सर्वोच्च न्यायालय के प्रति पूर्ण सम्मान रखते हुए भी, मीडिया रिपोर्टों में बताई गई इस टिप्पणी पर कि बच्चों पर इंटरनेट का पूर्ण प्रतिबंध अनुचित है, गंभीर प्रश्नचिह्न लग जाता है। क्या अधिकार की चर्चा करते समय हम उस बच्चे की वास्तविक सुरक्षा को पीछे छोड़ दें, जो स्क्रीन के दूसरी ओर बैठा है? साइबर कानून और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) कानून में तीन दशक के काम के अनुभव से मेरा मत स्पष्ट हुआ है। इंटरनेट बच्चों के लिए अवसर भी है और जोखिम भी, पर आज जोखिम इतना बड़ा और तेज है कि कानून को अधिक सतर्क और निर्णायक होना पड़ेगा।
सबसे पहले हम बच्चों के सामने उपस्थित खतरे की बात करें। इसमें पहला खतरा वाहियात सामग्री का है। हिंसा, अश्लीलता और नफरत फैलाने वाली सामग्रियों एक क्लिक की दूरी पर होती हैं। बच्चा उसे खोजता नहीं, कई बार एल्गोरिदम स्वयं उसके सामने ऐसी सामग्री को परोस देता है। दूसरा खतरा ऑनलाइन ग्रूमिंग और यौन शोषण का है। इसमें कोई अपराधी इंटरनेट के माध्यम से किसी बच्चे से दोस्ती करता है, उसका भावनात्मक भरोसा जीतता है और फिर उसका यौन शोषण, ब्लैकमेल या वित्तीय धोखाधड़ी करने के लिए उसके मानस पर नियंत्रण कर लेता है। इसका पता माता-पिता को बिल्कुल नहीं चलता है। तीसरा खतरा साइबर बुलिंग का है। इसमें इंटरनेट, मोबाइल फोन या डिजिटल उपकरणों के माध्यम से किसी बच्चे को बार-बार जान-बूझकर परेशान करना, डराना, अपमानित करना या नुकसान पहुंचाना शामिल है। स्कूल की धमकी बच्चे के बिस्तर तक पहुंच जाती है। उसका दुष्प्रभाव बच्चे के आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा पड़ता है।
चौथा खतरा लत का है। अनंत स्क्रॉल, ऑटोप्ले और नोटिफिकेशन जैसी डिजाइन तकनीकें जान-बूझकर ध्यान को बांधने के लिए बनाई जाती हैं। वयस्क भी इनसे जूझते हैं, तो विकसित हो रहे बच्चे के मस्तिष्क से बराबरी की अपेक्षा कैसे की जाए? पांचवां खतरा डीपफेक और एआई जनित सामग्री का है। बच्चों की तस्वीरों से बनाई गई छेड़छाड़ वाली सामग्री, एआई चैटबॉट के साथ भावनात्मक निर्भरता और भ्रामक सूचनाएं नए जोखिम हैं, जिनके लिए हमारे कानून अभी पूरी तरह तैयार नहीं हैं। छठा खतरा डाटा के शोषण का है। बच्चों की पसंद, लोकेशन और व्यवहार का डाटा इकट्ठा कर उनका विज्ञापन और प्रोफाइलिंग की जाती है। इसमें साइबर ठगी और ऑनलाइन गेमिंग के जरिये होने वाली आर्थिक धोखाधड़ी भी शामिल है।
हमें समझना चाहिए कि शिक्षा और सूचना जरूरी है, लेकिन अधिकार कभी निरपेक्ष नहीं होते। अपराधी संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त अधिकारों के नाम पर अपने अपराध को सही ठहराने की कोशिश करते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि हमारे संविधान में हर अधिकार के साथ युक्तियुक्त प्रतिबंध की अवधारणा जुड़ी है। बच्चों को वयस्कों की तरह मताधिकार, अनुबंध या शराब खरीदने की छूट नहीं है, क्योंकि राज्य का दायित्व है कि वह उन्हें ऐसे निर्णयों से बचाए, जिनके परिणाम समझने की परिपक्वता उनमें अभी विकसित नहीं हुई है। यही तर्क ऑनलाइन दुनिया पर भी लागू होना चाहिए। बच्चे का जीवन और गरिमा का अधिकार, हर सुविधा तक असीमित पहुंच के अधिकार से ऊपर है।
