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Urea Scam: देश में किसान खेती के लिए सस्ती खाद पाने के लिए घंटों लाइन में खड़े रहते हैं. सरकार किसानों को राहत देने के लिए यूरिया पर भारी सब्सिडी देती है ताकि उन्हें कम कीमत में खाद मिल सके. लेकिन अब सामने आया है कि किसानों के लिए आने वाली यही सरकारी यूरिया कुछ प्लाईवुड और ग्लू बनाने वाली फैक्ट्रियों तक पहुंच रही है. आरोप है कि बिचौलियों और कुछ फैक्ट्री मालिकों की मदद से इस खाद की कालाबाजारी हो रही है. इससे किसानों को समय पर खाद नहीं मिल रही और सरकार को भी करोड़ों रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है. इसका पर्दाफाश ZEE NEWS के खुफिया कैमरे में हुआ है.
जांच में सामने आया कि प्लाईवुड और MDF बोर्ड बनाने के लिए ग्लू यानी रेजिन का इस्तेमाल किया जाता है. इस ग्लू को बनाने में यूरिया की जरूरत पड़ती है. नियमों के मुताबिक फैक्ट्रियों को Technical Grade यूरिया इस्तेमाल करना चाहिए, जिसकी कीमत 80 से 100 रुपये प्रति किलो तक होती है. लेकिन आरोप है कि कई फैक्ट्रियां किसानों वाला सब्सिडी यूरिया इस्तेमाल कर रही हैं, जिसकी कीमत सिर्फ 6 रुपये प्रति किलो पड़ती है. इससे कंपनियों का खर्च कम हो जाता है और उन्हें बड़ा फायदा मिलता है. यही वजह है कि सरकारी यूरिया की चोरी का नेटवर्क तेजी से फैल रहा है.
ZEE NEWS की रिपोर्ट के मुताबिक जांच टीम ने हरियाणा के यमुनानगर में कई फैक्ट्रियों का दौरा किया. यहां खुफिया कैमरे में कई चौंकाने वाली बातें रिकॉर्ड हुईं. कुछ लोगों ने कैमरे पर माना कि फैक्ट्रियों में ग्लू बनाने का काम होता है और उसमें यूरिया का इस्तेमाल किया जाता है. रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि कई जगहों पर अधिकारियों और फैक्ट्री मालिकों की मिलीभगत से यह काम चल रहा है. कुछ लोगों ने यहां तक कहा कि “सेटिंग” होने की वजह से जांच या रेड का डर नहीं रहता. इससे पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े हो रहे हैं.
कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में पुलिस ने तीन ट्रकों से 1575 बैग सरकारी यूरिया पकड़ी थी. आरोप था कि यह खाद कालाबाजारी के लिए ले जाई जा रही थी. जांच में शक जताया गया कि यह यूरिया किसी फैक्ट्री में इस्तेमाल होने वाली थी. रिपोर्ट में कहा गया कि बिचौलिये किसानों के लिए आने वाली खाद को बड़े स्तर पर खरीदकर ट्रकों के जरिए फैक्ट्रियों तक पहुंचाते हैं. संसद की स्टैंडिंग कमेटी से जुड़े नेताओं ने भी माना कि कई जगह सिंडिकेट बनाकर इस तरह का खेल चलाया जा रहा है. इससे किसानों को मिलने वाली सरकारी राहत गलत हाथों तक पहुंच रही है.
जांच के दौरान कुछ ऐसे बिल भी सामने आए, जिनमें बड़ी मात्रा में रेजिन यानी ग्लू की खरीद दिखाई गई. रिपोर्ट में दावा किया गया कि कई नामी प्लाईवुड कंपनियां बड़े स्तर पर ग्लू खरीद रही हैं. सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इस ग्लू को बनाने में किस तरह का यूरिया इस्तेमाल हो रहा है. किसानों का कहना है कि अगर इसी तरह सरकारी खाद फैक्ट्रियों तक जाती रही, तो खेती करना और मुश्किल हो जाएगा. अब सभी की नजर इस बात पर है कि सरकार और प्रशासन इस पूरे मामले में क्या कदम उठाते हैं और किसानों के हक की रक्षा कैसे की जाएगी.
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