Yuvraj Singh
Date: 13-10-26 23:50
नेपाल में बाढ़ और लैंडस्लाइड की घटनाएं एक बार फिर पहाड़ी इलाकों के लिए गंभीर खतरे का संकेत दे रही हैं. 11 अक्टूबर 2026 को गोरखा जिले में बुढ़ी गंडक नदी में आई बाढ़ से कई घरों, पुलों और बिजली से जुड़े ढांचों को नुकसान पहुंचा. शुरुआती रिपोर्टों में पांच लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई. इससे पहले अगस्त 2026 में भी इसी नदी तंत्र के आसपास अचानक बाढ़ ने तबाही मचाई थी. सवाल यह है कि नेपाल में ऐसी आपदाएं बार-बार क्यों सामने आ रही हैं? इसके पीछे तेज बारिश के साथ पहाड़ों की भौगोलिक बनावट, ग्लेशियरों का पिघलना और नदियों के आसपास बढ़ती आबादी जैसे कई कारण हो सकते हैं.
क्यों तेजी से पिघल रहे हैं हिमालय के ग्लेशियर?
नेपाल का पहाड़ी क्षेत्र हिंदू कुश हिमालय का हिस्सा है, जहां बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों पर दबाव बढ़ रहा है. ग्लेशियर बर्फ के विशाल भंडार होते हैं, जो लंबे समय में धीरे-धीरे खिसकते रहते हैं. तापमान बढ़ने से इनकी बर्फ पिघलती है और पानी नदियों तक पहुंचता है. इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की मार्च 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, 1990 से 2020 के बीच हिंदू कुश हिमालय के ग्लेशियरों के कुल क्षेत्रफल में करीब 12 फीसदी की कमी आई, जबकि उनके बर्फ भंडार में लगभग 9 फीसदी गिरावट दर्ज की गई. ग्लेशियरों के सिकुड़ने से नदियों के जल प्रवाह और पहाड़ी क्षेत्रों की स्थिरता पर असर पड़ सकता है.
ग्लेशियरों के पास बनी झीलें कैसे बनती हैं तबाही की वजह?
ग्लेशियरों की बर्फ पिघलने से कई जगह पानी जमा होकर झीलों का रूप ले लेता है. इन झीलों का पानी अक्सर पत्थरों और ग्लेशियर से आए मलबे की प्राकृतिक दीवारों के पीछे रुका होता है. अगर भूस्खलन से चट्टानें झील में गिरें या बर्फ का बड़ा हिस्सा टूटकर पानी में समा जाए, तो तेज लहर पैदा हो सकती है. इससे झील की प्राकृतिक दीवार टूटने का खतरा बढ़ जाता है और पानी के साथ भारी मात्रा में मलबा नीचे की ओर बहने लगता है. इस घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है. हालांकि, हर बाढ़ का संबंध ग्लेशियर या ऐसी झीलों से नहीं होता; खतरा स्थानीय परिस्थितियों और झील की स्थिति पर भी निर्भर करता है.
नेपाल में मानसूनी बारिश भी बढ़ाती है खतरा
नेपाल में जून से सितंबर तक मानसून सक्रिय रहता है. बारिश खेती और नदियों के लिए जरूरी है, लेकिन कम समय में अत्यधिक वर्षा होने पर पहाड़ी ढलानों पर मिट्टी और चट्टानों के खिसकने का खतरा बढ़ जाता है. 27 से 29 सितंबर 2024 के बीच नेपाल में हुई भारी बारिश के दौरान कई इलाकों में बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं सामने आई थीं. अत्यधिक बारिश के कारण नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है, जबकि पहाड़ों से बहकर आने वाला मलबा रास्तों, पुलों और बस्तियों को नुकसान पहुंचा सकता है. ऐसे में संवेदनशील इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए अचानक आने वाली बाढ़ गंभीर चुनौती बन जाती है.
जलवायु परिवर्तन कितना जिम्मेदार, क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
ICIMOD के अनुसार, हिंदू कुश हिमालय के तापमान में औसतन हर दशक करीब 0.28 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो रही है. तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों के पिघलने, बर्फ के भंडार घटने और कुछ क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों के विस्तार का जोखिम बढ़ सकता है. हालांकि, किसी एक बाढ़ या भूस्खलन को केवल जलवायु परिवर्तन का परिणाम बताने के लिए वैज्ञानिक जांच जरूरी है. तेज बारिश, पहाड़ों की भौगोलिक बनावट, नदी के रास्ते में मलबा जमा होना और मानवीय गतिविधियां भी आपदा की गंभीरता को प्रभावित कर सकती हैं. नेपाल जैसे पहाड़ी देश में जोखिम कम करने के लिए समय पर चेतावनी, संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी और प्रभावी आपदा प्रबंधन बेहद महत्वपूर्ण हैं.
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