देश की आजादी का इतिहास केवल पुरुष क्रांतिकारियों के संघर्ष और बलिदान की कहानी नहीं है, बल्कि इसमें महिलाओं की वीरता, साहस और कुर्बानी के भी अनगिनत अध्याय दर्ज हैं। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में शामली की वीरांगनाओं ने भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा संभाला था। वर्ष 1857 में जब मेरठ से उठी विद्रोह की चिंगारी शामली तक पहुंची तो यहां की महिलाओं ने भी अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष का बिगुल बजा दिया। बताया जाता है कि शामली जनपद की 27 वीरांगनाओं ने अंग्रेजों से लोहा लेते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी। इन वीरांगनाओं की शहादत आज भी शहर के एसटी तिराहे स्थित एकता पार्क में लगे शिलापट पर दर्ज है। शिलापट पर अंकित वीरांगनाओं के नाम इस बात की गवाही देते हैं कि आजादी की पहली लड़ाई में शामली की महिलाओं ने भी अदम्य साहस का परिचय दिया था। आजादी के अमृत काल में इन वीरांगनाओं के बलिदान को याद करना इसलिए भी जरूरी है, ताकि नई पीढ़ी स्वतंत्रता के पीछे छिपे संघर्ष, त्याग और शहादत को समझ सके और अपने जिले की गौरवशाली विरासत से परिचित हो सके। 10 मई 1857 को मेरठ से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ शुरू हुआ विद्रोह देखते ही देखते आसपास के क्षेत्रों में फैल गया। शामली जिले में उस दौर में पुरुषों के साथ महिलाओं ने भी अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में सक्रिय भागीदारी की। बताया जाता है कि महिलाओं ने गांव-गांव जाकर अपनी टोलियां गठित कीं और ग्रामीण महिलाओं को भी आजादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। कैराना क्षेत्र की आशा देवी, शामली की इंद्रकौर जाट और थानाभवन क्षेत्र की हबीबा खातून जैसी वीरांगनाओं ने महिलाओं का नेतृत्व किया। इन महिलाओं ने केवल हथियार ही नहीं उठाए, बल्कि लोकगीतों और देशभक्ति के गीतों के माध्यम से गांव-गांव में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष की भावना भी जगाई। उनके गीतों में आजादी का जज्बा और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की हुंकार सुनाई देती थी.
शामली। वर्ष 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान शामली तहसील पर क्रांतिकारियों के हमले में भी महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। मामकौर, राजकौर देवी, रणवीरी, जमीना पठान सहित अनेक वीरांगनाएं इस संघर्ष में शामिल हुईं। अंग्रेजी सेना के साथ इनका भीषण संघर्ष हुआ। बताया जाता है कि करीब दो दिनों तक चले संघर्ष के बाद अंग्रेजों ने कई महिला क्रांतिकारियों को पकड़ लिया।अंग्रेजी हुकूमत इन वीरांगनाओं के साहस और विद्रोही तेवर से इस कदर भयभीत थी कि गिरफ्तारी के बाद उन्हें कठोर सजा दी गई। कई वीरांगनाओं को फांसी पर लटका दिया गया। इस तरह इन महिलाओं ने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए.
शामली। शामली की महिलाओं के संघर्ष की कहानी केवल 1857 तक सीमित नहीं है। देश के राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी जिले की महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शहर के एसटी तिराहा पार्क में स्वतंत्रता सेनानी ज्ञानदेवी धीमान की प्रतिमा भी स्थापित है। ज्ञानदेवी धीमान को जिले की निडर और उत्साही महिला स्वतंत्रता सेनानियों में गिना जाता है। उन्होंने महात्मा गांधी के आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया। वर्ष 1930 के नमक सत्याग्रह आंदोलन में भाग लेने पर उन्हें पांच माह के कठोर कारावास की सजा भुगतनी पड़ी। इसके बाद वर्ष 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन के दौरान उन्हें 30 रुपये के जुर्माने के साथ तीन माह की कैद की सजा सुनाई गई। वर्ष 1942 में शुरू हुए भारत छोड़ो आंदोलन में भी ज्ञानदेवी धीमान ने सक्रिय भूमिका निभाई। अंग्रेजी शासन ने उन्हें गिरफ्तार कर 21 माह की जेल की सजा दी। लगातार जेल और अंग्रेजी शासन के दमन के बावजूद उनका हौसला नहीं टूटा.
11एसएमएल42-शामली के एकता पार्क में लगी ज्ञानदेवी धीमान की प्रतिमा।
11एसएमएल43-शामली के एकता पार्क में वीरांगनाओं के नाम का लगा शिलापट।
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