Jagannath Rath Yatra 2026: रथ यात्रा का सबसे बड़ा रहस्य! आखिर क्यों साल में सिर्फ एक बार मंदिर से बाहर आते है – India.Com

Jagannath Rath Yatra 2026: पुरातन परंपराओं और अटूट आस्था की भूमि है ओडिशा की पुरी नगरी. यहां स्थित जगन्ननाथ मंदिर के भव्य गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और लाडली बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं. साल के 364 दिन भक्त भगवान के द्वार जाते हैं, लेकिन आषाढ़ मास आते ही एक अनूठा चमत्कार होता है. जब भगवान जगन्नाथ स्वयं अपने सिंहासन से उतरकर, मंदिर की चौखट लांघकर, आम जनता के बीच सड़क पर आ जाते हैं और इसे जगन्नाथ रथ यात्रा कहा जाता है. यह यात्रा जगन्नाथ मंदिर से गुंडीचा मंदिर तक जाती है जिसे भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर भी कहा जाता है. पंचांग के अनुसार इस साल 16 जुलाई 2026 को शुरू होगी और 24 जुलाई 2026 को समाप्त होगी. आइए जानते हैं कि भगवान जगन्नाथ साल में एक बार ही क्यों गर्भगृह से बाहर निकलकर यात्रा पर जाते हैं.

भगवान जगन्नाथ को ‘पतित पावन’ कहा जाता है- यानी जो गिरते हुओं को उठा ले और हर आत्मा का उद्धार करे. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एक दौर ऐसा भी था जब समाज के कुछ वंचित वर्गों को मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं थी. तब भगवान ने सोचा- ‘यदि मेरे बच्चे मेरे पास नहीं आ सकते, तो क्या हुआ? मैं खुद उनके पास जाऊंगा.’

जगन्नाथ रथयात्रा केवल एक धार्मिक जुलूस नहीं है, यह सामाजिक समानता का सबसे बड़ा उद्घोष है. इन नौ दिनों में जाति, धर्म, ऊंच-नीच और अमीरी-गरीबी की हर दीवार ढह जाती है. भगवान का रथ सबके लिए खिंचता है, और उनके दर्शन पर हर आंख का समान अधिकार होता है.

भगवान जगन्नाथ की इस भव्य यात्रा की शुरुआत के पीछे भाई-बहन के निश्चल प्रेम की एक बेहद खूबसूरत कहानी है. पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार श्रीकृष्ण की लाडली छोटी बहन सुभद्रा के मन में पुरी नगर को करीब से देखने और घूमने की इच्छा जागी. अपनी इकलौती बहन की आंखों में यह चाहत देखकर, दोनों बड़े भाइयों जगन्नाथ और बलभद्र का दिल भर आया. उन्होंने तुरंत तीन विशाल रथ तैयार करने का आदेश दिया. दोनों भाइयों ने सुभद्रा को बीच में बैठाया और खुद उनके रक्षक बनकर नगर भ्रमण पर निकल पड़े. सदियों पहले शुरू हुआ भाई-बहन के स्नेह का यह सफर आज भी हर साल पुरी के मुख्य मार्ग पर जीवंत हो उठता है.
श्रीमंदिर से निकलने के बाद इन तीनों दिव्य भाई-बहनों का गंतव्य होता है- गुंडीचा मंदिर. लोक कथाओं में इस स्थान को भगवान की ‘मौसी का घर’ माना गया है. जिस तरह बच्चे अपनी मौसी के घर जाकर लाड-प्यार पाते हैं और सुकून से रहते हैं, वैसे ही भगवान जगन्नाथ यहां कुछ दिन विश्राम करते हैं. यहां उन्हें विशेष छप्पन भोग और पोड़ा पीठा अर्पित किया जाता है. नौ दिनों तक मौसी के घर मेहमाननवाजी का आनंद लेने के बाद, भगवान वापस अपने मुख्य मंदिर की ओर रुख करते हैं. इस वापसी की यात्रा को ‘बहुदा यात्रा’ कहा जाता है.

डिस्क्लेमर: यहां दी गई सभी जानकारियां सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हैं. India.Com इसकी पुष्टि नहीं करता. इसके लिए किसी एक्सपर्ट की सलाह अवश्य लें.
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रेनू यादव, India.Com हिंदी में असिस्टेंट न्यूज एडिटर के पद कार्यरत हैं. हिंदी पत्रकारिता में करीब 15 वर्षों के अनुभव के दौरान उन्हें टेक्नोलॉजी, धर्म, लाइफस्टाइल, हेल्थ व अन्य विषयों … और पढ़ें
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