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आप केवल पानी को खड़े होकर और घूरते रहने से समुद्र पार नहीं कर सकते- रवींद्रनाथ टैगोर
यह साधारण सी दिखने वाली पंक्ति जीवन का एक बहुत बड़ा और गहरा दर्शन समेटे हुए है. भारत के महान कवि और साहित्यकार रबिंद्रनाथ टैगोर का कहना था कि सिर्फ सोचने, योजनाएं बनाने या इच्छा रखने मात्र से कामयाबी नहीं मिलती. अगर आपको किसी बड़े लक्ष्य (समुद्र) को हासिल करना है, तो आपको किनारे पर बैठकर सिर्फ उसे निहारना छोड़ना होगा और लहरों से लड़ने के लिए पानी में उतरना ही पड़ेगा.
1. कर्म की प्रधानता (Action over Thinking)
हम अक्सर अपने सपनों के बारे में सोचते रहते हैं. “मुझे यह करना है, मुझे वहां पहुंचना है”- यह सोचना अच्छी बात है, लेकिन यह केवल पहला कदम है. जब तक आप उस सोच को कर्म में नहीं बदलते, तब तक वह केवल एक कल्पना बनकर रह जाती है. समुद्र पार करने के लिए नाव चलानी पड़ती है या तैरना पड़ता है, सिर्फ किनारे पर खड़े रहकर लहरें गिनने से दूरी कम नहीं होती.
2. डर और झिझक को छोड़ना
कई बार लोग असफल होने के डर से कदम आगे नहीं बढ़ाते. वे सोचते हैं कि अगर मैं हार गया तो क्या होगा? टैगोर का यह कथन सिखाता है कि डरकर किनारे पर बैठे रहने से अच्छा है कि आप कोशिश करें. जब आप पहला कदम उठाते हैं, तभी आगे का रास्ता साफ होता है.
3. अनुशासन
बड़ी सफलताएं रातों-रात नहीं मिलतीं. समुद्र को पार करने के लिए निरंतर प्रयास और धैर्य की जरूरत होती है. जब आप सक्रिय रूप से काम करना शुरू करते हैं, तभी आप अपनी मंजिल के करीब पहुंचते हैं.
निष्कर्ष:
यह विचार हमें सोचने वाले (Thinker) से करने वाले (Doer) बनने की प्रेरणा देता है. बैठ कर वक्त ज़ाया करने से बेहतर है कि छोटे-छोटे कदम ही सही, लेकिन आगे बढ़ाए जाएं. अगर लक्ष्य बड़ा है, तो शुरुआत भी उतनी ही जल्दी होनी चाहिए.
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