भास्कर खास
10 साल पहले मुझे कनाडा, इंग्लैंड और अमेरिका में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए जिम्मेदारी मिली थी। मैं छोटी कलम हूं, मुझसे बड़े-बड़े साहित्यकार पहले से ही इस काम में लगे हुए हैं। हिंदी को दुनिया भर में फैलाने का काम विदेशों में होने वाले कवि सम्मेलनों के कारण ज्यादा सटीक तरीके से हुआ है। इन तीन देशों में अब यह स्थिति है कि भारतीय मूल के जो लोग इन देशों में बसे हैं वह अपने बच्चों को वहां हिंदी लिखना पढ़ना सिखा रहे हैं। यह कहना है प्रसिद्ध कवयित्री डॉ. अनु सपन का। वे रविवार को अजमेर में एक साहित्य कार्यक्रम में शरीक होने आईं थी। भास्कर से संवाद के दौरान उन्होंने साहित्य, हिंदी कवि सम्मेलनों की स्थिति सहित अन्य पहलुओं पर खुलकर बात की।
ज्यादातर कवि सम्मेलनों में चरमरा रही है भाषाई मर्यादा
शिक्षक से दुनिया की जानी पहचानी कवयित्री बनने तक का सफर: इस पर उनका कहना था कि पॉकेट मनी के लिए स्कूल में पढ़ाती थी। कुछ साल पढ़ाया, फिर मंचों पर व्यस्तता के चलते जॉब छोड़ दी।
हिंदी की दुर्दशा कवि सम्मेलनों में सबसे ज्यादा हो रही: डॉ. अनु सपन कहती हैं कि यह सच है कि ज्यादातर कवि सम्मेलनों में भाषाई मर्यादा कम होने लगी है। लेकिन आज भी अच्छे कवि सम्मेलन हो रहे हैं। कई बार अच्छे कवि सम्मेलनों में भी ऐसे लोगों को बुला लिया जाता है जो हिंदी का मर्म ही नहीं समझ पाते। ऐसे लोगों को बुलाएं जो हिंदी को, कविता को समझते हो। कवि सम्मेलनों में हास्य के नाम पर सवाल जवाब शुरू कर दिए गए। इससे महिला के मान सम्मान का भी ख्याल नहीं रखा जाता। यह चल रहा है, ऐसा नहीं होना चाहिए। ऐसे कवि बुलाए जाने चाहिए जिनमें टैलेंट हो। यह भी सच है कि टैलेंट होगा तो वह कभी न कभी बाहर आ ही जाएगी। कविता, गीत, गजल आदि सिखाए नहीं जा सकते यह नैमत है जो हर किसी को नहीं मिलती। गॉड गिफ्ट है जिसे मिला है वह इसका उपयोग करता ही है।
क्या साहित्यकार अभी भी समाज का आइना है?: बिलकुल है, हां यह कहा जा सकता है कि इस आइने में थोड़े बहुत स्क्रेच लग गए हैं। साहित्यकार को कवि को लेखक को किसी राजनीतिक पार्टी का दुशाला नहीं ओढ़ना चाहिए, निष्ठा और ईमानदारी से साहित्य रचना करने वाला ही असल आइना हो सकता है।
अनु सपन
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