राजस्थान निकाय चुनाव में BJP का वर्चस्व! जीते 41% वार्ड, कांग्रेस 35% पर सिमटी; जानें सीटों का पूरा गणित – AajTak

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राजस्थान के नगर निकाय चुनावों में बीजेपी ने 41% वार्ड जीतकर राज्य में अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है, जबकि कांग्रेस 35% वार्डों पर सिमट गई है. BJP के लिए ये पिछले निकाय चुनावों के मुकाबले 5% की बढ़त है, जबकि कांग्रेस के हिस्से में लगभग 5% की गिरावट आई है. हालांकि, परिसीमन के कारण इस बार सीटों की तुलना करना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि परिसीमन (वार्डों की सीमा तय करने) की प्रक्रिया के कारण राजस्थान में नगर निकायों की सीटों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है.

309 निकाय में हुआ चुनाव
राजस्थान में शहरी निकाय चुनाव तीन स्तरों- नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिका/नगर पंचायत पर आयोजित किए गए. नगर निगम बड़े शहरों का संचालन करते हैं, जबकि परिषद और पालिकाएं कस्बों का प्रशासन देखती हैं. इस चुनाव में 40 वर्ष से कम उम्र के मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा शामिल था. 14 सितंबर की शाम 7 बजे तक के आंकड़ों के अनुसार, 10,244 में से 10 वार्डों के नतीजे आने बाकी थे. बीजेपी ने कांग्रेस पर 566 वार्डों की बढ़त हासिल की, जबकि निर्दलीयों ने 2,273 वार्ड जीत लिए हैं.
परिसीमन के बाद जुड़े 2,770 नए वार्ड
साल 2019 और 2021 के बीच चार चरणों में हुए पिछले निकाय चुनावों की तुलना में इस बार चुनावी नक्शा काफी बड़ा था. परिसीमन प्रक्रिया की वजह से राज्य में 2,770 नए वार्ड जुड़े, जिससे कुल वार्डों में 37.1% की भारी वृद्धि हुई. पिछले चुनाव चक्र में कुल लगभग 7,474 वार्ड थे. जिनकी संख्या अब लगभग 10,244 हो गई है.
BJP की 56.8% की जबरदस्त छलांग
पिछले निकाय चुनाव में कांग्रेस के पास लगभग 3,042 वार्ड थे, बीजेपी के पास 2,666 और निर्दलीयों के पास 1,672 वार्ड थे. ताजा नतीजों में बीजेपी की सीटों की संख्या 2,666 से बढ़कर 4,179 हो गई, जो 56.8% की वृद्धि दिखाता है. वहीं, कांग्रेस की सीटें 3,042 से बढ़कर 3,613 हुईं, जिसमें केवल 18.7% की बढ़ोतरी दर्ज की गई. उधर, निर्दलीयों की संख्या भी 1,672 से बढ़कर 2,273 हो गई, जो 35.9% की वृद्धि है.
RLP और माकपा को भी मिला फायदा

ताजा आंकड़ों के अनुसार, इन चुनावों में बीजेपी ने 4,179 वार्ड (40.8%) जीतकर पहला स्थान हासिल किया, जबकि मुख्य विपक्षी कांग्रेस ने 3,613 वार्ड (35.3%) जीतकर दूसरा स्थान हासिल किया है. जबकि AAP, CPI (M) और हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी जैसे कई दलों ने भी अच्छी बढ़त हासिल की है.

इन निकाय चुनाव में क्षेत्रीय दलों ने भी अपने आंकड़ों में उल्लेखनीय सुधार किया है. नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) 14 से बढ़कर 63 वार्डों पर पहुंच गई, जिसमें 350% का भारी उछाल आया. आरएलपी का प्रभाव मुख्य रूप से जाट बहुल पूर्वी और पश्चिमी राजस्थान में है. उधर, माकपा (CPI-M) 8 से बढ़कर 38 वार्डों पर पहुंची, जिसमें 375% की बढ़त रही. इसके विपरीत बहुजन समाज पार्टी (BSP) 24 से घटकर 19 वार्डों पर आ गई जो 20.8% की गिरावट है.
कांग्रेस को 5.4% का नुकसान

कुल वार्डों के अनुपात की बात करें तो तस्वीर बिल्कुल साफ है कि पिछले चुनाव में कांग्रेस के पास कुल वार्डों की 40.7% हिस्सेदारी थी जो अब गिरकर 35.3% रह गई है. यानी कांग्रेस को करीब 5.4 प्रतिशत अंकों का नुकसान हुआ है.

वहीं, बीजेपी की हिस्सेदारी 35.7% से बढ़कर 40.8% हो गई है, यानी उसे 5.1 प्रतिशत लाभ मिला है. निर्दलीयों की हिस्सेदारी 22.4% से मामूली गिरकर 22.2% रही है.

ये अंतर इसलिए बेहद अहम है, क्योंकि बीजेपी की बढ़त को सिर्फ नए वार्ड बनने से नहीं जोड़ा जा सकता. राज्य में कुल वार्डों की संख्या में 37.1% का इजाफा हुआ, लेकिन बीजेपी ने 56.8% की दर से सीटें बढ़ाईं. दूसरी तरफ, कांग्रेस की सीटों में बढ़ोतरी की दर सिर्फ 18.7% रही जो वार्ड विस्तार की दर से आधी थी. इसी कारण सीटों की कुल संख्या बढ़ने के बावजूद कुल हिस्सेदारी में कांग्रेस काफी पीछे छूट गई.

वहीं, दिसंबर 2023 के विधानसभा चुनाव जीतकर सत्ता में आई मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा की सरकार के लिए ये नतीजा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है. भारत के अधिकांश राज्यों की तरह राजस्थान में भी सत्ताधारी दल को प्रशासनिक मशीनरी, संगठन और राज्य स्तरीय विकास के प्रचार का स्वाभाविक लाभ मिलता है. निकाय चुनाव स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवार चयन, आरक्षण, गुटबाजी और निर्दलीयों के प्रभाव से तय होते हैं.
स्विंग स्टेट रहा है राजस्थान

विधानसभा स्तर पर राजस्थान पारंपरिक रूप से एक ‘स्विंग स्टेट’ रहा है. पिछले निकाय चुनावों के वक्त राज्य में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी और कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. इस बार स्थिति पूरी तरह उलट गई और सत्ता में मौजूद बीजेपी सबसे आगे निकल गई. इसके बावजूद 3,613 वार्ड जीतकर कांग्रेस ने दिखाया है कि उसका जमीनी संगठन अभी-भी राज्य में पूरी तरह बरकरार है.

बता दें कि शहरी इलाकों को पारंपरिक रूप से बीजेपी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है. केंद्र सरकार के यूजीसी इक्विटी विनियमों के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की सक्रियता के चलते ये चुनाव बीजेपी के लिए एक कठिन परीक्षा माना जा रहा था. इन तमाम राजनीतिक गतिविधियों के बावजूद बीजेपी ने अपने शहरी आधार को बचाते हुए अपनी स्थिति को और ज्यादा मजबूत किया है.
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