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तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों की लोकसभा सदस्यता और अयोग्यता को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. सुप्रीम कोर्ट टीएमसी के बागी सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग वाली याचिका पर मंगलवार को सुनवाई करने के लिए सहमत हो गई है.
ये याचिका टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के जरिए दाखिल की गई है, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के इस मामले में अंतिम फैसला लेने में हो रही देरी को चुनौती दी गई है.
अभिषेक बनर्जी ने अपनी याचिका में लोकसभा अध्यक्ष पर अयोग्यता की शिकायतों पर समय रहते कोई कदम न उठाने का आरोप लगाया है. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच इस मामले की सुनवाई करेगी.
बता दें कि टीएमसी के 20 बागी सांसदों ने NCPI में अपने विलय का दावा किया है. टीएमसी का कहना है कि इन सांसदों के खिलाफ दल-बदल विरोधी कानून के तहत तत्काल और सख्त कार्रवाई होनी चाहिए.
‘जून 2026 से दी जा रही हैं शिकायतें, फिर भी कार्रवाई नहीं’
याचिका में आरोप लगाया गया है कि जून 2026 से लेकर अब तक टीएमसी नेतृत्व ने कई बार लोकसभा अध्यक्ष से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर लिखित शिकायतें दर्ज कराई हैं. इसके बावजूद स्पीकर की तरफ से कोई संतोषजनक कदम नहीं उठाया गया.
अभिषेक बनर्जी ने याचिका में ये भी मुद्दा उठाया कि लोकसभा अध्यक्ष ने बागी सांसदों के गुट को मान्यता तो नहीं दी है, लेकिन इसके बावजूद संसद में उनके बैठने की व्यवस्था बदल दी गई है.
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‘सदन के बाहर NCPI और भीतर TMC होने का दोहरा रुख’
टीएमसी का कहना है कि ये बागी सांसद सदन के बाहर खुद को NCPI का सदस्य बताते हैं, जबकि सदन के TMC के सदस्य बने हुए हैं. याचिका में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों (जैसे 2023 का सुभाष देसाई मामला) का हवाला दिया गया है. बनर्जी ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के मुताबिक लोकसभा या विधानसभा अध्यक्ष को दल-बदल से जुड़ी याचिकाओं पर 3 से 4 महीने में फैसला लेना होता है.
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