मंगल, चांद, सूरज और समुद्र… विक्रम-1 की सफल लॉन्चिंग के साथ भारत ने अंतरिक्ष में गाड़े झंडे – Jagran

भारत ने अपना पहला निजी ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट विक्रम-1 सफलतापूर्वक लॉन्च किया है, जो देश की बढ़ती अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था और 400 से अधिक स्पेस स्टार्टअप्स …और पढ़ें
भारत की अंतरिक्ष में ऊंची उड़ान।
भारत ने पहला निजी ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट विक्रम-1 लॉन्च किया।
अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था 2040 तक 100 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान।
चंद्रयान, आदित्य और गगनयान जैसे मिशनों से भारत का बढ़ता कद।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत ने मंगल और चंद्रमा पर अंतरिक्ष यान भेजे हैं, सैकड़ों उपग्रहों को कक्षा में स्थापित किया है और अब अपना पहला निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट विक्रम-1 लॉन्च कर दिया है।
भारत की स्पेस इकॉनमी 8.4 अरब डॉलर की है। 2020 में इस सेक्टर के लिए प्राइवेट इन्वेस्टमेंट खुलने के बाद से ये तेजी से बढ़ी है और इसने 400 से ज्यादा स्पेस स्टार्टअप्स को आकर्षित किया है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के साथ मिलकर काम करने वाली कई प्रमुख सरकारी और निजी कंपनियां रक्षा क्षेत्र में भी काम करती हैं, जिससे अंतरिक्ष और सुरक्षा के बीच का दायरा आपस में जुड़ता जा रहा है। अब देश के पहले प्राइवेट तौर पर विकसित ऑर्बिटल-क्लास रॉकेट लॉन्च करने का स्काईरूट एयरोस्पेस तेजी से बढ़ते भारतीय स्पेस इंडस्ट्री के लिए अगला बड़ा कदम है।
अंतरिक्ष विभाग ने कहा, “भारत डीप-स्पेस एक्सप्लोरेशन, अंतरिक्ष विज्ञान, मानव अंतरिक्ष उड़ान और ऑर्बिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्रों में बड़े लक्ष्य हासिल करने की दिशा में काम कर रहा है। ये उपलब्धियां भारत के बढ़ते आत्मविश्वास, तकनीकी परिपक्वता और ग्लोबल स्पेस इकोसिस्टम में भारत की भूमिका के लिए एक दूरदर्शी सोच को दर्शाती हैं।”
2014 में भारत मंगल की कक्षा में अंतरिक्ष यान भेजने वाला पहला एशियाई देश बना। इसरो ने अपने चंद्र मिशन कार्यक्रम में भी काफी प्रगति की है। इसे संस्कृत में ‘चंद्रयान’ या ‘मूनक्राफ्ट’ भी कहा जाता है।
इस प्रोग्राम में 2008 का लूनर ऑर्बिटर, 2019 में लैंडिंग की नाकाम कोशिश और 2023 का सफल मिशन शामिल था, जिसमें एक रोवर को तैनात किया गया था। इस रोवर मिशन ने भारत को रूस, अमेरिका और चीन के बाद चंद्रमा पर बिना इंसानों वाला यान उतारने वाला चौथा देश बना दिया।
2027 के लिए तय चौथे चंद्रयान मिशन से चांद के सैंपल वापस लाने की उम्मीद है और 2028 के लिए शुक्र ग्रह की कक्षा में जाने वाला मिशन तय किया गया है। सूर्य का अध्ययन करने वाला मिशन ‘आदित्य’ सूर्य की सबसे बाहरी परतों और अंतरिक्ष के मौसम पर नजर रख रहा है।
पृथ्वी पर इसरो की टेक्नोलॉजी भारत की ‘मत्स्य’ पनडुब्बी को विकसित करने में मदद कर रही है, जिसका नाम हिंदू देवता विष्णु के मत्स्य अवतार के नाम पर रखा गया है। साइंस मिनिस्टर जितेंद्र सिंह के अनुसार, 2027 तक यह वैज्ञानिकों को समुद्र में छह किलोमीटर (3.7 मील) नीचे ले जाएगा, ताकि ‘गहरे समुद्र के संसाधनों’ (जिनमें रेयर अर्थ और जरूरी मिनरल शामिल हैं) का इस्तेमाल किया जा सके।
1975 में सोवियत रॉकेट से अपना पहला सैटेलाइट लॉन्च करने के बाद से ही इसरो ने कम लागत वाले मिशन के लिए अपनी पहचान बनाई है। तेजी से बढ़ते कमर्शियल सैटेलाइट मार्केट में बड़ी हिस्सेदारी पाने के मकसद से 2014 के बाद से इसके स्पेस प्रोग्राम में तेजी आई है।
