WHO ने जिसे बताया 'कैंसर', वो केमिकल भारत में क्यों बिक रहा? अन्नदाता किसानों पर खतरा – AajTak

Feedback
आधी सदी से आधुनिक खेती की जरूरत बताकर दुनिया भर के खेतों में जो केमिकल उड़ेला जा रहा है, वह दरअसल हमारी मिट्टी, मानव स्वास्थ्य और किसान की अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे निगलने वाला ‘साइलेंट किलर’ साबित हो रहा है. ग्लाइफोसेट (Glyphosate) बनाने वाली बहुराष्ट्रीय और देसी कंपनियां तो हर साल अरबों डॉलर का मुनाफा कूट रही हैं, लेकिन इसके बदले वे किसानों को सही जानकारी देने के बजाय सीधे मौत के मुंह में धकेल रही हैं.
सबसे बड़ा विरोधाभास तो यह है कि जिस घास को मारने के लिए किसान अपनी गाढ़ी कमाई इस केमिकल पर फूंक रहा है, वह घास आज भी सीना ताने खड़ी है. इस केम‍िकल के इस्तेमाल के बावजूद खेतों में घास साल दर साल बढ़ती जा रही है. तो फिर सवाल उठता है क‍ि यह कैसा हर्ब‍िसाइड है जो खरपतवारों को जड़ से खत्म नहीं कर पा रहा, बल्कि अन्नदाताओं की सेहत को खतरे में डाल रहा है. तो क्या यह सिर्फ नियामकों की सांठगांठ और इसे बनाने वाली कंपन‍ियों के लालच का एक अंतहीन दुष्चक्र है?
ग्लाइफोसेट आधुनिक कृषि के इतिहास में दुनिया का ऐसा विवादित खरपतवारनाशक है, जिसका सफर एक साधारण प्रयोगशाला से शुरू होकर खरबों डॉलर के मुकदमों और वैश्विक पर्यावरण बहस तक पहुंच गया है. ग्लाइफोसेट मित्र कीटों को मार रहा है और इंसानी नसों में कैंसर घोल रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) ने 2015 में ही इसे ‘संभावित कैंसरकारी’ घोषित कर दिया था. इसके बावजूद भारत के नियामक कंपनियों के दिए गए डेटा के आधार पर इसे ‘सुरक्षित’ का टैग बांटे घूम रहे हैं. यह नियामकों और एग्रोकेम‍िकल कंपन‍ियों की वो जुगलबंदी है जो करोड़ों नागरिकों की सेहत को दांव पर लगा रही है.
 
क्या यह सुरक्षित है?

ग्लाइफोसेट बनाने वाली कंपनियां और कुछ ढीले-ढाले सरकारी नियामक लगातार दावा करते हैं कि यह केमकिल सुरक्षित है, लेकिन अगर यह इतना ही सुरक्षित है, तो दुनिया की एक बड़ी आबादी ने इस पर ताला क्यों जड़ दिया है? वियतनाम, ऑस्ट्रिया, जर्मनी, फ्रांस, इटली, नीदरलैंड और खाड़ी देशों सहित दुनिया के 30 से अधिक देशों ने या तो ग्लाइफोसेट पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया हुआ है या इसके उपयोग पर बेहद कड़े कानूनी अंकुश लगाए हैं. 
केस और अरबों का हर्जाना

कंपनियों के ‘सुरक्षित’ होने के दावों की धज्जियां खुद दुनिया की अदालतें उड़ा रही हैं. इस केमिकल के कारण होने वाले ‘नॉन-हॉजकिन लिंफोमा’ (एक प्रकार का ब्लड कैंसर) के मरीजों ने इसके निर्माताओं को घुटनों पर ला दिया है. अमेरिकी अदालतों और वैश्विक स्तर पर अब तक एक लाख से अधिक कानूनी मुकदमे इस केमिकल के खिलाफ दर्ज हो चुके हैं.
इसकी मूल निर्माता कंपनी (मॉन्सेन्टो) को खरीदने वाली पैरेंट कंपनी बायर (Bayer) अब तक 11 अरब डॉलर (करीब 91,000 करोड़ रुपये) का हर्जाना पीड़ितों को भुगतने के लिए समझौतों में दे चुकी है. हाल ही में कंपनी ने भविष्य के दावों से निपटने के लिए 7.25 अरब डॉलर के एक और बंपर सेटलमेंट की रूपरेखा तैयार की है. यदि यह केम‍िकल हानिरहित है, तो कोई कंपनी अदालतों में पानी की तरह पैसा क्यों बहा रही है?
क‍िसानों को छलावा

