Explained: भारत के पहाड़ी शहरों पर मंडरा रहा कौन सा खतरा? हिमालय की 188 झीलें फटने को तैयार – ABP News

भारत के पहाड़ी शहरों पर इस समय जो सबसे बड़ा और अनदेखा खतरा मंडरा रहा है, उसका नाम है ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF). यानी ग्लेशियरों के पिघलने से बनी झीलों का अचानक फट जाना और पानी का भयंकर बहाव नीचे की ओर आना. संयुक्त राष्ट्र (UN) की स्टडी के मुताबिक, हिंदू-कुश हिमालय क्षेत्र में GLOF से सबसे ज्यादा मौतें भारत में हुई हैं. यहां 62 घटनाओं में 6,119 लोगों की जान गई, जबकि चीन में 199 घटनाओं में 625 और पाकिस्तान में 152 घटनाओं में 1,991 मौतें दर्ज हुईं. यह आंकड़ा ही बताता है कि खतरा कितना गंभीर है और तैयारी कितनी कमजोर.
तो आखिर भारत के किन पहाड़ी शहरों पर कौन सा खतरा मंडरा रहा है…
GLOF आखिर है क्या और क्यों इतना खतरनाक?
ग्लेशियल झीलें ग्लेशियर के पिघलने से बनती हैं. जब इन झीलों का पानी अचानक बढ़ जाता है और इन्हें रोकने वाली प्राकृतिक बाधा (मोरेन या बर्फ) टूट जाती है, तो पानी मलबे और बोल्डरों के साथ तेज बहाव में नीचे आता है.
यह बहाव इतना ताकतवर होता है कि कुछ ही मिनटों में गांव, सड़कें, पुल और पावर प्रोजेक्ट तबाह हो सकते हैं. यह कोई दूर की कल्पना नहीं, बल्कि सिक्किम (2023) और उत्तराखंड के धराली (2025) में ऐसी तबाही देखी जा चुकी है.
कितनी झीलें हैं खतरे में?
हिमालयी क्षेत्र में कुल 28,043 ग्लेशियल झीलें हैं, जिनमें से 188 बेहद जोखिम वाली मानी गई हैं. इनसे करीब 3 करोड़ लोगों पर सीधा खतरा है. सबसे ज्यादा खतरा सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश की 129 झीलों पर है. इसके अलावा लद्दाख-कश्मीर की कई झीलें, हिमाचल की घेपन झील (लाहौल-स्पीति) और उत्तराखंड की कई झीलें हाई-रिस्क श्रेणी में हैं.
हिमाचल की ‘घेपन झील’: 5 मिनट में तबाही का अंदेशा
लाहौल-स्पीति में 4,070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित घेपन ग्लेशियल झील का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है. प्रशासन का आकलन है कि अगर यह झील फटती है, तो पानी सिर्फ 5 मिनट में आबादी वाले इलाकों तक पहुंच सकता है. यही नहीं, मनाली जैसे लोकप्रिय पर्यटन शहर भी GLOF के खतरे वाले क्षेत्र में आते हैं.
भारत में मौतें ज्यादा क्यों?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि GLOF की घटनाओं की संख्या में भारत तीसरे नंबर पर है, लेकिन मौतों में सबसे आगे. इसकी सबसे बड़ी वजह तैयारी और निगरानी की कमी है.
रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि भारत ने 2023 की सिक्किम त्रासदी या 2025 की चमोली घटना से सबक नहीं लिया. चीन और पाकिस्तान की तुलना में भारत के पास GLOF से बचाव के लिए ठोस रणनीति और अर्ली वार्निंग सिस्टम कम है.
सिर्फ GLOF ही नहीं और भी खतरे
पहाड़ी शहरों पर सिर्फ GLOF ही नहीं, बल्कि भूस्खलन, अचानक बाढ़, बांधों का जोखिम, अत्यधिक पर्यटन और कमजोर बुनियादी ढांचा भी मंडरा रहा है. इन सभी खतरों की जड़ में जलवायु परिवर्तन और अनियोजित निर्माण दोनों हैं.
बढ़ते तापमान से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे झीलें बन रही हैं और उनका आकार बढ़ रहा है. वहीं, पहाड़ों में बिना सोचे-समझे हो रहे निर्माण से इन खतरों का असर और भी भयानक हो जाता है.
सरकारी तंत्र और फंडिंग: कितनी तैयारी, कितनी कमी?
सितंबर 2026 में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने हिमालयी राज्यों (उत्तराखंड, हिमाचल, सिक्किम, अरुणाचल और जम्मू-कश्मीर) के मुख्य सचिवों और आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक की. इसमें साफ कहा गया कि GLOF की तैयारी सिर्फ प्रतिक्रिया-केंद्रित नहीं, बल्कि जोखिम-सूचित योजना, निवारक शमन उपायों और सामुदायिक स्तर की तैयारी की दिशा में बढ़नी चाहिए.
हिमाचल प्रदेश ने 105 करोड़ रुपए का प्रस्ताव NDMA को भेजा है, जिसमें 4 प्रमुख झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम और अन्य शमन उपाय शामिल हैं. NDMA के नेतृत्व में एक एकीकृत जोखिम-वर्गीकरण ढांचा भी विकसित किया जा रहा है.
हिमाचल के विशेष सचिव (आपदा प्रबंधन) पुष्पिंदर राणा ने माना कि 67 संवेदनशील झीलों की पहचान चिंता का विषय है, खासकर जब हाल की घटनाओं ने दिखाया है कि बिना भारी बारिश के भी बड़ी आपदाएं आ सकती हैं. सबसे बड़ी अड़चन दूरदराज के इलाकों में नेटवर्क कनेक्टिविटी की कमी है. सेंसर कहां लगेंगे, कैसे लगेंगे और डेटा कैसे ट्रांसफर होगा, यह एक बड़ी तकनीकी चुनौती है.
सिर्फ चेतावनी नहीं, ठोस कदम चाहिए
भारत के पहाड़ी शहरों के लिए GLOF एक ‘टाइम बम’ की तरह है. 188 झीलों का खतरा और 3 करोड़ लोगों की सुरक्षा कोई छोटी बात नहीं है. सरकार ने कुछ झीलों में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की पहल की है, लेकिन यह बहुत कम है.
असली जरूरत है कि हर जोखिम वाली झील की वैज्ञानिक निगरानी, निचले इलाकों में निकासी योजना, सख्त निर्माण नियम और जलवायु अनुकूलन होना चाहिए. अगर अभी भी चेतने की जरूरत समझ नहीं आई, तो अगली बड़ी त्रासदी किसी भी पहाड़ी शहर में हो सकती है. तब सिर्फ आंकड़े नहीं, पूरा शहर ही मिट सकता है.
ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.
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