किर्गिस्तान में कूटनीतिक कामयाबी – Hindustan

सोमवार को यह शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) नहीं, दिल्ली सहयोग संगठन था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी कुशल कूटनीति और शांति-प्रयासों के जरिये माहौल को भारत के पक्ष में बना दिया। उनके प्रयास उन दो संघर्षरत क्षेत्रों के संदर्भ में थे, जिनसे दुनिया भर में व्यापक पैमाने पर युद्ध बढ़ने का खतरा बना हुआ है।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के साथ बैठक भारतीय प्रधानमंत्री के एजेंडे में सबसे ऊपर थी। इस अहम मुलाकात के जरिये प्रधानमंत्री मोदी ने मक्का समझौते (पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुआ रक्षा समझौता) पर हस्ताक्षर करने वाले देशों को कड़ा संदेश दिया कि एक-दूसरे की रक्षा करने या संघर्षों के दौरान सैन्य शक्ति साझा करने का वायदा करने वाले गठबंधन असल में वैश्विक सुरक्षा की काट हैं और विस्फोट के कगार पर खड़ी इस दुनिया में शांति के लिए बनी साझेदारियां ही कारगर विकल्प हैं।
भारत ने एक ऐसे देश के साथ लचीला व व्यावहारिक रुख अपनाया, जो यह समझता है कि असली ताकत आत्मनिर्भरता से आती है, जबकि ‘मक्का समझौता’ जैसे करार बड़ी ताकतों से उधार ली गई ताकत पर टिके होते हैं और वे फिल्मी योद्धाओं जैसे सतही अंदाज में निभाए जाते हैं। किर्गिस्तान में भारत और ईरान के बीच खास तालमेल दिखा, वह भी मक्का समझौते और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस धमकी के बीच, जिसमें उन्होंने कड़े प्रतिबंध लगाकर तेहरान को खत्म करने की बात कही थी, क्योंकि अमेरिकी बम और मिसाइलें ईरान में नाकाम साबित हुई हैं।
ईरान ने भारत को शांति के लिए दखल देने का न्योता दिया और दोनों देशों ने चाबहार बंदरगाह की अहम परियोजना को फिर से शुरू करने पर सहमति जताई। भारत ने व्यापार पर बात की और अपनी यह मंशा दोहराई कि होर्मुज जलमार्ग से जहाजों की आवाजाही सुरक्षित और बेरोक-टोक होनी चाहिए।
भारत और पाकिस्तान के बीच के अंतर को ईरान बखूबी समझता है। वह जानता है कि अगर नई दिल्ली किसी मुद्दे पर तेहरान से अलग राय रखती है, तो ऐसा भारत के राष्ट्रीय हित की वजह से होता है। जबकि, पाकिस्तान जब ईरान से अलग रुख अपनाता है, तो ऐसा करने का आदेश उसे अपने आकाओं से मिला होता है। सच यही है कि पाकिस्तान एक निर्भर देश है, जबकि भारत खुदमुख्तार!