यह एक बड़ा कृषि स्कैम सा लगता है. किसान हर साल हजारों रुपये का ग्लाइफोसेट खरीदकर छिड़कता है, लेकिन घास कुछ समय बाद और अधिक आक्रामक होकर लौट आती है. ऐसा लगता है क‍ि प्रकृति ने इस जहर के खिलाफ खुद को ढाल लिया है. लगातार ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल से अब खेतों में ‘सुपरवीड्स’ (ऐसी घास जिन पर कोई केमिकल असर नहीं करता) पैदा हो चुकी हैं. कंपनियों का बिजनेस मॉडल ड्रग्स बेचने जैसा है. पहले वे एक केमिकल बेचते हैं, घास उस रासायनिक खुराक की आदी हो जाती है, फिर कंपनियां कहती हैं कि अब इससे भी ज्यादा तेज और महंगा केमिकल खरीदो. नतीजा? घास कभी खत्म नहीं होती, लेकिन किसान की सेहत को नुकसान जरूर होने लगता है. बारिश के पानी के साथ बहकर यह केम‍िकल नदियों और भूजल में मिल जाता है, जो जलीय जीवों और इंसानों के पीने के पानी को जहरीला बनाता है.
मुनाफे की मलाई, जिम्मेदारी से विदाई

इस पूरी तबाही के दो सबसे बड़े गुनहगार हैं. मल्टीनेशनल एग्रोकेमिकल कंपनियां और आंखें मूंदे बैठे सरकारी नियामक संस्थान. ये कंपनियां अपनी बोतलों पर चमकीले विज्ञापन छापती हैं, लेकिन कम पढ़े-लिखे किसानों को यह कभी नहीं सिखातीं कि इसका छिड़काव करते समय सुरक्षा किट (PPE) पहनना कितना जरूरी है. वे सिर्फ अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए गांवों में डीलर नेटवर्क फैलाती हैं. किसानों को जहर के सही इस्तेमाल की ट्रेनिंग देने के नाम पर इनका बजट शून्य हो जाता है. जब सरकार कहती है कि ट्रेंड स्प्रेयर लाओ, तो ये अपनी कमाई बचाने के लिए अदालतों में वकीलों की फौज खड़ी कर देती हैं. बहरहाल, जब तक यह जहर पूरी तरह बैन नहीं होता, तब तक किसानों को इन कंपनियों के इस जाल को खुद समझना होगा. क्योंक‍ि इसके पहले श‍िकार क‍िसान हो रहे हैं और फ‍िर कंज्यूमर का नंबर आ रहा है. 
ग्लाइफोसेट की खोज

ग्लाइफोसेट को सबसे पहले 1950 में स्विट्जरलैंड की एक दवा कंपनी ‘सिलाग’ के रसायनज्ञ हेनरी मार्टिन ने खोजा था. उस समय वे एक नई दवा की तलाश कर रहे थे. औषधीय रूप से इसका कोई फायदा न दिखने के कारण इस केमिकल को एक तरफ रख दिया गया और लोग इसके बारे में भूल गए. लेक‍िन, साल 1970 में अमेरिकी कृषि रसायन कंपनी मॉन्सेन्टो (Monsanto) के वैज्ञानिक जॉन ई. फ्रांज ने स्वतंत्र रूप से फिर से इस कंपाउंड पर काम किया. उन्होंने पाया कि यह केमिकल पौधों को सुखाने और खरपतवार नष्ट करने में बेहद असरदार है. मॉन्सेन्टो ने इसका पेटेंट कराया और 1974 में इसे ‘राउंडअप’ ब्रांड नाम से बाजार में उतारा, जो देखते ही देखते पूरे कृष‍ि बाजार में छा गया.
‘राउंडअप रेडी’ फसलें

नब्बे के दशक में मॉन्सेन्टो ने कृषि जगत को पूरी तरह बदल दिया. उन्होंने ऐसी आनुवंशिक रूप से संशोधित (Genetically Modified) फसलें बनाईं, जिन पर ग्लाइफोसेट का कोई असर नहीं होता था. इन्हें ‘राउंडअप रेडी’ बीज कहा गया. किसान अपने खेतों में सोयाबीन, मक्का या कपास उगाते और पूरे खेत पर राउंडअप का छिड़काव कर देते. इससे मुख्य फसल को नुकसान पहुंचे बिना सारा अनचाहा घास-फूस एक बार में साफ हो जाता था.
विवादों की शुरुआत और कैंसर का साया

