एलपीजी कनेक्शन काफी नहीं, ग्रामीण रसोई में अब भी चूल्हा क्यों जल रहा है? – aajtak.in

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भारत में स्वच्छ ईंधन की पहुंच बढ़ाने के लिए पिछले कुछ वर्षों में बड़े प्रयास हुए हैं. प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के जरिए करोड़ों परिवारों को एलपीजी कनेक्शन दिए गए. आंकड़ों में यह प्रगति बहुत अच्छी दिखती है. लेकिन वास्तविकता इससे अलग है. काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर यानी CEEW के तीन नए अध्ययनों ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है. क्या सिर्फ कनेक्शन देना काफी है या असली सफलता तब मानी जाए जब रसोई में धुआं पूरी तरह गायब हो जाए?
इन अध्ययनों में छह राज्यों के 2200 से ज्यादा ग्रामीण परिवारों, शहरों की अनियमित कॉलोनियों और झुग्गी बस्तियों के 1100 से अधिक परिवारों तथा 10 शहरों के 1000 से ज्यादा प्रवासी श्रमिकों को शामिल किया गया. 
नतीजे साफ बताते हैं कि एलपीजी कनेक्शन की संख्या भले बढ़ गई हो लेकिन कई घरों में अभी भी लकड़ी और अन्य ठोस ईंधन का इस्तेमाल जारी है. खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति चिंताजनक है.
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ग्रामीण परिवारों में मिश्रित इस्तेमाल की कहानी
अध्ययन के अनुसार ग्रामीण परिवारों में 73% एलपीजी का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन इनमें से महज 23% परिवार खाना पकाने के लिए पूरी तरह एलपीजी पर निर्भर हैं. करीब आधे परिवार अब भी मुख्य रूप से लकड़ी जला रहे हैं. इसका मतलब साफ है कि कई घरों में एलपीजी सिलेंडर तो है लेकिन उसका नियमित इस्तेमाल नहीं हो पा रहा. लोग कभी एलपीजी तो कभी लकड़ी का सहारा लेते हैं. इसे स्टैक्ड फ्यूल यूज कहा जाता है. यानी एक साथ कई ईंधनों का इस्तेमाल.
Three in four rural households in India cooked with LPG in the last three months. So why is the chulha still lit in many of these kitchens?

🧵 Five charts from three new CEEW studies, covering over 2,200 rural households across six states, over 1,100 households in urban informal… pic.twitter.com/hER6oBta8v
यह स्थिति इसलिए बनी हुई है क्योंकि रिफिल महंगा पड़ता है. घर तक सिलेंडर पहुंचाने की व्यवस्था कमजोर है. एलपीजी इस्तेमाल करने वाले ग्रामीण परिवारों में सिर्फ 47% को सिलेंडर घर पर मिल रहा है. बाकी को खुद जाकर लेना पड़ता है या अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है. 
दूरदराज के गांवों में यह समस्या और गंभीर है. नतीजतन परिवार पारंपरिक ईंधन की ओर लौट जाते हैं. लकड़ी आसानी से उपलब्ध है और मुफ्त या सस्ती लगती है भले ही इससे स्वास्थ्य को नुकसान हो. शहरी अनियमित कॉलोनियों और झुग्गी बस्तियों में तस्वीर थोड़ी बेहतर है. यहां करीब 70% परिवार पूरी तरह एलपीजी पर निर्भर हैं. लेकिन यहां भी औपचारिक कनेक्शन की कमी बड़ी बाधा है.
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दस्तावेजों के अभाव में कई परिवार कनेक्शन नहीं ले पाते. बिना औपचारिक कनेक्शन वाले 31% परिवारों ने बताया कि पते के प्रमाण न होने के कारण उन्हें मना कर दिया गया. ऐसे में वे अनौपचारिक बाजार से सिलेंडर खरीदते हैं जो महंगा पड़ता है. सरकारी कीमत से ज्यादा देना पड़ता है.
प्रवासी श्रमिकों की सबसे कमजोर स्थिति
तीनों समूहों में प्रवासी श्रमिक सबसे ज्यादा प्रभावित दिखे. 74% प्रवासी श्रमिक एलपीजी का इस्तेमाल करते हैं लेकिन इनमें से 79% के पास वैध कनेक्शन नहीं है. उज्ज्वला योजना से जुड़े प्रवासी श्रमिक महज चार प्रतिशत से भी कम हैं. 2021 में नियमों में बदलाव कर स्व-घोषणा के जरिए पहुंच आसान बनाने की कोशिश हुई थी लेकिन जागरूकता और दस्तावेजी बाधाओं के कारण लाभ नहीं पहुंचा.
प्रवासी श्रमिकों का ईंधन चुनाव उनके रहने की जगह से भी जुड़ा है. फुटपाथ या खुले स्थानों में रहने वाले करीब 70% प्रतिशत श्रमिक सिर्फ लकड़ी या कंडे जैसे ठोस ईंधन पर निर्भर हैं. किराये के मकान में रहने वालों में यह आंकड़ा सिर्फ 11 प्रतिशत है. 
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इससे साफ है कि स्थायी आवास और पहचान की कमी स्वच्छ ईंधन अपनाने में बाधा बन रही है. अनौपचारिक बाजार से खरीदने वाले प्रवासी श्रमिकों को औसतन 71 रुपये प्रति किलो गैस के लिए चुकाना पड़ता है जबकि औपचारिक कीमत करीब 59 रुपये प्रति किलो है. यानी 20 प्रतिशत अतिरिक्त खर्च.