भारत और ईरान अपनी अस्मिता व आत्मविश्वास को लेकर गहरी समझ रखने वाले देश हैं, जिनका अपना-अपना समृद्ध सभ्यतागत इतिहास है। दोनों का यही मानना है कि द्विपक्षीय रिश्ते किसी बहुपक्षीय दिखावे से कहीं अधिक मजबूत होते हैं। बैठक के बाद ईरान की तरफ से कहा गया कि भारत शांति और सुरक्षा का जरिया बन सकता है, खासकर तब, जब बकौल तेहरान, वाशिंगटन ने ‘युद्ध, असुरक्षा और मर्जी थोपने का रास्ता चुना है’।
गौतम बुद्ध और महात्मा गांधी की धरती के नेता के तौर पर प्रधानमंत्री मोदी ने भारत के दोस्त रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को भी यही संदेश दिया कि युद्ध कोई समाधान नहीं है। भारत वही बात कहता है, जिस पर वह खुद अमल करता है। गौरतलब है, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के रूप में बर्बर हमले का जवाब भारत ने हमेशा सिलसिलेवार, मजबूत और संयमित तौर पर दिया है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भी भारत ने आतंकी ठिकानों और आतंकवादियों को पनाह देने वाले सैन्य अड्डों को ही निशाना बनाया। इसमें किसी आम नागरिक को नुकसान नहीं पहुंचाया गया, क्योंकि पाकिस्तानी तानाशाहों के गुनाहों की सजा वहां के आम नागरिकों को नहीं दी जा सकती।
पाकिस्तान को सामने बिठाकर सच सुनाना ही था। बेशक, सच्चाई से उसने अपने कान बंद कर रखे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने शिखर बैठक में आतंकवाद की चर्चा करते हुए साफ-साफ कहा कि दोहरे मापदंडों के लिए कोई जगह नहीं है। उन्होंने आतंकवाद के पूरे ‘इको-सिस्टम’ को खत्म करने की जरूरत बताई, ताकि आतंकियों को न सुरक्षित ठिकाना मिल सके और न इमदाद। संभवत: इसी खुन्नस में मंगलवार को जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री कार्यालय ने एससीओ बैठक का ग्रुप फोटो एक्स हैंडल से जारी किया, तो उसमें भारतीय प्रधानमंत्री को हटा दिया। विवाद के बाद पूरी तस्वीर जारी की गई।
हालांकि, भारत और चीन का रिश्ता भी कभी-कभी तनावपूर्ण हो जाता है, लेकिन यह बहुत हद तक सीमा से जुड़ा हुआ है, खासकर 1962 के बाद से। अच्छी बात है कि सीमावर्ती इलाकों में अस्थिरता के बावजूद हमने यही तय कर रखा है कि आपसी विवाद का निपटारा जंग से नहीं, बातचीत से होगा। एससीओ बैठक से ठीक पहले भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकर अजीत डोभाल बीजिंग गए थे, जहां उन्होंने लंबी बैठकें कीं। चीन का सत्ता-सदन डोभाल को खूब पसंद करता है, क्योंकि वह सीधी और खरी बोलना पसंद करते हैं।
उनकी मुलाकात का यह असर हुआ कि वहां के सुप्रीम कमांडर ने भारत-विरोधी रुख रखने वाले एक जनरल को देश की शीर्ष राजनीतिक सलाहकर संस्था और अन्य प्रमुख पदों से हटा दिया। यह सिर्फ एससीओ की सफलता के लिए नहीं, बल्कि ब्रिक्स में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के आने की कूटनीतिक तैयारी जान पड़ती है। किर्गिस्तान में मोदी और जिनपिंग ने अलग से मुलाकात करने की कोई खास जरूरत नहीं समझी, क्योंकि ब्रिक्स में व्यापार, अमेरिकी प्रतिबंध, मुद्रा सहित कई मुद्दों पर उनमें अच्छी और लंबी बातचीत होने की उम्मीद है। माना यही जा रहा है कि चीन के साथ जिस तरह के स्थिर और उत्पादक संबंध बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं, वह अनवरत जारी रहेगा।
प्रधानमंत्री मोदी ने किर्गिस्तान में उस भूमिका के निर्माण में सफलता हासिल की, जिसकी बुनियाद पर वह सितंबर के मध्य में दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता करेंगे। वह ब्रिक्स को स्थिरता और प्रगति के एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में विकसित करना चाहते हैं, खास तौर पर ऐसे समय में, जब संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता लगातार कम हो रही है और युद्ध के कारण आर्थिक उथल-पुथल बढ़ गई है। उल्लेखनीय है कि यह अराजकता 21वीं सदी में जन्मी पीढ़ी के भविष्य को खतरे में डाल सकती है।
प्रधानमंत्री कहते हैं, युद्ध में बिताया गया हर दिन मानवता को पीछे धकेलता है। वाकई, दुनिया के सामने आज यही सबसे बड़ी चुनौती है।
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