2050 तक खत्म हो जाएगी दुनिया? इतिहासकार ने की डरा देने वाली भविष्यवाणी, संसाधनों को लेकर जताई चिंता – Bharat24live

Shreeom Singh
Date: 25-09-26 13:55
Chilling Prediction: कल्पना कीजिए कि आज से करीब 25 साल बाद दुनिया का ढांचा काफी बदल चुका हो. शहर और तकनीक तो मौजूद हों, लेकिन जिस व्यवस्था पर आज की सभ्यता टिकी है, वह धीरे-धीरे कमजोर हो गई हो. यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म की कहानी जैसी लग सकती है, लेकिन अमेरिकी इतिहासकार और रिसर्चर जेरेड डायमंड ने भविष्य को लेकर ऐसी ही चिंता जताई है. उनके आकलन के मुताबिक करीब 49 प्रतिशत संभावना है कि 2050 तक दुनिया की मौजूदा व्यवस्था गंभीर संकट में पहुंच सकती है.
डायमंड ने यह बात एक इंटरव्यू के दौरान कही थी. हालांकि, उन्होंने इसे पक्की भविष्यवाणी नहीं बताया है, बल्कि मौजूदा हालात को देखकर अपना आकलन सामने रखा है. उनकी चिंता किसी एक युद्ध या प्राकृतिक आपदा को लेकर नहीं है. वह उन प्राकृतिक संसाधनों को लेकर चिंतित हैं, जिनके सहारे आज की पूरी सभ्यता चल रही है.
कैसे कमजोर हो रहा है सभ्यता का ढांचा?
डायमंड के मुताबिक दुनिया के कई हिस्सों में मछलियों के भंडार, खेती की जमीन, मिट्टी और मीठे पानी का इस्तेमाल लंबे समय तक टिकाऊ तरीके से नहीं हो रहा है. अगर संसाधनों के इस्तेमाल का यही तरीका आगे भी जारी रहा तो आने वाले दशकों में इन पर दबाव काफी बढ़ सकता है.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर जमीन की उपजाऊ क्षमता कम होती गई, पानी की कमी बढ़ी और समुद्रों में मछलियां घटती गईं तो अरबों लोगों के लिए भोजन और पानी की जरूरत कैसे पूरी होगी? डायमंड का आकलन है कि मौजूदा व्यवस्था कुछ दशकों तक चल सकती है, लेकिन करीब 2050 के आसपास इसकी सीमाएं सामने आ सकती हैं. ऐसे में दुनिया के सामने टिकाऊ जीवनशैली अपनाने या गंभीर संकट का सामना करने की स्थिति बन सकती है.
क्या ऐसी स्थिति से बचा जा सकता है?
डायमंड की बात का एक अहम हिस्सा यह भी है कि भविष्य को लेकर सब कुछ खत्म मान लेना सही नहीं है. उनके मुताबिक बदलाव केवल सरकारों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. आम लोग भी कम ईंधन इस्तेमाल करने, निजी गाड़ियों का कम इस्तेमाल करने और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने जैसे कदम उठा सकते हैं.
कंपनियां भी उत्पादन और प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल का तरीका बदल सकती हैं. वहीं सरकारें पर्यावरण, परिवहन, पानी और खेती से जुड़ी नीतियों में बड़े बदलाव कर सकती हैं. 2050 भले ही अभी दूर लगता हो, लेकिन डायमंड का सवाल यह है कि क्या इंसान धरती के संसाधनों पर बढ़ते दबाव को देखते हुए समय रहते अपनी विकास की रफ्तार और तरीका बदल पाएगा.
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