डी-डॉलरलाइजेशन (De-dollarisation) यानी अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की बहस एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में है. इसकी सबसे बड़ी वजह BRICS देशों द्वारा स्थानीय मुद्राओं (Local Currencies) में व्यापार को बढ़ावा देने की कोशिशें हैं.
2024 और 2025 के BRICS शिखर सम्मेलनों में सदस्य देशों ने स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन बढ़ाने, वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के अपने संकल्प को दोहराया.
इसे अक्सर पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था और उभरती बहुध्रुवीय (Multipolar) वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के बीच भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के रूप में देखा जाता है. लेकिन इस बहस के पीछे एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न भी है कि क्या अंरराष्ट्रीय कानून यह तय करता है कि देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार में किस मुद्रा का उपयोग करेंगे?
क्या अंतरराष्ट्रीय कानून देशों के लिए अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल अनिवार्य बनाता है?
साफ शब्दों में इसका उत्तर ढूंढें तो जवाब है- नहीं. अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था (International Monetary System) को नियंत्रित करने वाला कानूनी ढांचा मुख्य रूप से यह तय करता है कि देश अपनी मुद्रा और विनिमय दर (Exchange Rate) से जुड़ी नीतियां कैसे संचालित करेंगे. यह कहीं भी यह अनिवार्य नहीं करता कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार केवल अमेरिकी डॉलर में ही किया जाए.
भारत के लिए यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह एक ओर BRICS के माध्यम से वैश्विक वित्तीय सुधारों का समर्थक है, वहीं दूसरी ओर मौजूदा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में भी एक जिम्मेदार भागीदार बना हुआ है.
IMF का कानूनी ढांचा क्या कहता है?
अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक सहयोग का मौजूदा ढांचा 1944 के ब्रेटन वुड्स सम्मेलन (Bretton Woods Conference) के बाद अस्तित्व में आया. इसी के आधार पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के Articles of Agreement तैयार किए गए, जो आज भी वैश्विक मौद्रिक व्यवस्था का प्रमुख कानूनी आधार हैं. हालांकि, IMF का यह समझौता अमेरिकी डॉलर को दुनिया की स्थायी रिजर्व या सेटलमेंट करेंसी के रूप में कोई कानूनी दर्जा नहीं देता.

IMF का उद्देश्य है
-अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक सहयोग को बढ़ावा देना.
-अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली को सुचारु बनाना.
-विनिमय दरों में स्थिरता बनाए रखना.
-ऐसी मौद्रिक नीतियों को रोकना जो वैश्विक आर्थिक अस्थिरता पैदा करें.
फिर डॉलर इतना मजबूत क्यों है?
अमेरिकी डॉलर का वैश्विक दबदबा किसी अंतरराष्ट्रीय कानून की वजह से नहीं, बल्कि कई आर्थिक कारणों से बना है. इनमें प्रमुख हैं, अमेरिका की मजबूत अर्थव्यवस्था, गहरे और अत्यधिक तरल (Liquid) वित्तीय बाजार, अमेरिकी संस्थानों पर वैश्विक भरोसा, डॉलर आधारित परिसंपत्तियों (Dollar-denominated Assets) में निवेशकों का विश्वास आदि. यानी डॉलर की ताकत कानूनी नहीं बल्कि आर्थिक और संस्थागत है.
IMF वास्तव में किस चीज़ को नियंत्रित करता है?
IMF के आर्टिकल ऑफ एग्रिमेंट का आर्टिकल IV सदस्य देशों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहता है कि वे विनिमय दर प्रणाली की स्थिरता बनाए रखें, IMF और अन्य सदस्य देशों के साथ सहयोग करें, अपनी मुद्रा में कृत्रिम हेरफेर (Currency Manipulation) न करें और अनुचित प्रतिस्पर्धात्मक लाभ हासिल करने के लिए विनिमय दर का दुरुपयोग न करें. ये सभी सदस्य देशों की कानूनी जिम्मेदारियां हैं.
हालांकि, IMF किसी देश को यह आदेश नहीं देता कि वह अंतरराष्ट्रीय व्यापार में केवल डॉलर का ही इस्तेमाल करे.
Article IV Consultation क्या होती है?
IMF समय-समय पर सदस्य देशों के साथ Article IV Consultation करता है. इसके तहत IMF देश की व्यापक आर्थिक (Macroeconomic) स्थिति की समीक्षा करता है, वित्तीय और विनिमय दर नीतियों का मूल्यांकन करता है, सुधार संबंधी सुझाव देता है लेकिन ये सुझाव कानूनी रूप से बाध्यकारी (Legally Binding) नहीं होते.
यानी IMF किसी देश को यह नहीं कह सकता कि वह केवल अमेरिकी डॉलर में व्यापार करे या किसी विशेष मुद्रा को अपनाए.
क्या देश दूसरी मुद्राओं में व्यापार कर सकते हैं?
हाँ, अंतरराष्ट्रीय कानून देशों को यह स्वतंत्रता देता है कि वे आपसी सहमति से किसी भी मुद्रा में व्यापार करें. इसी वजह से आज कई देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ा रहे हैं. द्विपक्षीय मुद्रा समझौते (Currency Swap Arrangements) कर रहे हैं. वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां विकसित कर रहे हैं. BRICS की पहल भी इसी कानूनी दायरे के भीतर आती है.

बहुध्रुवीय वित्तीय व्यवस्था में भारत की भूमिका
भारत फिलहाल डॉलर को पूरी तरह छोड़ने के पक्ष में नहीं है, बल्कि वह वित्तीय विकल्पों (Financial Diversification) का समर्थन करता है. भारत की रणनीति की बात करें तो भारतीय रुपये (INR) में अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देना, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार समझौतों का विस्तार करना, डिजिटल भुगतान और सीमा-पार भुगतान प्रणाली को मजबूत करना, BRICS और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर वैश्विक वित्तीय सुधारों का समर्थन करना और IMF और विश्व बैंक जैसे संस्थानों में सुधार की मांग करना, जैसे मुद्दे शामिल हैं.
संकल्प ठाकुर पिछले 10 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत न्यूज़ 24 से की, इसके बाद न्यूज़ नेशन में कार्य किया. वर्तमान में वह एबीपी हिंदी डिजिटल में डिप्टी प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं और पिछले सात वर्षों से संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं. उन्हें खेल, अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और चुनावी राजनीति से जुड़ी खबरों की गहरी समझ है. इसके अलावा साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता का क्षेत्र है. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है.
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