Explainer: पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की रेस में कौन-कौन देश शामिल? नई फ्यूल पॉलिसी लागू करने के क्या हैं नियम – India.Com

दुनिया भर में ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की कोशिशों के बीच पेट्रोल-एथेनॉल ब्लेंडिंग तेजी से लोकप्रिय हो रही है. कई देशों ने अपने परिवहन ईंधन में एथेनॉल को शामिल कर न केवल प्रदूषण कम करने की कोशिश की है बल्कि घरेलू कृषि और बायोफ्यूल इंडस्ट्री को भी मजबूत बनाया है.

भारत ने बीते कुछ सालों में एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम को तेजी से आगे बढ़ाया है. सरकार ने निर्धारित समय से पहले पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य हासिल कर लिया, लेकिन सवाल ये है कि आखिर एथेनॉल ब्लेंडिंग क्या है, कौन-कौन से देश इसे अपनाते हैं और नए ईंधन को बाजार में लाने से पहले किन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है?

एथेनॉल एक जैव ईंधन (Biofuel) है, जिसे मुख्य रूप से गन्ने, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है. जब इसे पेट्रोल में एक फिक्स रेशियो में मिलाया जाता है, तो उसे एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल कहा जाता है.

इससे पेट्रोल की खपत कम होती है और कार्बन उत्सर्जन घटाने में मदद मिलती है.

भारत
भारत ने E20 को बड़े पैमाने पर लागू किया है। सरकार का उद्देश्य विदेशी तेल आयात कम करना और किसानों की आय बढ़ाना है.
ब्राजील
ब्राजील इस क्षेत्र में दुनिया का अग्रणी देश है. यहां सामान्य पेट्रोल में लगभग 27 प्रतिशत एथेनॉल मिलाया जाता है. वहीं, कई वाहन 100 प्रतिशत एथेनॉल पर भी चल सकते हैं.
अमेरिका
अमेरिका में E10 सबसे आम है, जबकि E15 और E85 भी उपलब्ध हैं. वहां फ्लेक्स फ्यूल वाहन बड़ी संख्या में उपयोग किए जाते हैं.
कनाडा
कनाडा स्वच्छ ईंधन नियमों के तहत एथेनॉल के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रहा है.
थाईलैंड
थाईलैंड में E10, E20 और E85 जैसे कई विकल्प उपलब्ध हैं.
यूरोपीय संघ
यूरोप के ज्यादातर देशों में E5 और E10 मिश्रण सामान्य रूप से इस्तेमाल किए जाते हैं.
सबसे पहले ईंधन की गुणवत्ता और रासायनिक संरचना तय की जाती है. भारत में ये जिम्मेदारी भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) की होती है.
इसके बाद गाड़ी के इंजनों पर परीक्षण किए जाते हैं ताकि ये सुनिश्चित हो सके कि नया ईंधन इंजन की कार्यक्षमता, माइलेज और उत्सर्जन मानकों को प्रभावित नहीं करेगा.
सरकारें एनवायरमेंटल इंपैक्ट पर भी स्टडी करती हैं. इसमें ये देखा जाता है कि नया फ्यूल कार्बन उत्सर्जन को कितना कम करेगा और एयर क्वालिटी पर उसका क्या असर पड़ेगा.
इसके बाद पेट्रोल पंप, स्टोरेज टैंक और सप्लाई चेन को नए ईंधन के अनुरूप तैयार किया जाता है.
एथेनॉल पेट्रोल की तुलना में अलग गुण रखता है. ये पानी को ज्यादा आकर्षित करता है और कुछ धातुओं और प्लास्टिक पर असर डाल सकता है. इस कारण कंपनियों को कई तकनीकी बदलाव करने पड़ते हैं.
फ्लेक्स फ्यूल व्हीकल (FFV) ऐसे वाहन होते हैं, जो E20, E85 या उससे अधिक एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन पर भी आसानी से चल सकते हैं. इन गाड़ियों में स्पेशल सेंसर लगे होते हैं जो फ्यूल में एथेनॉल की मात्रा पहचानकर इंजन सेटिंग्स को खुद एडजस्ट कर देते हैं.
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हल्द्वानी से दिल्ली के बड़े न्यूजरूम तक… तनुजा जोशी, उत्तराखंड के शांत और खूबसूरत शहर हल्द्वानी से ताल्लुक रखती हैं. देहरादून के ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी … और पढ़ें
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