वाराणसी। कविता के साथ राग भावना जुड़ी है। चाहे छंद मुक्त हो या छांदस, कविता परिसर में सब की उपस्थिति का अपना महत्व है। समाज की पीड़ा को कवि अपने स्वभाव में ढालकर किसी भी काव्य रूप में लिखने को स्वतंत्र है। ये बातें मुंबई विश्वविद्यालय में हिंदी की प्रोफेसर मीनू मदान ने कहीं। वह काशी लेखन मंच (कलम) की ओर से भदैनी स्थित साधुबेला अपार्टमेंट में आयोजित गोष्ठी में मुख्य अतिथि थीं। उन्होंने कहा कि आज ग़ज़ल, गीत, दोहे और छंदमुक्त काव्य रूपों में समकालीन हिंदी कविता निरंतर समृद्ध हो रही है। उन्होंने अपनी कुछ महत्वपूर्ण रचनाओं का पाठ किया। ‘कलम’ के कार्यकारी अध्यक्ष विनय मिश्र ने कहा कि आज कविता छंद से आगे चलकर छंदहीनता की रूढ़ि में सिमट गई है। कविता को आमजन से जोड़ने के लिए उसका लय से जुड़ना आवश्यक है। उन्होंने अपनी कुछ ग़ज़लों का पाठ किया। उन्होंने पढ़ा- ‘चमकते आंसुओं की शान होती हैं, उम्मीदें जब कभी मुस्कान होती हैं, हवा की, रौशनी की बात करने को, किताबें एक रौशनदान होती हैं…।’
वरिष्ठ गीतकार डॉ.अशोक कुमार सिंह ने नदी शीर्षक से गीत सुनाया। मुखड़ा यूं रहा ‘राह में आए बहुत पत्थर निगोड़े, पर तुम्हारे हौसले को कौन तोड़े, धूप लगती है तुम्हें ना छांव, ओ नदी इतनी खबर तो है मुझे भी…। वरिष्ठ गीतकार सूर्य प्रकाश मिश्र ने भावपूर्ण गीत का गायन किया। वरिष्ठ कवि कंचन सिंह ने सुनाया ‘वह अभी तक छंद के ही द्वंद्व में है, मेरी ग़ज़ल प्यार के अनुबंध में है…।’ ग़ज़लगो कुंवर सिंह ‘कुंवर’ ने उम्दा ग़ज़लें और एक जीवनधर्मी गीत पढ़ा।
गोष्ठी में देश के अन्य शहरों के युवा रचनाकारों को भी अवसर प्रदान किया गया। वाराणसी की युवा कवयित्री पल्लवी त्रिपाठी ने एक बरसाती गीत पढ़ा- ‘एक बादल का टुकड़ा तेरा, एक बादल का टुकड़ा मेरा…।’ युवा गीतकार आनंद कृष्ण मासूम ने छोटे बच्चों से छूटते बचपन को केंद्रित नवगीत पढ़े। सुनील नारायण उपाध्याय ने ‘रेलगाड़ी’ और ‘भिंडी’ शीर्षकों से कविताएं पढ़ीं। वरिष्ठ कथाकार और कवयित्री डॉ. मुक्ता की अध्यक्षता में हुई गोष्ठी में उषा पांडेय, सीताराम विक्रांत, गोरखपुर के सूरज गुप्ता, बलरामपुर के मयंकर पाल सिंह, दिल्ली की दीपशिखा ने भी काव्यपाठ किया। संचालन डॉ.मंजरी पांडेय एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ.प्रताप शंकर दुबे ने किया।
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शार्ट बायो : सांस्कृतिक समीक्षक के रूप में हिंदी पत्रकारिता में खास पहचान रखने वाले अरविन्द मिश्र अपने परिवार में तीसरी पीढ़ी के पत्रकार हैं। उनके दादा स्व.पं.जनार्दन दत्त मिश्र ‘व्यास’ ने आजादी की लड़ाई में अपनी लेखनी से देश की सेवा की। उनके पिता नवगीतकार स्व.पं.अशोक मिश्र ‘सामयिक’ ने देश के कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों में उच्च पदों पर सेवाएं दीं।
परिचय एवं अनुभव
अरविन्द मिश्र, हिंदी सांस्कृतिक पत्रकारिता का जाना पहचाना नाम है। बीते ढ़ाई दशक से अधिक समय से हिंदी पत्रकारिता की मुख्य धारा में बतौर सांस्कृतिक पत्रकार कार्यरत हैं। पत्रकारिता की शुरुआत क्राइम रिपोर्टर के रूप में हुई। दैनिक आज और अमर उजाला के लिए अर्से तक धर्म-संस्कृति की रिपोर्टिंग के साथ-साथ खेल पत्रकारिता भी की। रंगमंच, साहित्यिक मंच और संचालन विधा पर लेखन करने के साथ ही स्वयं उक्त विधाओं से जुड़े भी हैं।
करियर का सफर
