Feedback
पाकिस्तान ने तुर्किये, कतर और इंडोनेशिया के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने के लिए बद्र समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. दोहा में हुए इस समझौते का मकसद चारों देशों के बीच रक्षा उत्पादन, तकनीक साझा करने, सैन्य प्रशिक्षण और रिसर्च को बढ़ावा देना है. इसे फिलहाल ऐसा सैन्य गठबंधन नहीं माना जा रहा, जिसके तहत एक देश पर हमला होने पर बाकी देश उसकी तरफ से जंग में उतरेंगे. हालांकि, इस समझौते से रक्षा क्षेत्र में एक नया नेटवर्क बनने की संभावना जरूर बढ़ी है, जिस पर भारत की नजर रहेगी.
बद्र समझौते के तहत चारों देश अपनी रक्षा उत्पादन क्षमता और सैन्य तकनीक को मजबूत करने के लिए मिलकर काम करेंगे. तुर्किये के पास विकसित रक्षा उद्योग और हथियार बनाने की तकनीक है. पाकिस्तान और इंडोनेशिया अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और श्रमबल का योगदान दे सकते हैं, जबकि कतर निवेश और बाजार की मांग के जरिए भूमिका निभा सकता है.
यह भी पढ़ें: ‘ब्रह्मोस ने पाकिस्तान में एकदम सटीक निशाने साधे, तीनों सेनाओं ने…’ CEO ने खोले कई राज
इस समझौते से चारों देशों की रक्षा सप्लाई चेन को जोड़ने और एक-दूसरे की क्षमताओं का इस्तेमाल करने का रास्ता खुल सकता है. हालांकि, समझौते की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है. इसके नाम ‘बद्र’ का सटीक कारण भी स्पष्ट नहीं है. अरबी में इसका अर्थ पूर्णिमा का चांद है. कुछ विशेषज्ञ इसे 624 ईस्वी में हुई जंग-ए-बद्र से भी जोड़ते हैं, जिसे इस्लामी इतिहास में अहम माना जाता है.
मक्का समझौते से कितना अलग?
बद्र समझौता पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के बीच हुए मक्का रक्षा समझौते से अलग है. मक्का समझौते का जोर सामूहिक रक्षा पर है, जिसके तहत एक सदस्य पर हमला बाकी सदस्यों पर हमला माना जा सकता है. इसके उलट, बद्र समझौते का फोकस रक्षा उद्योग और सैन्य क्षमता विकसित करने पर है.
विशेषज्ञों के मुताबिक, दोनों समझौते एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं. एक तरफ मक्का समझौता सैन्य सहयोग पर जोर देता है, तो दूसरी तरफ बद्र रक्षा उत्पादन और तकनीक के जरिए इस क्षमता को मजबूत कर सकता है. रक्षा विश्लेषक अरदा मेवलुतोग्लू के मुताबिक, खाड़ी देशों से दक्षिण-पूर्व एशिया तक रक्षा और सुरक्षा सहयोग का एक जुड़ा हुआ नेटवर्क उभर सकता है.
भारत की चिंता क्यों बढ़ी?
बद्र समझौते में इंडोनेशिया की भागीदारी भारत के लिए खास है. इसी साल जुलाई में भारत ने इंडोनेशिया के साथ करीब 630 मिलियन डॉलर यानी 5,953 करोड़ रुपये के दो रक्षा समझौते किए थे. इनमें ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल की आपूर्ति शामिल है.
ब्रह्मोस का इस्तेमाल भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान किया था. इस मिसाइल ने पाकिस्तानी एयरबेस और रडार ठिकानों को नुकसान पहुंचाया था. ऐसे में भारत के साथ रक्षा समझौता करने वाले इंडोनेशिया का पाकिस्तान के साथ बद्र समझौते में शामिल होना सवाल खड़े करता है.
हालांकि, विशेषज्ञों ने तकनीक लीक होने की आशंकाओं को कम बताया है. रिटायर्ड ग्रुप कैप्टन अजय अहलावत के मुताबिक, समझौता सैन्य गठबंधन के बजाय काम और उत्पादन साझा करने की व्यवस्था लगता है. ब्रह्मोस एयरोस्पेस के पूर्व प्रमुख सुधीर कुमार मिश्रा ने भी कहा कि इंडोनेशिया के साथ समझौते में डेटा सुरक्षा और बौद्धिक संपदा से जुड़े कड़े प्रावधान हैं.
यह भी पढ़ें: उस राफेल का समुद्री टेस्ट भारत ने किया शुरू, जिससे पाकिस्तान को बनाया था बेवकूफ
पाकिस्तान को क्या फायदा हो सकता है?
पाकिस्तान फिलहाल अपने रक्षा उपकरणों और सैन्य आपूर्ति के लिए चीन पर काफी निर्भर है. बद्र समझौता उसे हथियारों और सैन्य तकनीक के नए स्रोत उपलब्ध कराने में मदद कर सकता है. मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और अमेरिका की सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को लेकर सहयोगी देशों की चिंताओं के बीच यह समझौता हुआ है.
हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि बद्र समझौता कितनी ठोस रक्षा परियोजनाओं और उत्पादन में बदल पाएगा. भारत के लिए फिलहाल सबसे अहम सवाल यही है कि यह सहयोग पाकिस्तान की सैन्य क्षमता को कितना बढ़ाता है और क्या इसका असर भविष्य में क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ता है.
Copyright © 2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today
होम
वीडियो
लाइव टीवी
न्यूज़ रील
मेन्यू
मेन्यू