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वराह जयंती (Varaha Jayanti) हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के वराह अवतार से जुड़ा धार्मिक पर्व है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने पृथ्वी को बचाने के लिए वराह यानी जंगली सूअर का रूप धारण किया था. वराह अवतार को भगवान विष्णु के दस प्रमुख अवतारों में तीसरा अवतार माना जाता है.
हिंदू पंचांग के अनुसार, वराह जयंती भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाई जाती है. इस दिन भगवान विष्णु के वराह स्वरूप की पूजा की जाती है. पर्व की तिथि हर वर्ष अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार बदलती रहती है, क्योंकि यह हिंदू चंद्र पंचांग पर आधारित होती है.
पौराणिक कथाओं के अनुसार, हिरण्याक्ष नाम के असुर ने पृथ्वी को समुद्र में छिपा दिया था. इसके बाद देवताओं और ऋषियों ने भगवान विष्णु से पृथ्वी की रक्षा करने की प्रार्थना की. भगवान विष्णु ने वराह का रूप धारण किया और समुद्र में जाकर पृथ्वी को अपने दांतों पर उठाकर बाहर निकाला. इसके बाद भगवान वराह और हिरण्याक्ष के बीच युद्ध हुआ, जिसमें हिरण्याक्ष का वध हुआ.
वराह जयंती के दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु और उनके वराह स्वरूप की पूजा करते हैं. कई स्थानों पर भगवान वराह की प्रतिमा या चित्र का पूजन किया जाता है. भक्त पूजा के दौरान भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करते हैं और धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते हैं.
इस अवसर पर मंदिरों में विशेष पूजा और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं. कुछ श्रद्धालु इस दिन व्रत रखते हैं. व्रत और पूजा की विधि अलग-अलग क्षेत्रों तथा परिवारों की धार्मिक परंपराओं के अनुसार अलग हो सकती है.
वराह अवतार से जुड़ी कथाओं का उल्लेख विभिन्न हिंदू धार्मिक ग्रंथों में मिलता है. इनमें विष्णु पुराण, भागवत पुराण और अन्य पुराणिक परंपराएं शामिल हैं. वराह से संबंधित मंदिर भी भारत के अलग-अलग हिस्सों में पाए जाते हैं.
वराह जयंती का संबंध भगवान विष्णु के उस अवतार से है, जिसे पौराणिक परंपरा में पृथ्वी की रक्षा और अधर्म के अंत से जोड़ा गया है. इस दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु के वराह स्वरूप का स्मरण करते हैं और धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं.
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