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पाकिस्तान एक बार फिर अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए सीमा पार गोलाबारी और तथाकथित आतंकरोधी अभियान का ढोल पीट रहा है। कराची में रेंजर्स मुख्यालय पर हुए हमले के बाद इस्लामाबाद ने अफगानिस्तान सीमा पर जमीनी अभियान और हवाई हमलों का सहारा लेकर दुनिया को यह दिखाने की कोशिश की कि वह आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक जंग लड़ रहा है। लेकिन सच यह है कि पाकिस्तान की यह पूरी रणनीति अपनी घरेलू विफलताओं से ध्यान भटकाने की एक पुरानी और घिसी पिटी चाल बन चुकी है। अब हालात ऐसे मोड़ पर पहुंच चुके हैं जहां अफगानिस्तान भी हर हमले का जवाब देने के लिए खुलकर तैयार दिखाई दे रहा है।
हम आपको बता दें कि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने दावा किया है कि सीमा पर चलाए गए अभियान और तथाकथित सटीक हमलों में 29 लड़ाके मारे गए। इस्लामाबाद के सूचना मंत्री अता उल्लाह तरार ने कहा कि यह कार्रवाई जमात उल अहरार और तथाकथित ख्वारिज गुटों के ठिकानों पर की गई। पाकिस्तान ने यह भी दावा किया कि पकतिया, पक्तिका और कुनर में तीन ठिकानों को तबाह कर दिया गया। हथियारों और गोला बारूद के जखीरे नष्ट करने की बात भी कही गई। लेकिन सवाल यह है कि आखिर हर बार पाकिस्तान को अपनी ही धरती पर हुए हमलों का दोष अफगानिस्तान पर डालने की इतनी जल्दी क्यों रहती है।
कराची में रेंजर्स मुख्यालय पर हुए हमले में तीन पाकिस्तानी सैनिक मारे गए थे। जवाबी कार्रवाई में तीन हमलावर ढेर किए गए जबकि एक घायल पकड़ा गया। पाकिस्तान ने तुरंत दावा कर दिया कि पकड़ा गया हमलावर अफगान नागरिक है और पूरे हमले की साजिश अफगानिस्तान में रची गई। यही वह मोड़ है जहां पाकिस्तान की राजनीति और सुरक्षा नीति दोनों पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। हर आतंकी हमले के बाद सीमा पार दुश्मन का शोर मचाना पाकिस्तान की आदत बन चुकी है। अपने भीतर पनप रहे चरमपंथ, कट्टरपंथ और असफल सुरक्षा तंत्र पर बात करने की बजाय इस्लामाबाद हमेशा बाहरी दुश्मन गढ़ने में जुट जाता है।
पाकिस्तान की बौखलाहट का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कराची हमले के बाद उसने बिना किसी सबूत के भारत पर भी उंगली उठानी शुरू कर दी। पाकिस्तान के गृहमंत्री मोहसिन नकवी ने दावा किया कि इस हमले में किसी “भारतीय मोहरे” का हाथ है, लेकिन हमेशा की तरह इस आरोप के समर्थन में एक भी ठोस प्रमाण पेश नहीं किया गया। भारत ने इस बयान को सिरे से खारिज करते हुए पाकिस्तान को आईना दिखा दिया। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साफ कहा कि पाकिस्तान को दूसरों पर आरोप लगाने के बजाय अपनी धरती पर पल रहे आतंकी ढांचे के खिलाफ विश्वसनीय कार्रवाई करनी चाहिए। भारत ने दो टूक शब्दों में कहा कि पाकिस्तान वर्षों से आतंकवाद को राज्य नीति के औजार की तरह इस्तेमाल करता आया है और अब उसी नीति का दंश झेल रहा है।
