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फरवरी 2026 के अंत में अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ ऑपरेशन एपिक फ्यूरी शुरू किया. इसका मकसद ईरान की मिसाइल, ड्रोन और सैन्य क्षमता को कमजोर करना था. जवाब में ईरान ने मध्य पूर्व में फैले अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बड़े पैमाने पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए. रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान ने 2000 से अधिक मिसाइल और ड्रोन दागे.
इनमें बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल और एकतरफा हमलावर ड्रोन शामिल थे. अमेरिका और सहयोगियों ने ज्यादातर को रोक लिया, लेकिन कई हमले लक्ष्य तक पहुंच गए. इससे क्षेत्र में तनाव चरम पर पहुंच गया और अमेरिकी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा.
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ईरानी हमलों से अमेरिका को करीब 13 अरब डॉलर (123,818 करोड़ रुपए) का नुकसान होने का अनुमान लगाया गया है. इसमें इमारतों, रडार सिस्टम, ईंधन डिपो, हैंगर और अन्य बुनियादी ढांचे की मरम्मत का खर्च शामिल है. कुल सैन्य अभियान की लागत पेंटागन के अनुसार 29 अरब डॉलर तक पहुंच गई, जिसमें उपकरण मरम्मत भी शामिल है.
सैटेलाइट इमेज और कांग्रेसनल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि नुकसान आधिकारिक बयानों से कहीं ज्यादा था. हैंगर, बैरक, संचार केंद्र और एयर डिफेंस सिस्टम बुरी तरह प्रभावित हुए. कई ठिकानों को खाली करना पड़ा या संचालन सीमित करना पड़ा.
प्रभावित सुविधाएं और विमानों का नुकसान
ईरान ने आठ देशों में 20 अमेरिकी या अमेरिका से जुड़े सैन्य सुविधाओं को निशाना बनाया. इनमें सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत, जॉर्डन, बहरीन, इराक और अन्य जगहों के एयर बेस शामिल हैं. प्रिंस सुल्तान एयर बेस (सऊदी अरब), अल उद्देद (कतर), अली अल सलेम (कुवैत) और अल धफरा (यूएई) जैसे प्रमुख ठिकानों को बार-बार निशाना बनाया गया.
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रिसर्च सर्विस की रिपोर्ट के अनुसार कम से कम 42 अमेरिकी विमान क्षतिग्रस्त या नष्ट हुए. इनमें F-15E, F-35A, KC-135 टैंकर, E-3 सेंट्र्री एवाक्स, MQ-9 रीपर ड्रोन और अन्य शामिल हैं. कई विमान जमीन पर पार्क किए हुए थे जब उन पर हमला हुआ.
ये हमले दिखाते हैं कि आधुनिक युद्ध में सस्ते ड्रोन और मिसाइल महंगे रक्षा सिस्टम को चुनौती दे सकते हैं. अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम जैसे पैट्रियट और थैड ने कई हमलों को रोका, लेकिन कुछ घुस गए. इससे क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों की सुरक्षा पर सवाल उठे. सैनिकों की मौत और घायलों की संख्या भी बढ़ी.
कई ठिकानों पर नुकसान इतना था कि संचालन प्रभावित हुआ. विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान ने अमेरिकी ठिकानों की कमजोरियों का अध्ययन कर सटीक निशाना साधा. इससे अमेरिका को मिसाइल डिफेंस और बेस सुरक्षा को और मजबूत करने की जरूरत महसूस हुई.
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इस संघर्ष से दोनों पक्षों को भारी कीमत चुकानी पड़ी. अमेरिका ने ईरान की कई सैन्य क्षमताएं नष्ट कीं, लेकिन खुद को भी बड़ा नुकसान हुआ. मरम्मत और नए उपकरणों की लागत लंबे समय तक बजट पर असर डालेगी. क्षेत्र में स्थिरता अब भी नाजुक है. यह घटना याद दिलाती है कि बड़े पैमाने के संघर्ष में नुकसान सिर्फ एक तरफ नहीं होता. भविष्य में ऐसी स्थितियों से बचने के लिए कूटनीति और मजबूत रक्षा दोनों जरूरी हैं.
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