आंदोलन की हदें – Hindustan

भारत में 2 अक्तूबर से तेज हुए विरोध-प्रदर्शनों में कुछ विराम आया दिख रहा है और यह सरकार व आम लोगों के लिए राहत की बात है। कॉकरोच जनता पार्टी अर्थात सीजेपी बनाने वाले अभिजीत दीपके ने भी आंदोलन में फिलहाल विराम की घोषणा करते हुए आग्रह किया है कि आंदोलन के समर्थक त्योहारों के दौरान कुछ समय अपने परिवार के साथ बिताएं। अब आंदोलन फिर कब जोर पकड़ेगा, इस बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है। यहां यह ध्यान देने की बात है कि सीजेपी की भाषा पहले की तुलना में उदार हुई है और यह सकारात्मक बात है। उसके दो नेताओं की हिरासत से भी समीकरण बदले हों, तो आश्चर्य नहीं। चेतावनी की भाषा की जगह अब प्रार्थना के बोल सामने आ रहे हैं। नफरत को खुद पर हावी न होने देने का आग्रह भी सराहनीय है। शांति, करुणा और प्रेम को आंदोलन की ताकत बताया जा रहा है। खुशी होनी चाहिए कि जब अनेक देशों में युवा आगजनी-लूटपाट पर उतारू हैं, तब आंदोलनरत भारतीय युवा गांधीजी को याद कर रहे हैं।

सीजेपी के तल्ख तेवर के नरम पड़ने की चर्चा अवश्य होगी और होनी भी चाहिए। भारतीय शासन व्यवस्था के काम करने का अपना ढंग है। यह व्यवस्था विरोध-प्रदर्शन के मौके देती है, लेकिन चीजों काे नियंत्रण से बाहर न जाने देने के तमाम इंतजाम भी करती रहती है। बहुत मुमकिन है कि 13 अक्तूबर को सीजेपी नेता सौरव दास और आशुतोष रांका के नेतृत्व में अगर जंतर मंतर पर कानून का उल्लंघन न हुआ होता, तो सीजेपी को ऐसी परेशानी नहीं होती। जंतर मंतर पर तिरंगा फहराने के लिए न केवल निषेधाज्ञा को तोड़ा गया, पहले पुलिस से किए गए अनुबंध या बांड की भी अवहेलना हुई। एक समय सीजेपी नेता यह भी कह रहे थे कि उन्होंने किसी बांड पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। समझना होगा, आंदोलन का कोई एक तरीका नहीं होता है और उसमें कई तरह की अभिव्यक्तियां संभव हैं, लेकिन जब मामला पुलिस या अदालत की परिधि में पहुंचता है, तब न्याय मांगने की अपनी स्थापित भाषा लागू हो जाती है। इस भाषा में भी अब सीजेपी नेता पारंगत हो रहे हैं और यह एक तरह से नौजवानों के लिए जरूरी भी है। बुधवार को रांका और सौरव दास को उच्च न्यायालय से अपनी याचिका वापस लेनी पड़ी है। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है, जो कानून तोड़ेगा, उसे हिरासत में लेने का पूरा अधिकार राज्य को है। लगे हाथ, न्यायालय ने विदेश में हो रहे प्रदर्शनों का भी हवाला दिया है और बताया है कि बैरिकेड्स लगाने का एक उद्देश्य होता है। किसी के लिए भी बार-बार बैरिकेड्स की अवहेलना अवैधानिक है।

अब हर आंदोलन या दबाव समूह को अपनी समीक्षा करनी चाहिए। लोग समझ रहे हैं कि यह आंदोलन या दबाव समूह किस तरह से कुछ विपक्षी दलों की संगत में कुछ ज्यादा ही दिख रहा है। भारत में रहते हुए बांग्लादेश के हिंसक प्रदर्शनों से प्रेरणा लेने की बात कहना और येन-केन-प्रकारेण सत्ता परिवर्तन को लक्ष्य बता देना कहीं से भी गांधीवादी तौर-तरीकों में नहीं आता है। बड़बोलापन और गांधीवाद साथ-साथ नहीं चल सकते। देश से हर किसी को प्यार है, हर कोई सुधार चाहता है और यह प्रक्रिया सतत जारी है। आज सरकार उचित ही पूरी सजगता से देख रही है कि देश के बाहर क्या हो रहा है। इस तथ्य को नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि देश-विदेश में कैसे-कैसे तत्व सीजेपी की आंच पर अपनी रोटियां सेंकने लगे हैं? आंदोलन में आया विराम दीर्घ हो या लघु, सुधार के हर सिपाही को ज्यादा गांधीवादी बनकर लौटना चाहिए।

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