अल नीनो के कारण भारत दोहरी मौसमी चुनौती का सामना कर रहा है, जिससे मानसून में कमी के बाद अब …और पढ़ें
भारत में सर्दियों में तापमान बढ़ने की आशंका।
अल नीनो 2027 तक दुनिया को प्रभावित कर सकता है।
भारत में मानसून के बाद सर्दियों में तापमान बढ़ने की आशंका।
कृषि और जल संसाधनों पर दबाव बढ़ने की चिंता।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। वैश्विक जलवायु से आ रहे तेजी से बदलावों के बीच अल नीनो ने पूरी दुनिया को अलर्ट पर रख दिया है। भारत के लिए यह मौसमी बदलाव दोहरी चुनौती बनकर सामने आ रहा है।
मानसून के दौरान 13 प्रतिशत कम बारिश होने के बाद, अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह मौसमी घटना सर्दियों में तापमान बढ़ाएगी, क्या ये बारिश के पैटर्न को बिगाड़ेगी और क्या कृषि पर दबाव बढ़ाएगी?
इंडोनेशिया में धधकती भयानक जंगलों की आग से लेकर प्रशांत महासागर में तूफानों की असामान्य सक्रियता तक अल नीनो का असर दुनिया के लगभग हर कोने में देखने को मिल रहा है। अब सवाल यह है कि आने वाले महीनों में और मज़बूत होते अल नीनो का भारत पर क्या असर पड़ सकता है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की रिपोर्ट के अनुसार अल नीनो कई महीनों से लगातार मजबूत हो रहा है। WMO ने चेतावनी जारी की है कि यह घटना 2026 के अंत तक और अधिक तीव्र हो सकती है और इसका प्रभाव 2027 तक बना रह सकता है।
इस असामान्य मौसमी गतिविधि के कारण आने वाले समय में दुनिया भर में अलग-अलग क्षेत्रों में अत्यधिक तापमान, अनिश्चित बारिश और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा काफी बढ़ गया है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या मजबूत होता अल नीनो, मानसून की कमी के असर को और बढ़ा देगा? साथ ही क्या यह आने वाले महीनों में सर्दियों के तापमान, बारिश और कृषि की स्थितियों को प्रभावित करेगा?
अल नीनो एक मौसमी घटना है, जिसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। यह अल नीनो-सदर्न ऑसिलेशन (ENSO) का गर्म चरण है। यह एक प्राकृतिक मौसमी पैटर्न है जो दुनिया भर में वायुमंडलीय परिसंचरण, हवाओं के तंत्र और बारिश के वितरण को प्रभावित करता है।
भारत के मामले में अल नीनो पर कड़ी नजर रखी जाती है, क्योंकि आमतौर पर इसके कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान सामान्य से कम बारिश होने का खतरा बढ़ जाता है।
प्रशांत महासागर के पानी का तापमान बढ़ने से वैश्विक हवाओं और वायुमंडलीय परिसंचरण का पैटर्न बदल जाता है। यह बदलाव उन मौसमी स्थितियों को काफी कमजोर कर देता है जो भारतीय मानसून के लिए मददगार होती हैं। इससे लंबे समय तक सूखा रहने और बारिश की कमी होने की संभावना बढ़ जाती है।
बीते मानसूनी सीजन में भारत के अलग-अलग हिस्सों में बारिश का असमान वितरण देखने को मिला। मध्य भारत में तो लगभग सामान्य बारिश हुई, लेकिन पूर्वी और पूर्वात्तर भारत में 26 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई जिसे असाधारण सूखा माना जा सकता है।
वहीं दक्षिणी राज्यों में भी औसत से 24 प्रतिशत कम बारिश हुई। अल नीनो के और मजबूत होने से भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से ज्यादा गर्मी हो सकती है, जिससे जल संसाधनों और कृषि पर दबाव बढ़ सकता है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने ‘साउथ एशियन क्लाइमेट आउटलुक फोरम’ का हवाला देते हुए अनुमान लगाया है कि अक्टूबर-दिसंबर 2026 के दौरान दक्षिण एशिया के अधिकांश हिस्सों में अधिकतम और न्यूनतम तापमान सामान्य या उससे अधिक रह सकता है।
सर्दियों के आखिर में तापमान बढ़ने से गेहूं की पैदावार पर खतरा आ सकता है, खासकर अगर यह गर्मी गेहूं में दाने भरने के समय के दौरान पड़े। हालांकि इसका वास्तविक असर उस समय के मौसम पर निर्भर करेगा। वहीं जनवरी और फरवरी के हालात जलवायु के बदलते पैटर्न जैसे कि वेस्टर्न डिस्टर्बेंस पर निर्भर करेंगे।
अल नीनो केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका वैश्विक असर बेहद खतरनाक मोड़ ले रहा है। भयंकर गर्मी और सूखे के कारण इंडोनेशिया वर्ष 2015 के बाद से सबसे भयानक जंगल की आग का सामना कर रहा है। पूर्वी अफ्रीका के कुछ क्षेत्रों में जहां भयानक सूखे की स्थिति है, वहीं कुछ अन्य हिस्सों में बेमौसम भारी बारिश और भीषण बाढ़ का प्रकोप दिख रहा है।
पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में उष्णकटिबंधीय तूफानों की गतिविधि असामान्य रूप से तेज हो गई है, जबकि अटलांटिक क्षेत्र में ऊपरी हवाओं के प्रभाव से तूफान बनने की प्रक्रिया बाधित हुई है। अमेजन के जंगलों में सूखे के हालात बने हुए हैं, जबकि दक्षिण अमेरिका के निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है।
आने वाले महीनों में अल नीनो का बढ़ता असर भारत के जल संसाधनों, कृषि पैदावार और खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है। सरकार और कृषि विभागों को किसानों के लिए समय पर एडवाइजरी जारी करने, कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देने और जलाशयों में पानी के सही प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करना होगा ताकि संभावित खाद्य संकट से बचा जा सके।
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