Palamu News: पलामू के बुजुर्गो को भी बढ़ती उम्र में साथ, संवाद और सहारे की जरूरत बढ़ी – Hindustan

Palamu News: मेदिनीनगर, संवाददाता। उम्र के जिस पड़ाव पर जीवन को सुकून और अपनापन चाहिए, उसी दौर में पलामू जिले में भी कई बुजुर्गों के हिस्से में लंबी खामोशी आ रही है। घर-गृहस्थी, नौकरी और सामाजिक दायित्वों में सक्रिय जीवन बिताने के बाद अब घर की चारदीवारी में समय काटना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। सोकर या टीवी देखकर दिन कितना गुजरेगा, यह सवाल अब उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। 93 वर्ष की उम्र पार कर चुके मेदिनीनगर के एक बुजुर्ग, जिनका परिवार स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा रहा है, कभी सुबह सब्जी खरीदने पैदल निकल जाया करते थे। अब उम्रजन्य परेशानियों ने कदम रोक दिए हैं। बाहर निकलना कम हुआ तो अकेलापन बढ़ गया। उनके लिए घर में बीतता हर दिन लंबा महसूस होता है। हफ्ते भर पहले डालटनगंज स्टेशन से बरवाडीह जाने के क्रम में दिन में एक बुजुर्ग की शारीरिक कमजोरी का फायदा उठाकर उचक्के ने मोबाइल फोन उनके पैकेट से निकाल लिया और बैग लेकर भागने का दुस्साहस किया जिससे वे डर गए।

माध्यमिक शिक्षक के पद से सेवानिवृत्त चंद्रबली चौबे कहते हैं कि 30-35 वर्षों तक एक तय दिनचर्या में रहने के बाद अचानक खाली समय के साथ तालमेल बैठाना आसान नहीं है। वह खुद को सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रखने का प्रयास करते हैं, ताकि समय बोझ न लगे। सेवानिवृत्त शिक्षक व सामाजिक कार्यकर्ता राजमुनी सिंह भी उम्र के साथ सुनने में कठिनाई और आवाजाही की समस्या महसूस कर रहे हैं। अब शहर में घूमने-फिरने के लिए उन्हें किसी सहयोगी की जरूरत पड़ती है। वह मानते हैं कि इस उम्र में खाली समय काटना ही सबसे बड़ी चुनौती है। व्यवसाय से ताल्लुक रखने वाले एक बुजुर्ग जिनकी युवा, प्रौढ़ा व प्रारंभिक वृद्धावस्था घर-गृहस्थी, सर्विस व सामाजिक दायित्व के निर्वहन में सक्रियता से बीता है के लिए अब घर में बैठकर समय बिताना मुश्किल हो गया है। वे कहते हैं कि आखिर सोकर, टीबी देखकर समय कितना देर काटा जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि मेदिनीनगर में संयुक्त परिवारों की संख्या अभी भी अच्छी है, लेकिन कामकाजी व्यस्तता के कारण बुजुर्गों को अपेक्षित समय और संवाद नहीं मिल पाता। सुबह की सैर से शुरू होने वाला दिन मोबाइल की स्क्रीन तक सिमट जाता है। डिजिटल दुनिया सामने है, मगर उसे समझना और उसका इस्तेमाल करना हर बुजुर्ग के लिए सहज नहीं। पेंशन के लिए महीनों इंतजार, बैंक तक पहुंचने की परेशानी, अस्पताल जाने में निर्भरता और रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड पर सहारे की जरूरत, ये छोटी दिखने वाली समस्याएं उनके लिए बड़ी बाधाएं हैं। शाम ढलते ही सन्नाटा उनके घर लौट आता है। जरूरत सिर्फ सुविधा की नहीं, बल्कि साथ, सम्मान और किसी के कुछ देर बैठकर बात कर लेने की भी है。

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