जापान में बदल रही अंतिम संस्कार की सदियों पुरानी परंपरा, पेड़ों के नीचे दफनाई जा रहीं अस्थियां – Jagran

घटती आबादी, बुजुर्गों की बढ़ती संख्या और आसमान छूते खर्चों ने जापान की पारंपरिक अंतिम संस्कार व्यवस्था की जड़ें हिला …और पढ़ें
जापान में बदल रही सदियों पुरानी परंपरा (AI से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर)
पारंपरिक अंतिम संस्कार का खर्च 16 लाख रुपये तक पहुंचा।
लोग पेड़ों के नीचे अस्थियां दफनाने लगे, 40% नए तरीके।
‘हकाजिमाई’ और ‘बोन बुद्ध’ जैसी प्रथाएं लोकप्रिय हो रही हैं।
डिजिटल डेस्क, टोक्यो। आधुनिकता और तकनीकी प्रगति की चमक के पीछे जापान एक गहरे, खामोश और गंभीर मानवीय संकट से जूझ रहा है। घटती जन्मदर, तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी और आसमान छूती महंगाई ने जापानी समाज की सदियों पुरानी अंतिम संस्कार व्यवस्था की जड़ों को झकझोर कर रख दिया है।
स्थिति यह है कि देश में एक साधारण अंतिम संस्कार और पारंपरिक कब्र का कुल खर्च अब 16 लाख रुपए तक पहुंच चुका है। यह बढ़ता वित्तीय बोझ आम नागरिकों के लिए जीवन भर की कमाई का एक बड़ा हिस्सा झटकने वाला ऐसा अभिशाप बन गया है, जो अपनों के जाने के बाद परिवारों को आर्थिक और मानसिक दोहरे तनाव में धकेल रहा है।
हालात इतने खराब हो गए हैं कि वहां के लोग पारंपरिक अंतिम संस्कार की व्यवस्था को छोड़कर नए रास्ते तलाशने में जुट गए हैं। 
इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि जापान में लगभग 99.9% शवों का दाह-संस्कार किया जाता है, जिसके बाद अस्थियों को कलश में रखकर कब्र या अस्थि-गृह में दफनाया जाता है। जापानी समाज में पूर्वजों की कब्रों की देखभाल करना बेहद जरूरी धार्मिक कर्तव्य माना जाता रहा है।
लेकिन, यूनिवर्सिटी ऑफ रिचमंड की एसोसिएट प्रोफेसर मिमी हनाओका के अनुसार, कम जन्म दर और बुजुर्ग होती आबादी के कारण अब परिवारों में कब्रों की देखभाल करने वाले लोग नहीं बचे हैं। इसके अलावा, आर्थिक तंगी और महंगाई ने इन परंपराओं को हिलाकर रख दिया है।
साल 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, जापान में केवल एक कब्र के पत्थर और एक वर्ग फीट जमीन का खर्च ही लगभग 8.3 लाख रुपए है। वहीं, अंतिम संस्कार और कब्र का कुल खर्च बढ़कर 16 लाख रुपए तक हो जाता है।
इतना ही नहीं, मंदिर या नगर निगम को हर साल लगभग 2200 रुपए का सालाना रखरखाव शुल्क अलग से देना पड़ता है। इस भारी-भरकम खर्च से बचने के लिए अब जापानी लोग नए रास्ते तलाश रहे हैं।
महंगी कब्रों से बचने के लिए जापान में पेड़ों के नीचे अस्थियां दफनाने का चलन बहुत तेजी से बढ़ा है। आज के समय में नई कब्रों में से 40% से अधिक अंतिम संस्कार पेड़ों के नीचे ही किए जा रहे हैं। इसमें खर्च भी कम आता है और कोई सालाना फीस भी नहीं चुकानी पड़ती।
अपने बच्चों या परिवार पर पैसों का बोझ न पड़े, इसके लिए लोग ‘हकाजिमाई’ यानी पुरानी पारिवारिक कब्र को बंद करने का विकल्प चुन रहे हैं। इसके तहत पुश्तैनी कब्र से अस्थियां निकालकर उन्हें सामूहिक अस्थि-गृह में रखवा दिया जाता है, जिससे सालाना मेंटेनेंस का झंझट खत्म हो जाता है।
जापान में इन सभी चिजों के ‘बोन बुद्ध’ भी खूब चर्चा में है। यह जापान की एक बेहद अनोखी प्रथा है। प्राचीन काल में अनाथ लोगों की अस्थियों के पाउडर से भगवान बुद्ध की मूर्तियां बनाई जाती थीं, जिन्हें ‘बोन बुद्ध’ कहा जाता है। अब इस भावनात्मक और किफायती रास्ते को आम लोग भी तेजी से अपना रहे हैं।
कुल मिलाकर, बदलते समय और आधुनिकीकरण के दौर में जापान ने यह साबित कर दिया है कि जीवन के साथ-साथ अंतिम विदाई के तौर-तरीके भी व्यावहारिक और किफायती हो सकते हैं।

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