भारत का इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम अब गन्ने से हटकर मक्का और अन्य अनाजों पर केंद्रित हो रहा है, जिसमें जून 2026 तक कुल आपूर्ति का 67% अनाज आधारित है। …और पढ़ें
AI द्वारा बनाई गई सांकेतिक तस्वीर।
इथेनॉल उत्पादन में मक्का की हिस्सेदारी 35% तक पहुंची।
जून 2026 तक 717 करोड़ लीटर इथेनॉल आपूर्ति हुई।
मक्का आधारित इथेनॉल किसानों के लिए अधिक लाभकारी।
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। भारत का इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम अब गन्ना आधारित माडल से निकलकर मक्का और अन्य अनाजों की ओर तेजी से बढ़ने लगा है। जून 2026 तक तेल विपणन कंपनियों को 717 करोड़ लीटर इथेनॉल की आपूर्ति हुई है। इसमें 67 प्रतिशत हिस्सा अनाज आधारित और गन्ना की हिस्सेदारी 33 प्रतिशत है। अकेले मक्का से 258 करोड़ लीटर इथेनॉल बनाया गया, जो सबसे बड़ी हिस्सेदारी है।
ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन के अनुसार 1,048 करोड़ लीटर इथेनॉल आपूर्ति का करार है, जिसके मुकाबले जून तक 717 करोड़ लीटर आपूर्ति हो चुकी है। यह लक्ष्य का 68 प्रतिशत है। कुल आपूर्ति में 480 करोड़ लीटर इथेनॉल अनाज आधारित है, जबकि गन्ना आधारित स्रोतों से 238 करोड़ लीटर मिला।
अनाज में मक्का से 258 करोड़ लीटर, एफसीआई के अतिरिक्त खाद्यान्न से 177 करोड़ लीटर, गन्ने के रस से 144 करोड़ लीटर, बी-हेवी मोलासेस से 82 करोड़ लीटर और क्षतिग्रस्त खाद्यान्न से 45 करोड़ लीटर इथेनॉल तैयार हुआ। यानी मक्का का योगदान गन्ने के रस और बी-हेवी मोलासेस के संयुक्त उत्पादन से भी अधिक है और कुल इथेनॉल उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी करीब 35 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
यह परिवर्तन वर्ष 2023 से तेज हुआ। कमजोर मानसून से गन्ना उत्पादन प्रभावित होने पर सरकार ने चीनी की घरेलू उपलब्धता बनाए रखने के लिए गन्ने के रस से इथेनॉल उत्पादन पर कुछ समय के लिए रोक लगा दी थी। इसी दौरान मक्का और टूटे चावल को बड़े पैमाने पर इथेनॉल के लिए उपलब्ध कराया गया। इसी दौरान कई डिस्टिलरियों ने अपनी इकाइयों को गन्ना से ग्रेन आधारित माडल में बदलना शुरू कर दिया।
मूल्य निर्धारण के जरिए भी बदलाव को बढ़ावा दिया गया। वर्तमान खरीद दरों में मक्का वाले इथेनॉल के लिए 71.86 रुपये प्रति लीटर, गन्ना आधारित के लिए 65.61 रुपये और चावल आधारित इथेनॉल के लिए 60.32 रुपये प्रति लीटर तय हैं। अधिक कीमत मिलने से मक्का किसानों के लिए मक्का लाभकारी बन रही है।
रणनीति केवल ई-20 लक्ष्य तक सीमित नहीं है। गन्ने की खेती में अधिक पानी लगता है, जबकि मक्का में कम। जलवायु परिवर्तन, भूजल संकट और अलनीनो जैसी परिस्थितियों में गन्ने पर अधिक निर्भरता जोखिम बढ़ाती है। दूसरी ओर, मक्का देश के कई क्षेत्रों में उगाया जाता है, जिससे इथेनॉल उत्पादन का दायरा बढ़ता है और पूरे वर्ष आपूर्ति बनाए रखना आसान होता है।
चीनी उद्योग के लिए राहत की बात है। कमजोर मानसून और चीनी की बढ़ती घरेलू मांग के बीच यदि इथेनॉल उत्पादन पूरी तरह गन्ने पर आधारित रहता तो चीनी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती थी। मक्का आधारित उत्पादन बढ़ने से दोनों क्षेत्रों के बीच संतुलन बन रहा है। किसानों के लिए नया बाजार तैयार हो रहा है। गांवों में प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा मिल रहा है।