इसरो ने 430 से ज्यादा विदेशी सैटेलाइट लॉन्च किए हैं जिनसे उसे 600 मिलियन डॉलर से ज्यादा की कमाई हुई है और साथ ही अपने 144 से ज्यादा सैटेलाइट भी लॉन्च किए हैं।
भारत अब आंध्र प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी तट पर श्रीहरिकोटा में अपने लॉन्चपैड का विस्तार कर रहा है और भारत के दक्षिणी सिरे पर तमिलनाडु के कुलसेकरपट्टिनम में एक दूसरा स्पेसपोर्ट बनाया जा रहा है। नई दिल्ली का अनुमान है कि उसका स्पेस इंडस्ट्री 2033 तक 44 बिलियन डॉलर और 2040 तक 100 बिलियन डॉलर तक बढ़ जाएगा।
भारत यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ESA) नासा के अलावा फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और सऊदी अरब के साथ भी काम करता है। इंसानों को अंतरिक्ष में भेजने की उसकी तैयारियों में रूस मदद कर रहा है।
टेक्नोलॉजी और एआई के क्षेत्र में अपनी बड़ी महत्वाकांक्षाओं के साथ-साथ भारत का प्राइवेट स्पेस इंडस्ट्री भी तेजी से बढ़ रहा है। इस क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों में स्काईरूट एयरोस्पेस भी शामिल है। विक्रम-1 रॉकेट को छोटे सैटेलाइट्स को लो-अर्थ ऑर्बिट (पृथ्वी की निचली कक्षा) में ले जाने के लिए डिजाइन किया गया है।
एक और कंपनी Pixxel है, जो खेती से लेकर पर्यावरण की निगरानी जैसे कामों के लिए ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट बना रही है। Bellatrix Aerospace सैटेलाइट प्रोपल्शन सिस्टम बना रही है और Agnikul Cosmos 3D-प्रिंटेड रॉकेट इंजन से चलने वाले छोटे सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल बना रही है।
भारत के सिविल स्पेस और डिफेंस इंडस्ट्रीज आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं और कई सरकारी व प्राइवेट कंपनियां दोनों सेक्टरों को सप्लाई करती हैं। इनमें लॉन्च रॉकेट, प्रोपल्शन, सैटेलाइट, इलेक्ट्रॉनिक्स और गाइडेंस सिस्टम शामिल हैं। ये ऐसी टेक्नोलॉजी है जिसका इस्तेमाल स्पेस और भारत के बढ़ते मिसाइल और मिलिट्री ड्रोन प्रोग्राम में होता है।
इसरो ने सरकार के डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) के साथ सक्रिय तालमेल की तारीफ की है और भारत-रूस के जॉइंट वेंचर, ब्रह्मोस मिसाइल प्रोग्राम के साथ भी उसके करीबी संबंध रहे हैं।
इसरो को एवियोनिक्स और गाइडेंस सिस्टम सप्लाई करने वाली कंपनियों को मिलिट्री ऑर्डर में बढ़ोतरी से फायदा हो रहा है। पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ 2025 के टकराव के बाद भारत ने डिफेंस से जुड़ी खरीद पर अरबों डॉलर खर्च किए हैं।
इसरो अपने पहले क्रू वाले मिशन की भी योजना बना रहा है, जिसके तहत तीन बिना क्रू वाले टेस्ट रन में से पहला 2026 के आखिर में होने की उम्मीद है। ‘गगनयान’ नाम के इस मिशन का मकसद तीन भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को 400 किलोमीटर की कक्षा में तीन दिनों के लिए भेजना है।
तैयारियों के हिस्से के तौर पर भारतीय वायु सेना के पायलट शुभांशु शुक्ला 2025 में स्पेसएक्स ड्रैगन अंतरिक्ष यान से जुड़े और इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पहुंचने वाले पहले भारतीय बने। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि 2035 तक भारत का अपना स्पेस स्टेशन होगा और 2040 तक चांद पर एक अंतरिक्ष यात्री भेजने की योजना है।
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