यही कारण है कि दुनिया के कई लोकतांत्रिक देश बच्चों को सोशल मीडिया पर आने से रोक रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने दिसंबर 2025 में 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया खाता रखने के खिलाफ कानून बनाया। इसका मूल संदेश है कि सुरक्षा की जिम्मेदारी बच्चों और माता-पिता पर नहीं, प्लेटफॉर्म पर डाली जाए। अन्य कई देशों में भी इसी तरह के कानून बन रहे हैं। इन कदमों के पीछे एक साझा समझ है। स्वैच्छिक नियम और कंपनियों के आश्वासन अपर्याप्त सिद्ध हुए हैं। जब तक कानूनी बाध्यता नहीं होती, सुरक्षा व्यावसायिक हितों के बाद आती है। आयु-सीमा बच्चे को सजा नहीं देती, वह प्लेटफॉर्म को जवाबदेह बनाती है। भारत का ‘डिजिटल व्यक्तिगत डाटा संरक्षण अधिनियम-2023’ बच्चों द्वारा डाटा उपयोग के लिए सत्यापन योग्य अभिभावकीय सहमति का प्रावधान करता है और बच्चों की ट्रैकिंग तथा उनको लक्ष्य कर बनाए विज्ञापन पर रोक लगाता है, पर इसके क्रियान्वयन की चुनौतियां बड़ी हैं। सत्यापन की व्यावहारिक विधि क्या होगी और निजता की रक्षा करते हुए आयु की पुष्टि कैसे होगी, ये प्रश्न अभी हैं।
इस तरह की चुनौतियों से निपटने के लिए कुछ अग्रिम उपाय किए जाने चाहिए। सबसे पहले, हर आयु वर्ग के लिए अलग-अलग नियम हों। दूसरा, बच्चों के लिए डिफॉल्ट रूप से सुरक्षित सेटिंग अनिवार्य हों और उल्लंघन पर सार्थक दंड लगे। तीसरा, गोपनीयता का सम्मान करते हुए आयु के सत्यापन की तकनीक विकसित की जानी चाहिए, जो बच्चे की पहचान उजागर किए बिना केवल आयु की पुष्टि करे। चौथा, मनोवैज्ञानिक रूप से हानिकारक डिजाइन पर रोक लगे। बच्चों के लिए अनंत स्क्रॉल, ऑटोप्ले प्रतिबंधित हों। पांचवां, एआई के लिए विशेष नियम बनें। छठा, स्कूलों के पाठ्यक्रम में साइबर सुरक्षा और ऑनलाइन व्यवहार की शिक्षा शामिल हो और माता-पिता को भी प्रशिक्षित किया जाए। सातवां, बच्चों के विरुद्ध ऑनलाइन अपराध पर सामग्री हटाने की समयबद्ध प्रक्रिया और पीड़ित के लिए सहायता तंत्र हो और आठवां, अंतरराष्ट्रीय सहयोग किया जाए।
निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि प्रश्न यह नहीं है कि बच्चे डिजिटल दुनिया से कटें या जुड़ें। प्रश्न यह है कि वे किस उम्र में, किन शर्तों पर और किसकी जवाबदेही के साथ जुड़ें। जब तक तकनीकी कंपनियां बच्चों के लिए सुरक्षित डिजाइन की जिम्मेदारी नहीं निभातीं, तब तक आयु-आधारित प्रतिबंध एक आवश्यक सुरक्षा कवच है। बच्चों का हित सर्वोपरि है और कानून को इस सत्य के साथ खड़ा होना चाहिए।
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