यूएसजीएस ने नेपाल में अचानक आई बाढ़ का कारण भूकंप नहीं, बल्कि ग्लेशियर का ढहना और मलबे का तेज बहाव बताया है।
नेपाल में भीषण तबाही।
यूएसजीएस ने भूकंप के बजाय ग्लेशियर ढहने को कारण बताया।
लांगटांग लिरुंग चोटी पर हिमस्खलन से मलबा नदी में गिरा।
पिघले पानी से ग्लेशियर अस्थिर होकर ढह गया।
डिजिटल डेस्क, वाशिंगटन। नेपाल में अचानक आई बाढ़ को लेकर अमेरिकी जियोलाजिकल सर्वे (यूएसजीएस) ने अपना शुरुआती आकलन बदल दिया है। यूएसजीएस ने अब कहा है कि यह आपदा भूकंप के कारण नहीं, बल्कि ग्लेशियर के ढहने और उसके साथ मलबे के तेज बहाव की वजह से आई।
इससे पहले एजेंसी ने गोसाईंकुंड के लगभग 47 किमी उत्तर 4.4 तीव्रता के भूकंप को ग्लेशियर टूटने का संभावित कारण बताया था। काठमांडू पोस्ट के अनुसार, 7,245 मीटर ऊंची लांगटांग लिरुंग चोटी के उत्तरी हिस्से पर हिमस्खलन हुआ था। इससे पहले 2015 में आए भूकंप के केंद्र में यही पहाड़ था। इसके बाद आए हिमस्खलन से लांगटांग गांव दफन हो गया था और 300 लोग मारे गए थे।
हिमस्खलन के चलते नेपाल-चीन सीमा पर बहनेवाली लेंडे नदी भी हिमस्खलन के मलबे से अवरुद्ध हो गई थी। यहां बने अवरोध के टूटने से पहले झील बन गई थी। इसके टूटने से भोटेकोशी नदी में कीचड़ और बड़े-बड़े बोल्डरों का सैलाब आ गया था।
यूएसजीएस ने घटना पर जारी अपने नोट को अपडेट करते हुए कहा कि आसपास के भूकंप मापी केंद्रों के आंकड़ों, लंबी अवधि वाली भूकंपीय तरंगों और उपग्रह तस्वीरों के विस्तृत विश्लेषण से पता चला कि यह भूकंप नहीं था। एजेंसी के मुताबिक, ग्लेशियर के ढहने के बाद भारी मात्रा में मलबा और पानी तेजी से नीचे की ओर आया, जिससे तबाही मची।
हालांकि, यूएसजीएस ने इस भूकंपीय घटना की तीव्रता को अपने अपडेट में 4.4 से बढ़ाकर 5.2 कर दिया है। एजेंसी ने कहा कि उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर घटना को ग्लेशियर के ढहने और मलबे के बहने की घटना के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
बुधवार को तिब्बत से शुरू हुई अचानक बाढ़ ने नेपाल के रसुवा और धाडिंग जिलों में भारी तबाही मचाई। इस घटना के कारण बड़ी मात्रा में पानी और मलबा नीचे की ओर बहा, जिससे जान-माल का नुकसान हुआ।
कनाडा की कैलगरी यूनिवर्सिटी में जियोमोर्फोलाजी के एसोसिएट प्रोफेसर डैनियल शुगर ने भी ग्लेशियर टूटने को ही बाढ़ की मुख्य वजह माना है। उन्होंने 5,200 मीटर की ऊंचाई वाली चट्टान से ग्लेशियर के नीचे गिरने का अनुमान जताया है।
‘न्यू साइंटिस्ट’ के अनुसार, शुगर ने मंगलवार और बुधवार की उपग्रह तस्वीरों की तुलना की। उनका कहना है कि दोनों तस्वीरों के बीच के 24 घंटों में आसपास के ग्लेशियरों में काफी बर्फ पिघली दिखाई देती है। उनके मुताबिक, पिघली हुई बर्फ का पानी ग्लेशियर के भीतर पहुंचा और नीचे की सतह तक रिसकर उसे चिकना कर दिया। इससे ग्लेशियर अस्थिर हुआ और अंततः उसके ढहने की स्थिति बनी।
काठमांडू टाइम्स के अनुसार, विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल के हिस्से वाली लेंडे नदी में हिमस्खलन के मलबे के चलते बनी झील भूकंप की वजह से दरक गई होगी और अचानक बाढ़ आई। हालांकि, इसकी पुष्टि नहीं की जा रही है। पिछले साल आठ जुलाई को भी भोटेकोशी में अचानक बाढ़ आई थी। नेपाल के जल विज्ञान और मौसम विज्ञान विभाग का निष्कर्ष था कि ग्लेशियर झील के फटने के कारण बाढ़ आई थी। उपग्रह तस्वीरों के विश्लेषण में भी इसकी पुष्टि हुई थी।
नेपाल की नेशनल डिज़ास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथारिटी ने भी कहा है कि बर्फ और चट्टानों का हिमस्खलन ही इसकी मुख्य वजह हो सकती है। प्लैनेट लैब्स की उपग्रह तस्वीरों के विश्लेषण से पता चलता है कि नेपाल-चीन सीमा के पास, रासुवागढ़ी बार्डर क्रासिंग से लगभग 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में एक बड़ा हिमस्खलन हुआ है। ऐसा लगता है कि मलबा लेंडे नदी में गिरा और इसके कारण मलबे वाली बाढ़ आ गई।
बर्फ और चट्टान के मलबे की वजह से गालछी में त्रिशूली नदी महज आधे घंटे के अंदर नौ मीटर की ऊंचाई तक पहुंच गई थी। इसके बाद मालेखु नदी का जलस्थर सात मीटर ऊपर पहुंच गया। विशेषज्ञों का कहना है कि घटना के कारणों की पूरी स्थिति स्पष्ट होने में कई हफ्ते लग सकते हैं।