अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ी चावल सप्लाई की टेंशन, भारत के पास 2 से 2.5 करोड़ टन निर्यात की क्षमता! फिर बढ़ेगी महंगाई? – india rice export global market outlook el nio prices 2027 – Jagran

भारत इंटरनेशनल राइस कॉन्फ्रेंस में 2027 तक वैश्विक चावल बाजार की दिशा तय करने वाले कारकों पर चर्चा हुई, जिसमें अल नीनो और माल ढुलाई लागत प्रमुख हैं।
BIRC 2026 में चावल के वैश्विक सप्लाई पर हुई चर्चा
2027 तक वैश्विक चावल बाजार में अल नीनो का असर।
भारत की 2.5 करोड़ टन चावल निर्यात क्षमता मजबूत।
दक्षिण एशिया, अफ्रीका में चावल की मांग बढ़ेगी।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। भारत इंटरनेशनल राइस कॉन्फ्रेंस (BIRC) 2026, 23 अक्टूबर से नई दिल्ली में शुरू हो गया है। इस इंवेंट में 150 से अधिक देशों के बायर्स-सप्लार्स पहुंचे। सेशन में चावल की ग्लोबल डिमांड और सप्लाई से जुड़ी खास बातों पर चर्चा हुई, जिससे पता चलता है कि दुनिया में चावल की मांग, मौसम में बदलाव और माल ढुलाई की लागत 2027 में वैश्विक चावल बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक होंगे। भारत के 5 प्रतिशत टूटे चावल की कीमत में प्रति मीट्रिक टन करीब 60 डॉलर की बढ़ोतरी हो सकती है। वहीं, घरेलू आपूर्ति और बफर स्टॉक के आधार पर भारत सालाना 2 से 2.5 करोड़ मीट्रिक टन चावल का निर्यात कर सकता है। ।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, 2027 में ग्लोबल राइस मार्केट के लिए अल नीनो एक महत्वपूर्ण जोखिम हो सकता है। 2027 की शुरुआत तक मौसम की स्थिति पर नजर रखना जरूरी होगा, क्योंकि अल नीनो एशिया में चावल की लगातार होने वाली फसलों के प्रोडक्शन को प्रभावित कर सकता है।
इंडोनेशिया और वियतनाम को मौसम से जुड़े उत्पादन के प्रति अधिक सेंस्टिव बताया गया। भारत और फिलीपींस में भी खासकर रबी और दूसरी फसल के उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका जताई गई। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में चावल की उपलब्धता, निर्यात के लिए बचने वाली मात्रा और कीमतों में उतार-चढ़ाव प्रभावित हो सकते हैं।
इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) के उपाध्यक्ष देव गर्ग ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय माल ढुलाई की लागत भारतीय चावल की कीमत और वैश्विक बाजार में उसकी कॉम्पटीशन को प्रभावित करती है। उनके मुताबिक, भारत के 5 प्रतिशत टूटे चावल की कीमत में करीब 60 डॉलर प्रति मीट्रिक टन की बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि लंबे समय तक इस बढ़ोतरी का बने रहना जरूरी नहीं है। इसके अलावा उन्होंने मिडिल ईस्ट वॉर से भी कॉस्ट बढ़ने की बात कही।
सम्मेलन में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, 2026-27 में चावल की मांग में होने वाली पूरी बढ़ोतरी दक्षिण एशिया और अफ्रीका से आने का अनुमान है। इन क्षेत्रों की मांग वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण होती जा रही है। बातचीत में वियतनाम के दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चावल आयातक बनने और फिलीपींस के प्रमुख आयातक बाजार बने रहने का जिक्र किया गया। अल नीनो के कारण उत्पादन प्रभावित होने की स्थिति में इंडोनेशिया की आयात जरूरत भी बढ़ सकती है।
अफ्रीकी बाजारों में नाइजीरिया और मेडागास्कर जैसे देशों में अवसरों पर चर्चा हुई। पश्चिम अफ्रीका के नाइजीरिया, बेनिन और बुर्किना फासो में बदलती आयात नीतियों को भी महत्वपूर्ण बताया गया। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, भारतीय एक्सपोर्टर्स को इन बाजारों में कारोबार बढ़ाने से पहले स्थानीय नियमों, आयात नीतियों और खरीदारों की जरूरतों को समझना होगा।
डॉ. प्रेम गर्ग ने जानकारी देते हुए बताया कि भारत में चावल की मजबूत घरेलू सप्लाई और बफर स्टॉक देश को ग्लोबल मार्केट में अपनी स्थिति बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। उन्होंने भारत की सालाना चावल निर्यात क्षमता 2 से 2.5 करोड़ मीट्रिक टन बताई। चर्चा में वियतनाम से मिल रहे कॉम्पटीशन को भारतीय निर्यातकों के लिए एक अहम पहलू बताया गया। साथ ही, गैर-बासमती चावल के निर्यात को मजबूत करने पर भी चर्चा हुई।
भारत के पास गोविंदभोग और सोना मसूरी जैसी अलग-अलग क्षेत्रीय किस्में हैं, जिनके जरिए विभिन्न देशों और उपभोक्ताओं की पसंद के अनुसार बाजार तैयार किए जा सकते हैं।
एक्सपर्ट्स ने चावल के कारोबार में वैल्यू एडिशन के महत्व पर जोर दिया। विशेषज्ञों के मुताबिक, वैश्विक बाजार में भारत की स्थिति मजबूत करने के लिए सिर्फ कम कीमत पर चावल उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होगा। निर्यातकों को प्रतिस्पर्धी कीमतों के साथ बाजार के हिसाब से रणनीति बनानी होगी, आयात संबंधी नियमों को समझना होगा और उत्पादों में मूल्यवर्धन के अवसर तलाशने होंगे।

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