची में नहीं हो सकता है, तो चुनाव आयोग की यह जिम्मेदारी है कि वह नागरिकता तय करने के लिए संबंधित मामले को केंद्रीय मंत्रालय भेजे।’ अदालत ने कहा कि नागरिकता तय करने के मामले में चुनाव आयोग कोई संवैधानिक प्राधिकरण नहीं है। उसके अधिकारक्षेत्र में सिर्फ मतदाता सूचियों का नियंत्रण और निगरानी है।
अधिवक्ता नारायण ने कहा कि राज्य में 33.5 लाख अपीलें अब भी लंबित हैं। जिन मामलों का निपटारा हुआ है, उनमें 70 प्रतिशत दावे स्वीकार किए गए हैं। याचिका में कहा गया है कि राज्य में 58 लाख से अधिक वोटरों के नाम हटा दिए गए थे। 60 लाख से अधिक ‘तार्किक विसंगति’ वाले मामलों की पहचान करने के लिए अपनाई गई प्रक्रिया पर भी चिंता जताई गई है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि तीन सदस्यीय न्यायिक समिति ने सात अप्रैल को एक एसओपी जारी की थी, लेकिन इसे भी सार्वजनिक नहीं किया गया है। याचिका में एसओपी को प्रकाशित करने और बांग्ला, हिन्दी और अंग्रेजी में आसान अपील गाइडलाइंस तैयार करने के निर्देश देने की मांग की गई है, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसमें शामिल हो सकें और प्रक्रिया तक उनकी पहुंच हो।
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