सीईईडब्ल्यू के तीन अध्ययनों से पता चलता है कि एलपीजी कनेक्शन बढ़ने के बावजूद ग्रामीण भारत की रसोइयां अब भी धुएं से मुक्त नहीं हुई हैं। छह राज्यों के 2,200 से अधिक ग्रामीण परिवारों के सर्वे में 73 फीसदी द्वारा एलपीजी उपयोग की पुष्टि हुई, लेकिन केवल 23 फीसदी ही पूरी तरह इसी पर… pic.twitter.com/dm6IXCNrwX
कीमत सबसे बड़ा फैसला लेने वाला कारक
अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण खोज यह है कि लोग स्वच्छ ईंधन अपनाना चाहते हैं लेकिन कीमत उनके फैसले को नियंत्रित करती है. सर्वेक्षण में शामिल कम से कम 80 प्रतिशत परिवारों ने कहा कि अगर 14.2 किलोग्राम का सिलेंडर 400 रुपये में मिले तो वे पूरी तरह एलपीजी अपना लेंगे. 
तीनों समूहों में भुगतान करने की औसत स्वीकार्य कीमत करीब 500 रुपये रही. मौजूदा सब्सिडी के बाद प्रभावी कीमत करीब 642 रुपये है. इससे साफ है कि थोड़ी और राहत मिलने पर इस्तेमाल तेजी से बढ़ सकता है. सीईईडब्ल्यू की फेलो प्रार्थना बोरा का कहना है कि स्वच्छ हवा को खाना पकाने के तरीके, काम करने की स्थिति और रहने की जगह से अलग नहीं देखा जा सकता. एलपीजी कनेक्शन सिर्फ पहला कदम है. 
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अगर परिवार नियमित रिफिल नहीं खरीद सकते, प्रवासी श्रमिक योजना से अनजान हैं या गांवों तक सिलेंडर भरोसेमंद तरीके से नहीं पहुंचता तो लोग चूल्हे का साथ नहीं छोड़ेंगे. फेलो अभिषेक कर का भी मत है कि नीति को अब कनेक्शन की संख्या से आगे बढ़कर नियमित इस्तेमाल पर फोकस करना होगा. 
ग्रामीण क्षेत्रों में रिफिल की कीमत और घर तक डिलीवरी अहम है. शहरों में दस्तावेजी बाधाएं दूर करनी होंगी और माइक्रो-पेमेंट जैसे विकल्प देने होंगे. प्रवासी श्रमिकों के लिए अतिरिक्त सब्सिडी और जागरूकता अभियान जरूरी हैं.
समाधान की दिशा में सुझाव
सीईईडब्ल्यू ने अलग-अलग समूहों के लिए व्यावहारिक सुझाव दिए हैं. केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय को पीएमयूवाई के तहत सब्सिडी में करीब 200 रुपये प्रति सिलेंडर बढ़ाने पर विचार करने को कहा गया है ताकि कीमत 400 रुपये के आसपास आ सके.
तेल विपणन कंपनियों को नियोक्ताओं और ठेकेदारों के साथ मिलकर प्रवासी श्रमिकों के लिए विशेष नामांकन अभियान चलाना चाहिए. ज्यादा प्रवासी आबादी वाले इलाकों में एलपीजी कियोस्क शुरू किए जा सकते हैं जहां छोटी मात्रा में रिफिल संभव हो.
ग्रामीण क्षेत्रों में घर-घर डिलीवरी सुधारने के लिए दूरदराज के क्षेत्रों में काम करने वाले वितरकों को अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया जाए. शहरी स्थानीय निकायों और आवास विभागों को झुग्गी बस्तियों के परिवारों को औपचारिक कनेक्शन दिलाने को प्राथमिकता देनी चाहिए. दस्तावेजी आवश्यकताओं को सरल बनाना होगा.
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असली सफलता का पैमाना क्या होना चाहिए?
अध्ययन का संदेश बिल्कुल साफ है. स्वच्छ ईंधन की सफलता कनेक्शन की संख्या से नहीं बल्कि इस बात से मापी जानी चाहिए कि कितनी रसोइयों में वास्तव में धुएं की जगह साफ हवा ने ली है. सिलेंडर घर के कोने में रखा रह जाना काफी नहीं. जब तक वह नियमित इस्तेमाल में न आए तब तक स्वास्थ्य लाभ नहीं मिलेंगे. 
इनडोर एयर पॉल्यूशन से महिलाओं और बच्चों को सबसे ज्यादा नुकसान होता है. सांस की बीमारियां, आंखों की समस्याएं और अन्य स्वास्थ्य जोखिम बने रहते हैं. भारत ने एलपीजी पहुंच बढ़ाने में उल्लेखनीय प्रगति की है. लेकिन आखिरी मील की चुनौतियां अभी बाकी हैं. कीमत को किफायती बनाना, डिलीवरी मजबूत करना, दस्तावेजी बाधाएं दूर करना और जागरूकता फैलाना जरूरी है. 
प्रवासी श्रमिकों जैसे कमजोर समूहों पर विशेष ध्यान देना होगा. तभी स्वच्छ ईंधन का सपना सच में साकार होगा. गांव की रसोई से लेकर शहर के अस्थाई ठिकाने तक जब एलपीजी आसानी से उपलब्ध और इस्तेमाल योग्य होगी तभी हम कह सकेंगे कि धुआं गायब हो गया है. नीति निर्माताओं को आंकड़ों से आगे बढ़कर जमीनी हकीकत पर गौर करना चाहिए. तभी स्वच्छ ऊर्जा का लक्ष्य पूरा हो सकेगा.
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