दरअसल पाकिस्तान की पुरानी रणनीति यही रही है कि जब भी उसके भीतर सुरक्षा संकट गहराता है तो वह भारत या अफगानिस्तान का नाम उछालकर दुनिया का ध्यान भटकाने की कोशिश करता है। कराची हमले की जिम्मेदारी जमात उल अहरार ने खुद ली, फिर भी इस्लामाबाद ने बिना किसी जांच के भारत का नाम घसीटना शुरू कर दिया। इससे साफ हो गया कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ ईमानदार लड़ाई नहीं लड़ रहा, बल्कि वह हर संकट को राजनीतिक हथियार बनाकर घरेलू नाकामी छिपाने में जुटा है। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। अफगानिस्तान पाकिस्तान के हर हमले का जवाब दे रहा है और भारत भी पाकिस्तान की झूठी बयानबाजी को खुलकर बेनकाब कर रहा है।
असलियत यह है कि पाकिस्तान वर्षों तक जिन संगठनों को पालता रहा, वही अब उसके लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुके हैं। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान और उससे टूटकर बने गुट लगातार पाकिस्तानी सेना, पुलिस और सुरक्षा प्रतिष्ठानों को निशाना बना रहे हैं। खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान और सिंध में हमलों की बाढ़ आ चुकी है। पाकिस्तान अब उसी आग में जल रहा है जिसे उसने कभी अपने हितों के लिए हवा दी थी।
इसी घबराहट में पाकिस्तान ने तथाकथित गजब लिल हक अभियान को और तेज कर दिया है। फरवरी से शुरू इस सैन्य अभियान के नाम पर सीमा पार हमले किए जा रहे हैं। पाकिस्तान दावा करता है कि अफगान तालिबान सरकार उसकी जमीन पर सक्रिय गुटों को शरण दे रही है, लेकिन काबुल लगातार इन आरोपों को खारिज करता आया है। अफगानिस्तान साफ कह चुका है कि पाकिस्तान अपनी विफलताओं का बोझ दूसरों पर डालना बंद करे।
स्थिति अब बेहद विस्फोटक हो चुकी है। फरवरी के बाद से दोनों देशों के बीच लगातार जवाबी हमले हुए हैं और सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं। चीन समेत कई अंतरराष्ट्रीय ताकतों ने शांति वार्ता कराने की कोशिश की, लेकिन हर बार पाकिस्तान की आक्रामक सैन्य नीति ने माहौल बिगाड़ दिया। कुछ सप्ताह पहले भी पाकिस्तान ने अफगान सीमा के भीतर हवाई हमले किए थे। अब ताजा कार्रवाई ने दोनों देशों के रिश्तों को फिर बारूद के ढेर पर ला खड़ा किया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान सचमुच आतंकवाद खत्म करना चाहता है या फिर वह हर संकट को सीमा पार संघर्ष में बदलकर अपनी राजनीति चमकाना चाहता है। पाकिस्तान की सत्ता और सेना को यह समझना होगा कि लगातार बमबारी और सैन्य कार्रवाई से समस्या खत्म नहीं होगी। जिस देश की धरती पर दशकों तक कट्टरपंथी संगठनों को पनाह मिली हो, वहां केवल सीमा पार हमले करके शांति नहीं लाई जा सकती।
अफगानिस्तान भी अब पुराने दौर वाला कमजोर और चुप रहने वाला देश नहीं दिख रहा। हर पाकिस्तानी हमले के बाद काबुल की तरफ से जवाबी कार्रवाई हुई है। यदि इस्लामाबाद ने अपनी उकसावे वाली नीति नहीं बदली तो आने वाले दिनों में सीमा पर संघर्ष और भड़क सकता है। पाकिस्तान को यह समझना होगा कि बंदूक और हवाई हमलों से केवल खून बहेगा, स्थायी समाधान नहीं निकलेगा।
बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि पाकिस्तान इस समय दोहरी मार झेल रहा है। एक तरफ आतंकी हमलों से उसकी सुरक्षा व्यवस्था चरमरा रही है, दूसरी तरफ जनता आर्थिक संकट, महंगाई और राजनीतिक अराजकता से परेशान है। ऐसे में सीमा पार सैन्य कार्रवाई का शोर मचाकर सरकार देश के भीतर की नाकामी से ध्यान हटाना चाहती है। लेकिन यह खेल ज्यादा लंबा नहीं चलेगा। अफगानिस्तान अब हर वार का जवाब देने के मूड में है और पूरा क्षेत्र एक नए टकराव की तरफ बढ़ता दिखाई दे रहा है।
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