बच्चों को भी बराबरी से मिले इंटरनेट सुविधा – Hindustan

करीब 25 साल पहले की बात है। दिल्ली के कालकाजी इलाके में एक बस्ती के पास, एक दीवार पर इंटरनेट से कनेक्ट किया हुआ कंप्यूटर लगाया गया था। वहां न कोई शिक्षक था, न मदद या मार्गदर्शन करने वाला और न ही किसी तरह के निर्देश दिए गए थे। आस-पास के बच्चे इस कंप्यूटर को देखने आए। उन्होंने कंप्यूटर के माउस से खेलना शुरू किया। खेलते हुए बच्चों ने आपस में सलाह-मशविरा भी किया होगा। खेलते-खेलते, देखते-देखते और कोशिश करते हुए वे अपने आप सीख गए कि इंटरनेट पर कैसे और कहां सफर किया जा सकता है।

कंप्यूटर का ऑपरेटिंग सिस्टम अंग्रेजी में था और इंटरनेट पर मौजूद सामग्री भी अंग्रेजी में थी। बच्चों को अंग्रेजी नहीं आती थी, फिर भी उन्होंने अपना रास्ता ढूंढ़ लिया। वैज्ञानिक डॉ. सुगाता मित्रा का यह प्रसिद्ध प्रयोग ‘होल इन द वॉल’ के नाम से जाना जाता है।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले की खबर पढ़ी, जिसमें बच्चों के इंटरनेट की पहुंच को बच्चों के मौलिक अधिकारों से जोड़कर देखा गया है। यह खबर पढ़ते ही मुझे अनायास ‘होल इन द वॉल’ प्रयोग की याद हो आई।

आज जब दुनिया तेजी से बदल रही है, इंटरनेट के असीम संसार को खोजने, समझने और उसका उपयोग करने के लिए हमें अपने बच्चों को कुशलता और सावधानी के साथ तैयार करना चाहिए। इंटरनेट के माध्यम से बच्चों के सीखने, खोजने और अनुसंधान करने के तरीकों का विस्तार हो सकता है। उन्हें किसी विषय को और गहराई से समझने एवं अपनी जिज्ञासाओं के उत्तर तलाशने के अवसर मिल सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि घर हो या स्कूल, या कोई दूर-दराज का इलाका- हर बच्चे को इंटरनेट तक पहुंचने का समान, सुलभ और सुरक्षित रास्ता मिले।

पिछले बीस वर्षों से देश के ग्रामीण जिलों में ‘असर’ सर्वेक्षण किया जा रहा है। इस सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि बच्चे विद्यालय में नामांकित हैं या नहीं और उनमें पढ़ने व गणित के सवाल हल करने की बुनियादी क्षमताएं कितनी विकसित हुई हैं। बच्चों और उनके परिवारों से जुड़ी कुछ अन्य जानकारियां भी इसमें जुटाई जाती हैं। उदाहरण के लिए, 2018 में किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि ग्रामीण भारत के 90 फीसदी परिवारों के पास साधारण मोबाइल फोन थे, जबकि केवल 36 फीसदी परिवारों के पास स्मार्टफोन। कोविड महामारी के दौरान और उसके बाद इन आंकड़ों में बड़ा बदलाव आया। वर्ष 2022 में 74 प्रतिशत और 2024 में 84 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास स्मार्टफोन पाए गए।

2024 के ‘असर’ सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि 14 से 16 वर्ष की आयु के 82 प्रतिशत लड़के-लड़कियां न सिर्फ स्मार्टफोन के बारे में जानते थे, बल्कि उसका उपयोग करना भी समझ रहे थे। सर्वेक्षण के दौरान इन बच्चों को स्मार्टफोन पर कई काम करने के लिए दिए गए, जैसे कोई जानकारी खोजना, किसी खास विषय से जुड़ी सामग्री ढूंढ़ना और अपने परिचित किसी व्यक्ति को संदेश भेजना। लगभग 75 प्रतिशत बच्चे ऐसे काम आसानी से कर पाए। गौरतलब है कि इनमें से कई बच्चों के पढ़ने और गणित केे बुनियादी कौशल अब भी कमजोर थे।

निस्संदेह, आज के दौर में इंटरनेट पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी इंटरनेट के इस्तेमाल से जुड़े जोखिमों और बच्चों की सुरक्षा की जरूरत को रेखांकित करता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (एनसीएई-एसई) – दोनों दस्तावेज, शिक्षा में डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल के साथ सावधानी, निगरानी और उचित दिशा-निर्देशों की जरूरतों पर जोर देते हैं। इसलिए बच्चों और उनके अभिभावकों, दोनों में जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है, ताकि बच्चे इंटरनेट का सुरक्षित, जिम्मेदार एवं उपयोगी तरीके से इस्तेमाल करना सीख सकें।

‘असर’ 2024 के सर्वेक्षण में 14-16 वर्ष के किशोरों से इंटरनेट सुरक्षा से जुड़े कुछ सवाल भी पूछे गए थे। उनसे पूछा गया कि क्या वे प्रोफाइल को रिपोर्ट करना जानते हैं, अपनी प्रोफाइल की निजता समझते हैं और अपना पासवर्ड बदलना जानते हैं? सर्वेक्षण में शामिल लगभग आधे बच्चे इन सबसे अनजान थे।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश में यह स्पष्ट किया गया है कि बच्चों को हानिकारक सामग्री से बचाने के लिए जिम्मेदार लोगों को लगातार सुरक्षा के मजबूत उपाय विकसित करने होंगे और उन्हें उनके लिए जवाबदेह भी ठहराना होगा, लेकिन बच्चों की सुरक्षा के नाम पर उन पर इंटरनेट या सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर पूर्ण प्रतिबंध लगा देना उचित नहीं होगा। वैसे भी, अतीत के अनुभवों से समझा जा सकता है कि कानूनी प्रतिबंध लगा देने भर से किसी गतिविधि को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता।

जाहिर है, हमें डिजिटल उपकरणों और इंटरनेट को बच्चों की शिक्षा और विकास का सुरक्षित, जिम्मेदार और समान अवसर देने वाला माध्यम बनाने के लिए मिलकर प्रयास करना होगा। इसके लिए बच्चों को डिजिटल सुरक्षा के प्रति जागरूक करना, उन्हें सही निर्णय लेने के लिए तैयार करना और अभिभावकों व शिक्षकों को भी आवश्यक जानकारी और कौशल देना बेहद जरूरी है।

इंटरनेट से बच्चे बहुत कुछ सीख सकते हैं। वे अपनी पसंद के विषयों के बारे में और गहराई से जान सकते हैं और अपने आस-पास की दुनिया से आगे बढ़कर पूरी दुनिया को समझ सकते हैं। इंटरनेट उन्हें नए सवालों के नए तरीके के जवाब खोजने, नई चीजें सीखने और अपनी रुचियों को आगे बढ़ाने के बहुत अवसर देता है।

एक तरफ सीखने की असीम संभावनाएं हैं, तो दूसरी तरफ सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां भी। हमें इनके बीच संतुलन बनाते हुए आगे बढ़ना होगा। 25 साल पहले कालकाजी की बस्ती के उत्साही बच्चों ने दिखा दिया था कि सीखने के लिए जिज्ञासा, कोशिश और खोज की भावना कितनी महत्वपूर्ण होती है। हमारा सपना होना चाहिए कि देश के करोड़ों बच्चे भी उसी प्रेरणादायी रास्ते पर चलें, दुनिया को नए नजरिये से देखें, उसे समझें और उससे सीखें।

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