BRICS Summit 2026: भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत, पाकिस्तान से लेकर ईरान-UAE तक PM मोदी ने कैसे साधे समीकरण? जाने – India.com

BRICS Summit 2026: भारत की अध्यक्षता में आयोजित BRICS Summit 2026 सिर्फ बैठकों और घोषणाओं तक सीमित नहीं रहा. नई दिल्ली के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसे समय में BRICS देशों को एक साथ लाने की थी, जब समूह के सदस्य देशों के बीच पश्चिम एशिया, युद्ध, व्यापार और वैश्विक राजनीति जैसे मुद्दों पर गहरे मतभेद मौजूद हैं. इसके बावजूद सदस्य देशों ने नई दिल्ली घोषणा को सर्वसम्मति से स्वीकार किया.

BRICS के विस्तार के बाद समूह के अंदर अलग-अलग राजनीतिक और रणनीतिक हितों का असर बढ़ा है. ऐसे में भारत के लिए यह देखना जरूरी था कि क्या वह इन मतभेदों के बीच साझा एजेंडा तैयार कर सकता है. साथ ही एक और अहम चुनौती यह थी कि BRICS को अमेरिका या पश्चिम के खिलाफ सीधे खड़े होने वाले समूह में बदलने से कैसे रोका जाए.

भारत इन दोनों मोर्चों पर संतुलन बनाने में सफल रहा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन के दौरान कई देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं. तीन दिनों के दौरान उन्होंने 15 औपचारिक द्विपक्षीय बैठकें कीं, जो भारत की सक्रिय कूटनीति को दिखाता है.आइए समझते हैं कि दिल्ली BRICS Summit को भारत की कूटनीतिक सफलता क्यों माना जा रहा है.

BRICS Summit के सामने सबसे बड़ी चुनौती पश्चिम एशिया का संघर्ष था. ईरान और UAE इस मुद्दे पर अलग-अलग रुख रखते हैं और दोनों देशों के मतभेद BRICS के भीतर भी एक बड़ी चुनौती बन चुके थे. इससे पहले विदेश मंत्रियों की बैठक में पश्चिम एशिया को लेकर सहमति नहीं बन सकी थी और संयुक्त बयान जारी नहीं हो पाया था.
ऐसे माहौल में नेताओं के स्तर पर एक साझा घोषणा हासिल करना भारत के लिए आसान नहीं था. लेकिन दिल्ली सम्मेलन में तस्वीर बदली. ईरान और UAE दोनों ने पश्चिम एशिया में संयम की अपील वाले BRICS बयान का समर्थन किया.

इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह रही कि सम्मेलन से इतर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच मुलाकात हुई. यह बैठक दोनों देशों के बीच संघर्ष शुरू होने के बाद उच्च स्तर की महत्वपूर्ण बातचीत के तौर पर सामने आई.
भारत के लिए यह इसलिए अहम था क्योंकि वह ईरान और UAE के मतभेदों को पूरे BRICS के लिए बाधा बनने से रोकने में सफल रहा. दिल्ली ने सिर्फ सम्मेलन की मेजबानी नहीं की, बल्कि संवाद के लिए एक कूटनीतिक मंच भी उपलब्ध कराया.
भारत की दूसरी बड़ी उपलब्धि BRICS में सहमति की वापसी रही. समूह के विस्तार के बाद अलग-अलग देशों के हितों को एक साझा दस्तावेज में शामिल करना लगातार मुश्किल हुआ है. पिछले विदेश मंत्रियों के स्तर की बैठक में संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका था.
इसी वजह से दिल्ली Summit से पहले सवाल था कि क्या BRICS फिर से साझा घोषणा पर सहमत हो पाएगा. भारत की अध्यक्षता में इसका जवाब हां रहा. सदस्य देशों ने New Delhi Declaration को सर्वसम्मति से स्वीकार किया.
इस घोषणा में सिर्फ भू-राजनीतिक मुद्दे नहीं थे. इसमें वैश्विक संस्थाओं में सुधार, विकास वित्त, व्यापार, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सप्लाई चेन और दूसरे सहयोगी क्षेत्रों पर भी जोर दिया गया. घोषणा में भारत की BRICS अध्यक्षता की सराहना भी की गई.
ये उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि BRICS की कार्यप्रणाली काफी हद तक आम सहमति पर आधारित है. ऐसे समय में साझा दस्तावेज पर सहमति बनना यह संकेत देता है कि मतभेदों के बावजूद समूह काम करने की क्षमता रखता है.
भारत के लिए समिट का एक और बड़ा कूटनीतिक लाभ पहलगाम आतंकी हमले का BRICS Declaration में स्पष्ट उल्लेख रहा. 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर में हुए इस हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे.
नई दिल्ली घोषणा में BRICS देशों ने इस आतंकी हमले की कड़ी निंदा की. बयान में आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक प्रतिबद्धता दोहराई गई. इसमें आतंकियों की सीमा पार आवाजाही, आतंकवाद की फंडिंग और आतंकियों को सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराने जैसे मुद्दों का भी उल्लेख किया गया.
घोषणा में आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस की बात कही गई और आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई में दोहरे मानदंडों को खारिज किया गया. हालांकि, बयान में पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया, लेकिन पहलगाम हमले का स्पष्ट उल्लेख भारत के लिए महत्वपूर्ण रहा.
इसका एक बड़ा कूटनीतिक महत्व यह भी है कि चीन BRICS का हिस्सा है और उसके पाकिस्तान के साथ करीबी संबंध हैं. इसके बावजूद पहलगाम हमले को BRICS के सामूहिक बयान में जगह मिलना भारत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही.
भारत ने इस मुद्दे को सिर्फ भारत-पाकिस्तान के बीच के विवाद के रूप में पेश करने के बजाय आतंकवाद के खिलाफ व्यापक वैश्विक अभियान से जोड़ने की कोशिश की. इससे आतंकवाद, टेरर फंडिंग और सुरक्षित ठिकानों जैसे मुद्दे BRICS के साझा एजेंडे का हिस्सा बने.
भारत की चौथी उपलब्धि शायद सबसे ज्यादा रणनीतिक थी. BRICS में चीन और रूस जैसे देश हैं, जिनके अमेरिका के साथ रिश्तों में गंभीर तनाव है. रूस यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है, जबकि चीन और अमेरिका के बीच व्यापार और वैश्विक प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा चल रही है.
ऐसे माहौल में भारत ने BRICS को किसी एक देश या पश्चिम के खिलाफ राजनीतिक मंच बनाने के बजाय विकासशील देशों की चिंताओं पर केंद्रित रखा.
नई दिल्ली घोषणा में वैश्विक संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों की ज्यादा भागीदारी की मांग की गई. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार का समर्थन किया गया. साथ ही IMF और World Bank जैसी संस्थाओं में विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने की बात भी सामने आई.
घोषणा में एकतरफा प्रतिबंधों और संरक्षणवादी नीतियों की आलोचना जरूर की गई, लेकिन इसका व्यापक फोकस एक अधिक समान, खुले और नियम आधारित वैश्विक व्यापार तंत्र पर रहा.
इसी संतुलन को पूर्व राजनयिक वीणा सिकरी ने भारत की ‘non-West’, न कि ‘anti-West’ नीति के रूप में बताया. यानी भारत का संदेश यह रहा कि वह पश्चिम विरोधी गठजोड़ नहीं चाहता, बल्कि सभी देशों के साथ सहयोग के आधार पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है.
भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि व्यापक स्तर पर देखें तो यही रही कि उसने बेहद मुश्किल अंतरराष्ट्रीय माहौल में BRICS को एक साझा मंच पर बनाए रखा.
2026 का BRICS अपने शुरुआती पांच देशों वाले स्वरूप से काफी अलग है. समूह के विस्तार के बाद इसमें अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं, आर्थिक हितों और रणनीतिक प्राथमिकताओं वाले देश शामिल हैं. ऐसे में साझा रुख तैयार करना पहले की तुलना में ज्यादा कठिन हो गया है.
इस साल चुनौती और बढ़ गई क्योंकि समूह के कुछ सदस्य सीधे बड़े युद्धों से जुड़े हुए हैं. रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध जारी है, जबकि ईरान पश्चिम एशिया के बढ़ते संघर्ष के केंद्र में है. इन संघर्षों का असर ऊर्जा, शिपिंग, सप्लाई चेन, खाद्य सुरक्षा और महंगाई तक पहुंच रहा है.
इसके बावजूद नई दिल्ली घोषणा में अलग-अलग देशों के हितों को जगह देते हुए साझा मुद्दों पर सहमति बनाने की कोशिश की गई. पश्चिम एशिया के संदर्भ में संयम और कूटनीति पर जोर दिया गया. व्यापक अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान के लिए बातचीत और संवाद को प्राथमिकता देने की बात कही गई.
आर्थिक एजेंडे में भी विकास, सप्लाई चेन, तकनीक, वित्तीय सहयोग और मजबूती जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी गई. इस तरह भारत ने BRICS के एजेंडे को सिर्फ भू-राजनीतिक टकराव तक सीमित नहीं होने दिया.
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हल्द्वानी से दिल्ली के बड़े न्यूजरूम तक… तनुजा जोशी, उत्तराखंड के शांत और खूबसूरत शहर हल्द्वानी से ताल्लुक रखती हैं. देहरादून के ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी … और पढ़ें
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