इस तकनीक ने किसानों की मेहनत और लागत को बहुत कम कर दिया, जिससे इसकी मांग आसमान छूने लगी. यह दुनिया के इतिहास में सबसे भारी मात्रा में इस्तेमाल होने वाला कृषि केम‍िकल बन गया. लेक‍िन, साल 2015 में इस रासायनिक कहानी में एक बड़ा मोड़ आया. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की कैंसर अनुसंधान एजेंसी IARC ने अपनी एक रिपोर्ट में ग्लाइफोसेट को “संभावित रूप से मनुष्यों के लिए कैंसरकारी” (Probably Carcinogenic to Humans) घोषित कर दिया. इसके बाद अमेरिका सहित दुनिया भर में मॉन्सेन्टो पर हजारों मुकदमे दर्ज किए गए.
बायर का प्रवेश और मौजूदा स्थिति

साल 2018 में जर्मन फार्मास्युटिकल दिग्गज बायर (Bayer) ने मॉन्सेन्टो कंपनी को खरीद लिया. इसके साथ ही मुकदमों का सारा बोझ भी बायर पर आ गया, जिससे निपटने के लिए कंपनी को अरबों डॉलर का हर्जाना देना पड़ा है. हालांकि, इस केमिकल को लेकर आज भी विज्ञान और नियामक संस्थाएं दो गुटों में बंटी हुई हैं.
अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) और यूरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण (EFSA) जैसी कई बड़ी संस्थाओं का कहना है कि अगर लेबल पर दिए निर्देशों के अनुसार सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो ग्लाइफोसेट से कैंसर का कोई खतरा नहीं है. इसके विपरीत पर्यावरण को नुकसान (जैसे मिट्टी और पानी में इसका लंबे समय तक बने रहना) और स्वास्थ्य जोखिमों को देखते हुए दुनिया के कई देशों और शहरों ने इसके उपयोग पर कड़े प्रतिबंध या पूरी तरह रोक लगा दी है.  
भारत में ग्लाइफोसेट का स्टेटस  

भारत में कानूनन ग्लाइफोसेट को केवल चाय के बागानों और गैर-फसली क्षेत्रों में खरपतवार हटाने के लिए मंजूरी मिली हुई है.लेकिन धीरे-धीरे खेतों में अवैध एचटी-बीटी (हर्बीसाइड टॉलरेंट) कपास की खेती बढ़ने लगी और मजदूरों की कमी होने के कारण आम किसानों ने खाद्यान्न फसलों में भी इसका अंधाधुंध छिड़काव शुरू कर दिया. धान की रोपाई से पहले क‍िसान खेतों में घास को खत्म करने के ल‍िए इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं. सब्ज‍ियों की खेती में भी घास खत्म करने के ल‍िए जुगाड़ से इसका इस्तेमाल हो रहा है.
चूंकि ज्यादातर भारतीय किसान बिना किसी सुरक्षात्मक गियर (मास्क, चश्मा, ग्लव्स या विशेष सूट) के पीठ पर टंकी लादकर इसका छिड़काव करते हैं, इसलिए यह केम‍िकल सीधे उनकी त्वचा और सांस के संपर्क में आने लगता है. केरल, पंजाब, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने अपने स्तर पर इस पर चिंता जताई थी. विश्व स्तर पर भी इसे कैंसर और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से जोड़ा गया. इसी को देखते हुए केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने जुलाई 2020 में एक ड्राफ्ट तैयार किया.
दो साल के विचार-विमर्श के बाद, सरकार ने 21 अक्टूबर 2022 को अंतिम गजट नोट‍िफ‍िकेशन जारी क‍िया, जिसे ‘द रेस्ट्रिक्शन ऑन यूज़ ऑफ ग्लाइफोसेट ऑर्डर, 2022’ नाम दिया गया. सरकार ने इस पर पूरी तरह बैन नहीं लगाया क्योंकि चाय बागानों में इसकी भारी जरूरत थी. सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने बीच का रास्ता निकाला और नियम बनाया कि:कोई भी आम किसान सीधे इस केमिकल को खरीदकर स्प्रे नहीं कर सकेगा.
सरकार ने कहा क‍ि इसका छिड़काव केवल पेस्ट कंट्रोल ऑपरेटरों (PCOs) द्वारा ही किया जाएगा, जिनके पास खतरनाक रसायनों को सुरक्षित तरीके से संभालने का लाइसेंस और ट्रेनिंग होती है. कंपनियों को निर्देश दिए गए कि वे अपने पुराने रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट वापस करें ताकि उन पर यह नई शर्त जोड़ी जा सके.
यह आदेश आते ही एग्रोकेमिकल कंपनियों में हड़कंप मच गया क्योंकि पीसीओ नियम लागू होने से उनकी बिक्री सीधे तौर पर घटने वाली थी. कमाई का पैसा खर्च होने वाला था. ऐसे में इस उद्योग से जुड़े बड़े संगठनों ने तुरंत दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. कंपनियों ने अदालत में केंद्र सरकार के इस आदेश के ख‍िलाफ तर्क द‍िए, ताक‍ि वे अपने मुनाफे को बचा सकें.
पहला तर्क यह था क‍ि भारत के ग्रामीण इलाकों में खेतों में छिड़काव करने वाले पेस्ट कंट्रोल ऑपरेटरों का ढांचा ही मौजूद नहीं है. दूसरा तर्क यह था क‍ि यदि किसान खुद छिड़काव नहीं करेगा और उसे पीसीओ का इंतजार करना पड़ेगा, तो खरपतवार बढ़ जाएंगे, जिससे फसलें बर्बाद होंगी और खेती की लागत बढ़ जाएगी.
इन दलीलों को सुनते हुए नवंबर 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट ने सरकार के इस आदेश पर तीन महीने की अंतरिम रोक लगा दी और सरकार को निर्देश दिया कि वह कंपनियों व अन्य हितधारकों के साथ मिलकर इस फैसले की समीक्षा करे. इस कानूनी विवाद के बीच कृष‍ि मंत्रालय का रुख ढीला पड़ गया.
जुलाई 2023 में जब यह मामला दोबारा अदालत में आया, तो सरकारी वकीलों ने अदालत को लिखित आश्वासन दिया कि जब तक इस मामले का अंतिम निपटारा नहीं हो जाता, सरकार पीसीओ वाले आदेश को जबरन लागू नहीं करेगी. फरवरी 2024 की सुनवाइयों में भी इस आश्वासन को बरकरार रखा गया. इसके परिणामस्वरूप, कृष‍ि मंत्रालय का पीसीओ वाला नोट‍िफ‍िकेशन ठंडे बस्ते में चला गया.
मुनाफा कंपन‍ियों का, ज‍िम्मेदारी क‍िसकी

