कर्नाटक: जमीन खरीद-फरोख्त में टैक्स और स्टांप ड्यूटी चोरी का बड़ा खेल, IT विभाग ने पकड़ा 300 करोड़ से अधिक का घोटाला – karnataka land deal tax evasion rs 300 cr scam uncovered news in hindi – Jagran

कर्नाटक आयकर विभाग ने जमीन खरीद-फरोख्त में 300 करोड़ रुपये से अधिक की टैक्स और स्टांप ड्यूटी चोरी का खुलासा किया है।
सांकेतिक तस्वीर।
कर्नाटक में 300 करोड़ से अधिक की टैक्स चोरी का खुलासा।
जमीन की कीमत कम दिखाकर, बाकी रकम ऑनलाइन चुकाई जाती थी।
सरकारी खजाने को स्टांप ड्यूटी और टीडीएस का भारी नुकसान।
डिजिटल डेस्क, बेंगलुरु। कर्नाटक के आयकर विभाग ने टैक्स और स्टांप ड्यूटी चोरी करने के एक बेहद शातिर तरीके का खुलासा किया है। इस खुलासे के सामने आने के बाद से अधिकारियों के साथ-साथ लोग भी हैरान रह गए हैं।
शुरुआती अनुमान के मुताबिक, इस अनोखे फर्जीवाड़े के जरिए 300 करोड़ रुपये से ज्यादा के भूमि सौदों में पैसों की हेराफेरी और कम रिपोर्टिंग का मामला सामने आया है। साफ-शब्दों में कहे तो यह नया पैंतरा पूरे देश के लिए चिंता का विषय बन सकता है, क्योंकि इसका असर दूसरे राज्यों पर भी पड़ सकता है।
आयकर विभाग की इन्वेस्टिगेशन विंग ने पाया कि जमीन की खरीद-फरोख्त के दौरान जो रजिस्टर्ड सेल डीड बनवाई जा रही थी, उसमें संपत्ति की पूरी कीमत बहुत कम करके दिखाई जा रही थी।
असली खेल इसके बाद शुरू होता था… बाकी बची हुई बड़ी रकम का भुगतान करने के लिए ‘फुल एंड फाइनल सेटलमेंट डीद’ तैयार की जाती थी, जो कि अनारक्षित होती थी। सबसे शातिर वाली बात यह थी कि इस अतिरिक्त रकम का भुगतान बैंकिंग ऑनलाइन या बैंक ट्रांसफर के जरिए से किया जाता था ताकि सबूत मिटाने में आसानी हो।
जांच में यह बात सामने आई है कि स्थानीय बिल्डर्स इस तरीके का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर बड़े जमीन के टुकड़े खरीदने और फिर वहां रिहायशी फ्लैट या प्लॉट विकसित करने के लिए कर रहे थे।
इस बात को ऐसे समझिए कि चूंकि अतिरिक्त भुगतान सेल डीड का हिस्सा नहीं होता था, इसलिए खरीदार को राज्य सरकार को कोई स्टांप ड्यूटी या रजिस्ट्रेशन फीस नहीं चुकानी पड़ती थी। इससे सरकारी खजाने को भारी राजस्व का नुकसान हो रहा था। टैक्स अधिकारियों ने इस बात की चेतावनी कर्नाटक के रजिस्ट्रेशन विभाग को दे दी है।
इतना ही नहीं कई मामलों में खरीदारों ने ‘शहरी कृषि भूमि’ खरीदने के बावजूद टीडीएस (TDS) नहीं काटा। इसकी वजह से सेटलमेंट डीड के जरिए दिया गया अतिरिक्त पैसा आयकर विभाग के रडार से बाहर ही रहा।
ऐसे में जिन विक्रेताओं ने कृषि भूमि की बिक्री पर टैक्स छूट का दावा किया था, उन्होंने अपने आईटीआर (ITR) रिटर्न में इसका जिक्र ही नहीं किया, जिससे सरकार को टैक्स मिलना तो दूर, लेन-देन का रिकॉर्ड भी नहीं मिला।
गौरतलब है कि इस पूरे फर्जीवाड़े के खुलासे के बाद टैक्स अधिकारियों ने कुछ बेहद अहम सुझाव दिए हैं। इस मामले में अधिकारियों का मानना है कि शहरी इलाकों से सटी जमीनों के सरकारी दाम मौजूदा बाजार भाव से काफी कम हैं। यही वजह है कि लोग ऐसे शॉर्टकट और अंडर-वैल्यूएशन का रास्ता अपनाते हैं। सर्किल रेट को बाजार के असली भाव के बराबर लाना होगा।
दूसरी ओर विभाग ने ऐसे कई रजिस्टर्ड ट्रांजैक्शन भी पकड़े हैं जहां संपत्तियों की अदला-बदली के दौरान उनका दाम बहुत कम दिखाया गया था, ताकि कम स्टांप ड्यूटी चुकानी पड़े और बाकी का पैसा किताबों से बाहर दिया जा सके।

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