अरविन्द मिश्र ने विद्यार्थी जीवन के दौरान ही काशी के सांध्यकालीन एवं साप्ताहिक समाचार पत्रों के लिए लिखना शुरू कर दिया था। वर्ष 1997 में दैनिक आज से जुड़कर मुख्य धारा की पत्रकारिता आरंभ की। आज अखबार चार वर्ष सेवा देने के बाद वर्ष 2002 में दैनिक अमर उजाला के वाराणसी संस्करण से बतौर रिपोर्टर जुड़े। वर्ष 2008 से 2012 तक अमर उजाला कॉम्पैक्ट की डेस्क और रिपोर्टिंग टीम को लीड किया। बरेली में अमर उजाला कॉम्पैक्ट की लॉन्चिंग कराई। वर्ष 2013 में दैनिक हिन्दुस्तान के पटना संस्करण से जुड़े। हिन्दुस्तान की ‘पटना लाइव’ टीम को चार वर्षों तक लीड किया। वर्ष 2018 से वाराणसी में बतौर मुख्य संवाददाता कार्यरत हैं।
शैक्षणिक पृष्ठभूमि और रिपोर्टिंग
हाईस्कूल की परीक्षा विज्ञान वर्ग के विद्यार्थी के रूप में उत्तीण करने के बाद इंटरमीडिएट की परीक्षा वाणिज्य विषय से दी। हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षा यूपी बोर्ड से उत्तीर्ण की। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से वर्ष 1994 में बीकॉम की पढ़ाई पूरी की। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण एम.कॉम की पढ़ाई पूरी नहीं हो सकी। बहुत ही कम समय में अरविन्द मिश्र ने अमर उजाला में सांस्कृतिक पत्रकारिता के नवीन मानदण्ड स्थापित कर दिए। इस दौरान उन्होंने ‘काशी परिक्रमा’, ‘आमने-सामने’ और ‘देखी तुम्हरी काशी’ जैसे कॉलमों के माध्यम से अपनी लेखनी को धार दी। प्रदूषण की मार झेल रही गंगा पर उन्होंने विशेष रूप से कार्य किया। गंगा पर उनके विशिष्ट लेखन से प्रभावित होकर ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरुशंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने उन्हें गंगारविन्द नाम दिया। सोशल मीडिया पर अरविन्द मिश्र इसी नाम से पहचाने जाते हैं। हिन्दुस्तान से जुड़ने के बाद अरविन्द मिश्र ने सांस्कृति पत्रकारिता में मील के कई पत्थर स्थापित किए। उन रिपोर्ट में रामनगर की रामलीला, नाटी इमली के भरत मिलाप से लेकर काशी में होने वाले धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों की अनेकानेक रिपोर्ट शामिल हैं। संकट मोचन संगीत समारोह और काशी के अति प्राचीन बेनियाबाग के इतिहास को पहली बार कलमबंद करने का श्रेय भी अरविन्द मिश्र को ही जाता है। उन्हें हिन्दुस्तान अखबार की ओर से राष्ट्रीय स्तर पर दिए जाने वाले ‘होनहार अवार्ड’ इंडिवीजुअल कैटेगरी में छह बार दिए जा चुके हैं। जिन समाचार शृंखलाओं के लिए उन्हें यह अवार्ड मिले उनमें ‘काकोरी काण्ड के नायक’, ‘मैं बेनियाबाग हूं’, ‘प्रेमचंद के बहाने’, ‘प्रेमचंद से छल’, ‘सब्जीवाला शायर’ और ‘गंगा कावेरी’ शामिल हैं। संकट मोचन संगीत समारोह, काशी तमिल संगमम, बनारस लिट् फेस्ट जैसे वृहद आयोजनों की यादगार कवरेज की कटिंग पाठकों ने सहेज कर रखी है। 23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 की चंद्रमा पर सफल लैंडिंग के दिन अरविन्द मिश्र ने 23 अगस्त की तारीख को चंद्रयान दिवस के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर मनाने की पहल छेड़ी। इसका नतीजा यह हुआ कि दक्षिण अफ्रीका की यात्रा से लौट कर सीधे इसरो पहुंचे प्रधानमंत्री ने इस दिन को नेशनल स्पेस डे के रूप में मनाने की घोषणा कर दी।
विशेषज्ञता
अरविन्द मिश्र निश्चित रूप से सांस्कृति पत्रकार के रूप में अपनी खास पहचान रखते हैं लेकिन मानवीय कोणों वाली स्टोरी, शिक्षा, खेल और प्रशासनिक रिपोर्टिंग में भी अपनी दक्षता प्रमाणित की है। एक सफल रिपोर्टर होने के साथ ही उन्होंने अपने आप को एक छायाकार के रूप में भी स्थापित किया। हिन्दुस्तान समाचार पत्र में पटना और वाराणसी संस्करण में सौ से अधिक फोटोग्राफ पर बाइलाइन मिल चुकी है। काशी में देवदीपावली के उत्सव की उनके द्वारा ली गई तस्वीर को हिन्दुस्तान के देशभर के सभी संस्करणों में प्रमुखता से स्थान मिल चुका है।
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