कंपनियों ने यह कहकर आदेश पर स्टे ले लिया कि देश में पीसीओ उपलब्ध नहीं हैं. लेकिन एक जिम्मेदार उद्योग के नाते उन्होंने कभी ग्रामीण युवाओं को ट्रेनिंग देकर पीसीओ नेटवर्क बनाने या किसानों को मुफ्त पीपीई (सुरक्षा) किट उपलब्ध कराने की कोशिश नहीं की ताकि वे सुरक्षित रह सकें. नतीजा यह है क‍ि आज भी भारत के लाखों छोटे और सीमांत किसान बिना किसी जागरूकता और सुरक्षा उपकरणों के इस जहरीले खरपतवारनाशक का खेतों में छिड़काव कर रहे हैं, जो उनके शरीर में धीरे-धीरे जहर घोल रहा है. सरकार की एक अच्छी नीति केम‍िकल कंपन‍ियों की लॉबिंग और कानूनी दांवपेंचों के कारण ज़मीन पर उतरने से पहले ही दम तोड़ गई.
सुप्रीम कोर्ट क्यों नहीं गया मंत्रालय?

जब टैक्स वसूली या राजनीतिक फैसलों को बचाने की बात आती है, तो केंद्र सरकार हाई कोर्ट के फैसलों के खिलाफ चौबीस घंटे के भीतर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की फुर्ती दिखाती है, लेकिन जब बात देश के करोड़ों किसानों और आम जनता की सेहत से जुड़े इस जानलेवा केमिकल की आई, तो सरकार ने ‘प्रशासनिक ढुलमुलपन’ और ‘समीक्षा’ का सुस्त रास्ता चुन लिया. एक तरफ विश्व स्वास्थ्य संगठन ग्लाइफोसेट को कैंसरकारी बता रहा है, वहीं हमारा कृषि मंत्रालय दिल्ली हाई कोर्ट के स्टे के पीछे छिपकर कीटनाशक बनाने वाली कंपनियों की लॉबी को खुली छूट दिए बैठा है. आम लोगों की जिंदगी से जुड़ी इस संवेदनहीनता ने साफ कर दिया है कि कृष‍ि मंत्रालय के लिए अपनी नीतियां और केमिकल कंपनियों के हित, देश के अन्नदाता और नागरिकों के जीवन से कहीं ज्यादा कीमती हैं.
Copyright © 2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today
होम
वीडियो
लाइव टीवी
न्यूज़ रील
मेन्यू
मेन्यू

source.freeslots dinogame telegram营销

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Toofani-News