क्या आत्मनिर्भरता के मामले में भारतीय वायुसेना पिछड़ती जा रही है आखिर एक स्वदेशी फाइटर जेट को लेकर वायुसेना प्रमुख क्यों इतने परेशान हैं कि सार्वजनिक मंचों पर भी उन्हें बोलना पड़ रहा है. इसी हफ्ते भारतीय नौसेना के एक नए युद्धपोत आईएनएस मावलन की कमीशनिंग सेरेमेनी में मुख्य अतिथि के तौर पर एयर चीफ मार्शल एपी सिंह कर्नाटक के कारवार में मौजूद थे.
आईएनएस मावलन एक एंटी-सबमरीन स्वदेशी युद्धपोत है, जिसे कोचीन शिपयार्ड ने बनाया है. खास बात है कि इस वक्त नौसेना के करीब 40 जंगी जहाजों और पनडुब्बियों का निर्माण चल रहा है, जो अगले एक दशक तक जंगी बेड़ा का हिस्सा बन जाएंगे. ये सभी 40 युद्धपोत और पनडुब्बियां देश में ही बनाए जा रहे हैं. यानी देश के अलग-अलग शिपयार्ड में बनाए जा रहे हैं. ऐसे में नौसैनिकों को संबोधित करते हुए वायुसेना प्रमुख का दर्द साफ झलकने लगा है.
एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने कहा कि नेवी ने आत्मनिर्भर भारत की शुरुआत जल्दी कर दी थी लेकिन हमने यानी वायुसेना ने थोड़ी देर से की क्योंकि आज जितने भी जहाज नौसेना के लिए बनाए जा रहे हैं, वे सभी स्वदेशी हैं. ऐसे में भारतीय वायुसेना भी मिलिट्री एविएशन में आत्मनिर्भर बनने की कोशिश करेगी लेकिन ये कैसे हो पाएगा, ये एक मुश्किल सवाल है.
फ्रंटलाइन फाइटर जेट सारे विदेशी
वायुसेना के जितने भी फ्रंटलाइन फाइटर जेट हैं, वे सभी विदेशी हैं. मिग-29 से लेकर सुखोई और मिराज, जगुआर से लेकर रफाल, सभी विदेशों से खरीदे गए हैं. इनसे पहले भी जो लड़ाकू विमान भारतीय वायुसेना ऑपरेट करती थी, वे सभी विदेशी थे. सबसे ज्यादा फाइटर जेट भारतीय वायुसेना ने जो ऑपरेट किए हैं, मिग-सीरिज के, वे सभी रशियन थे. मिग-21 और बाद में रूस के सुखोई जरूर भारत में बनाए गए, लेकिन उनकी टेक्नोलॉजी रूस ने कभी भारत को ट्रांसफर नहीं की.
ऐसे में माना जा सकता है कि इन मिग-21 और सुखोई की महज असम्बलिंग भारत में होती थी, उससे ज्यादा कुछ नहीं. जगुआर और मिराज जैसे फाइटर जेट को वायुसेना ने 80 के दशक में फ्रांस जैसे देशों से खरीदे थे. वर्ष 2016 में भारतीय वायुसेना को जो 36 रफाल लड़ाकू विमान मिले थे, वे भी फ्रांस से खरीदे गए थे.
एलसीए तेजस का क्या हुआ
एक स्वदेशी लड़ाकू विमान है, लाइट कॉम्बेट एयरक्राफ्ट- एलसीए तेजस जो देश में बना था, उसके प्रोडेक्शन में खासी अड़चनें आ गई हैं. हालांकि एलसीए तेजस की 2 स्क्वाड्रन जिसमें 40 विमान हैं, वायुसेना उन्हें ऑपरेट करती है, इनमें से महज एक को पाकिस्तान से सटी सीमा पर तैनात किया गया है. एक स्क्वाड्रन, तमिलनाडु के सूलुर में तैनात रहती है. एलसीए तेजस को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) एक डिफेंस पीएसयू ने तैयार किया है लेकिन इसके एडवांस वर्जन को बनाने के लिए एचएएल को अमेरिकी की जीई-एविएशन पर F-404 इंजन के लिए निर्भर होना पड़ रहा है.
भारत अभी भी एविएशन इंजन बनाने को लेकर जूझ रहा है. इसी हफ्ते डीआरडीओ ने एक टर्बो जेट इंजन जरूर बनाया है लेकिन इसका Thrurst 350 किलो है जबकि एक लड़ाकू विमान के लिए डेढ़ हजार किलो से 10 हजार किलो तक के Thrust की जरूरत है. अमेरिकी कंपनी जीई भी इंजन सप्लाई करने में देरी कर रही है. हालांकि, कंपनी कभी रूस-यूक्रेन युद्ध और कभी मिडिल-ईस्ट के हालात को लेकर सप्लाई चेन बाधित होने का बहाना बना रही है लेकिन माना जा रहा है कि हाल के सालों में भारत और अमेरिका के संबंधों में आई तल्खी के चलते इंजन सप्लाई में देरी हो रही है.
मालवाहक विमान भी विदेशी
लड़ाकू विमानों के बाद अगर भारतीय वायुसेना के ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट यानी मालवाहक विमानों के बारे में बात करें तो वे भी पिछले साल तक सभी विदेशी थे. लंबे समय तक भारतीय वायुसेना ने रूस के आईएल-76 और एएन-32 विमानों का इस्तेमाल किया. उसके बाद अमेरिका से लिए सी-17 ग्लोबमास्टर और सी-130जे सुपर हरक्युलिस इस्तेमाल कर रही है. वर्ष 2022 में भारत ने स्पेन की एयरबस के साथ मिलकर गुजरात के बड़ोदरा में सी-295 मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट का प्लांट लगाया. पिछले महीने यहां से पहला स्वदेशी मालवाहक विमान बनाकर वायुसेना को सौंपा गया है.
बस हेलीकॉप्टर ही स्वदेशी
हेलीकॉप्टर जरूर भारतीय वायुसेना बड़ी संख्या में स्वदेशी इस्तेमाल करती है. फिर चाहे वे चीता-चेतक हो या फिर ALH-ध्रुव लेकिन हेवी लिफ्ट हेलीकॉप्टर के लिए अभी भी भारत, रूस और अमेरिका जैसे देशों पर निर्भर है. रूस के Mi-17 कई दशक से भारतीय वायुसेना इस्तेमाल कर रही है. वर्ष 2019 में भारत ने अमेरिकी कंपनी बोइंग से 15 चिनूक हेलीकॉप्टर खरीदे थे. अटैक हेलीकॉप्टर अपाचे भी भारत ने अमेरिका से खरीदे हैं. हालांकि HAL ने स्वदेशी अटैक हेलीकॉप्टर, LCH-प्रचंड बनाकर वायुसेना को सौंप दिया है.
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