हरेंद्र कुमार | चौपारण
मानगढ़ स्थित कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका प्लस टू विद्यालय में 125 बेड वाले छात्रावास का निर्माण 2012-13 में शुरू हुआ था। जिसका प्राकलन करीब 1.23 करोड़ रुपए की थी। कार्य शुरू कर तीन मंजिला बनाने के बाद एकाएक काम बंद हो गया। जो आज 14 साल बाद भी न तो काम शुरू हुआ और न ही विभाग इसका खोजबीन किया। मालूम हो कि केजीबीवी चौपारण में सरकार के गाइडलाइन के अनुरूप कक्षा 6 से 10 तक हर कक्षा में 50 बालिका अध्ययनरत थी। जिसे पुराना भवन में छात्रावास बना कर 150 बेड लगा कर रखा जा रहा था।
बढ़ती संख्या के बाद नया छात्रावास की शुरुवात किया गया। इसका बाद सरकार द्वारा एक तरफ प्लस 2 का विस्तार किया गया और दूसरी तरफ प्रत्येक कक्षा में 75 बालिकाओं का नामांकन का आदेश जारी किया गया। जो 2019 से हर कक्षा में 75 बालिकाओं का नामांकन शुरू कर दिया गया। इसके बाद समस्या और अधिक बढ़ गया। वर्तमान में कस्तूरबा स्कूल के पुराने बिल्डिंग में 150 बेड लगा है और उसमें 507 बालिका को किसी तरह रखा जा रहा है। जिस भवन की स्थिति भी ठीक नही है। इसका विगत वर्ष मरम्मती किया गया है। 2012-13 में शुरू हुआ छात्रावास भवन करीब 14 साल बाद भी अधूरा पड़ा है। तीन मंजिला भवन का अधिकांश निर्माण हो चुका है, लेकिन अंतिम छत की ढलाई के बाद काम आगे नहीं बढ़ सका। अब यह भवन विभागीय उदासीनता और निगरानी की कमी का उदाहरण बनकर रह गया है।
पर्याप्त कमरे, शौचालय, स्नानघर की भारी समस्या : विद्यालय में वर्तमान में करीब 507 छात्राएं अध्ययनरत हैं, जबकि छात्रावास की क्षमता महज 150 छात्राओं की है। सीमित आवासीय संसाधनों के कारण छात्राओं को हर एक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। पर्याप्त कमरे, शौचालय, स्नानघर सहित अन्य मूलभूत सुविधाओं का भी दबाव चरम पर है।
अभिभावकों ने मांगी उच्चस्तरीय जांच विद्यालय में पढ़ने वाली छात्राओं के अभिभावकों ने जिला प्रशासन से मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि छात्राओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो 150 बेड वाले जर्जर छात्रावास में किसी तरह से रह रही है। यदि 125 बेड के छात्रावास का निर्माण समय पर पूरा हो जाता तो छात्राओं को बड़ी राहत मिलती। अभिभावकों का आरोप है कि वर्षों से भवन अधूरा रहने के पीछे लापरवाही के साथ-साथ निर्माण प्रक्रिया में कमीशनखोरी की आशंका की भी जांच होनी चाहिए। विद्यालय की वार्डन ललिता कुमारी व पूर्व एसएमसी अध्यक्ष व पूर्व पंसस देवेंद्र यादव ने बताया कि अधूरे छात्रावास निर्माण को लेकर जिला प्रशासन से लेकर राज्य सरकार तक पत्र भेजा जा चुका है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2012-13 में निर्माण शुरू हुआ था और भवन लगभग तैयार होने के बाद भी अंतिम छत की ढलाई का काम नहीं हो सका। विद्यालय में वार्डन समेत कुल 21 कर्मचारी हैं, जिनमें 15 शिक्षक-शिक्षिकाएं तथा शेष रसोइया व अन्य कर्मचारी शामिल हैं।
निर्माण में नहीं की गई निगरानी योजना का उद्देश्य छात्राओं को सुरक्षित और बेहतर आवासीय सुविधा उपलब्ध कराना था। निर्माण शुरू होने के बाद भवन की तीन मंजिलें लगभग तैयार हो गईं, लेकिन अंतिम छत की ढलाई के बाद काम बंद कर ठेकेदार फरार हो गया। इसके बाद से भवन अधूरा पड़ा है। सवाल यह है कि जिस योजना पर लाखों-करोड़ों रुपए खर्च किए गए, उसकी शेष राशि और निर्माण कार्य की निगरानी किस स्तर पर हुई।
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