विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2023-2025 के बीच विदेशों में 800 से अधिक भारतीय प्रवासी मजदूरों की मौत हुई है, जिनमें से 55% खाड़ी देशों में हुईं …और पढ़ें
खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीयो की दर्दनाक स्थिति।
2023-2025 में विदेशों में 800 से अधिक भारतीय मजदूरों की मौत।
खाड़ी देशों में 55% मौतें, सऊदी अरब और यूएई में सर्वाधिक।
सुरक्षा अनदेखी, खराब माहौल, वेतन न मिलना मुख्य कारण।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। विदेशों में काम करने गए भारतीय नागरिकों के जीवन से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आ रही है। भारतीय विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2023 से 2025 के बीच विदेशों में काम करते समय 800 से ज्यादा भारतीय प्रवासियों की मौत हो चुकी है।
चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 55% मौतें खाड़ी देशों में हुईं, जहां औसतन हर हफ्ते लगभग 3 मजदूरों की जान गई। पिछले महीने कतर में हुए एक धमाके में 12 भारतीयों की मौत के बाद इन हादसों और सुरक्षा में लापरवाही को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ गई है।
बता दें कि देशों की सूची में सऊदी अरब सबसे ऊपर है, जहां 3 साल में सबसे ज्यादा 182 मौतें दर्ज की गईं, यानी हर हफ्ते एक से ज्यादा भारतीय मजदूरों को अपनी जान गंवानी पड़ी। इसके बाद संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का नंबर आता है, जहां 128 मौतें हुईं। इसके अलावा, खाड़ी देशों से ही आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले भी सामने आए हैं, जो वहां काम करने वाले प्रवासी मजदूरों के कड़े संघर्षों को बयां करते हैं।
तेलंगाना एनआरआई माइग्रेंट्स एसोसिएशन और जानकारों के अनुसार, इन मौतों के पीछे कई बड़े कारण जिम्मेदार हैं। इसमें प्रमुख रूप से सुरक्षा नियमों की अनदेखी को माना जा रहा है। इस बात को ऐसे समझिए कि मजदूरों द्वारा सुरक्षा उपकरणों, जैसे हेलमेट, जूते और दस्ताने का इस्तेमाल न करना या कंपनियों द्वारा सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन न कराना। कई बार मजदूर खुद भी जोखिमों से अनजान रहते हैं।
इसके अलावा कई मजदूर 45 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान में काम करते हैं और फिर 20 डिग्री सेल्सियस तक ठंडे कमरों में लौटते हैं। शरीर पर पड़ने वाले इस अचानक 20-25 डिग्री के तापमान के अंतर से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो जाती हैं। ज्यादातर भारतीय खाड़ी देशों में कंस्ट्रक्शन, रिटेल, वेयरहाउस और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में काम करते हैं, जहां जोखिम बहुत ज्यादा होता है।
इसके अलावा एसोसिएशन के मुताबिक, मजदूरों में आत्महत्या के मामलों के पीछे खराब रहन-सहन जिम्मेदार है। इस बात को ऐसे समझिए कि मजदूरों को बेहद तंग जगहों पर रहना पड़ता है और खाने की क्वालिटी भी अच्छी नहीं होती।
इसके अलावा मजदूर दिन में 12-12 घंटे काम करते हैं, लेकिन कई बार उन्हें 3 महीने तक वेतन नहीं मिलता। सैलरी मिलने पर भी मनमाने तरीके से पैसे काट लिए जाते हैं, जिससे उनका मानसिक तनाव और बढ़ जाता है।
इतना ही नहीं कई नियोक्ता कंपनियां काम के दौरान हुई मौतों को प्राकृतिक मौत (जैसे दिल का दौरा) बताकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। बहुत कम कंपनियां बीमा के जरिए मुआवजा देती हैं।
इन आंकड़ों को देखते हुए विदेश मंत्रालय (MEA) का कहना है कि सरकार विदेश में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा और भलाई को सबसे ऊपर रखती है। नई दिल्ली के साथ-साथ दुबई, रियाद और जेद्दा जैसे शहरों में ‘प्रवासी भारतीय सहायता केंद्र’ बनाए गए हैं।
जहां भारतीय मिशन लगातार लेबर विंग के जरिए काम कर रहे हैं। दूर-दराज के इलाकों में जाकर ओपन हाउस और कैंप लगाए जाते हैं ताकि मजदूरों की समस्याएं सुनी जा सकें। इसके साथ ही महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केवल सरकारी एजेंसियों को ही ‘ई-माइग्रेट’ पोर्टल के जरिए ईसीआर (ECR) पासपोर्ट वाली महिलाओं को खाड़ी देशों में भेजने की अनुमति दी गई है।