जंतर-मंतर पर 'ताला', कैसा रहा है यहां धरना- प्रदर्शन का इतिहास – BBC

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क़रीब साढ़े तीन दशक से देश भर के आंदोलनों के लिए केंद्र रहा दिल्ली का जंतर-मंतर अब विरोध प्रदर्शन के लिए निर्धारित जगह नहीं रहा.
इसकी जगह सरकार ने तीन जगहें निर्धारित की हैं. ये हैं- रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली का सीबीडी मैदान.
सरकार का ये फ़ैसला ऐसे समय आया है जब कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति मांगने के लिए सोमवार को पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने का रुख़ किया था.
इससे पहले ही दिल्ली के पुलिस कमिश्नर की ओर से एक बयान जारी कर जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन के लिए निर्धारित जगह से हटा देने की सूचना दी गई.
हालांकि सीजेपी ने सरकार के ताज़ा फ़ैसले को अस्वीकार्य बताते हुए इसे 'लोगों के विरोध प्रदर्शन करने और शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने के मौलिक अधिकार पर हमला' करार दिया है.
सीजेपी के सौरव दास ने कहा है कि प्रदर्शन की अनुमति देने के लिए उसने दिल्ली पुलिस को 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया है.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े और मतदाता सूची में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान यानी एसआईआर को रद्द किए जाने की मांग को लेकर पिछले दो अक्तूबर से जंतर-मंतर छावनी बना हुआ है.
बीते 10 अक्तूबर को सीजेपी के प्रदर्शन के बाद यह सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि निर्धारित की गई जगह पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की इजाज़त मिलनी चाहिए.
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इससे पहले पेपर लीक मामले को लेकर तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को हटाए जाने को लेकर जंतर-मंतर पर भारी भीड़ जुटी थी और 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान बड़े पैमाने पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें और हिंसा हुई थी.
इस बार जब सीजेपी ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग को लेकर धरना प्रदर्शन का ऐलान किया और वामपंथी छात्र संगठनों और विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक ने दो से 10 अक्तूबर तक आंदोलन चलाने की बात कही थी, जिसके बाद जंतर मंतर को पूरी तरह बंद कर दिया गया.
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दिल्ली पुलिस ने राजधानी में विरोध प्रदर्शन करने के लिए नई गाइडलाइन जारी की है.
दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार की ओर से 11 अक्तूबर को जारी स्टैंडिंग ऑर्डर के अनुसार, "केंद्रीय गृह मंत्रालय ने विरोध प्रदर्शनों के लिए वैकल्पिक स्थानों की समीक्षा करने के लिए एक समिति गठित की थी. नई व्यवस्था समिति की सिफ़ारिशों के आधार पर लागू की गई है."
ताज़ा आदेश में कहा गया है कि समिति ने रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान को विरोध प्रदर्शन के लिए नई जगह अधिसूचित किए जाने की सिफ़ारिश की है.
इसमें कहा गया है, "इन तीनों स्थानों पर विरोध प्रदर्शन आयोजित करने के लिए विस्तृत और संशोधित मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) अलग से जारी की जाएगी. यह 28 अप्रैल 2022 को जारी पूर्व के स्टैंडिंग ऑर्डर संख्या L&O/48/22 में आंशिक संशोधन है."
ये तीनों स्थान दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में हैं. इनके तय होने से प्रदर्शन अब संसद के आसपास के केंद्रीय प्रशासनिक क्षेत्र से दूर होंगे. रामलीला मैदान दिल्ली के बीच है, जबकि बुराड़ी मैदान उत्तर-पश्चिमी दिल्ली और सीबीडी मैदान पूर्वी दिल्ली में है.
रामलीला मैदान जंतर-मंतर से करीब 3 किलोमीटर दूर है. इस वजह से यह अन्य दोनों स्थानों के मुकाबले जंतर-मंतर के अधिक क़रीब है. बुराड़ी मैदान जंतर-मंतर से लगभग 21 किलोमीटर दूर है, जबकि सीबीडी मैदान इससे 13 किलोमीटर दूर है.
रामलीला मैदान में राजनीतिक रैलियों और जन आंदोलनों का लंबा इतिहास रहा है. इनमें 1975 में जयप्रकाश नारायण की रैली और 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुआ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन शामिल हैं. जबकि बुराड़ी मैदान तब चर्चा में आया जब 2020 में किसान आंदोलन के दौरान सरकार की ओर से आंदोलनकारियों को वहां जाने के लिए कहा गया था.
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केंद्रीय गृह मंत्रालय के ताज़ा फ़ैसले को लेकर सीजेपी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है.
सीजेपी फ़ाउंडर अभिजीत दीपके ने इसे तानाशाही कदम बताया है और कहा है, "आज मोदी ने जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थल की सूची से हटा दिया. कल वे लोकतंत्र को ही सूची से हटा देंगे."
"तानाशाह की समस्या कभी विरोध प्रदर्शन की जगह नहीं थी. समस्या तो लोगों के विरोध करने के विचार से ही थी."
बीते कई दिनों से प्रदर्शन कर रही वामपंथी छात्र संगठन आइसा की नेता नेहा बोरा की टीम ने एक्स पर लिखा, "हम अपने जंतर-मंतर के लिए लड़ेंगे! यह सिर्फ़ एक जगह नहीं है, बल्कि लोगों की आवाज़ है. और हमारी आवाज़ को दबाया नहीं जा सकेगा!"
सीजेपी के सह संयोजक सौरव दास ने इसे अस्वीकार्य बताते हुए एक्स पर लिखा, "नरेंद्र मोदी जंतर-मंतर से क्यों डरे हुए हैं? जंतर-मंतर भारत के लोगों का है. क्या केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भारत के लोगों से सलाह-मशविरा किया? क्या किसी हितधारक से चर्चा की गई? क्या किसी संगठन से सलाह ली गई?"
"लिखकर ले लीजिए, जिस तरह वे लोगों के जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थानों की सूची से हटा रहे हैं, उसी तरह प्रधानमंत्री जल्द ही भारत से लोकतंत्र को भी हटा देंगे. यह कदम उसी दिशा में बढ़ाया गया है."
सौरव दास ने आगे लिखा, "हम इस मनमाने फ़ैसले को स्वीकार नहीं करते. यह लोगों के विरोध प्रदर्शन करने और शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने के मौलिक अधिकार पर हमला है. अब पूरा देश जंतर-मंतर बन रहा है!"
सीजेपी की लीगल सेल की प्रमुख रत्ना सिंह ने एक्स पर लिखा, "हर जगह जंतर-मंतर योजना! लोग जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने के लिए दिल्ली आते हैं, लेकिन सरकार जवाब में उसी जगह को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा देती है. पहले अनुमति लेने का खेल था. अब जब लोग अपनी आवाज उठाने के लिए जगह मांग रहे हैं, तो विरोध प्रदर्शन की जगह ही उनसे छीनी जा रही है."
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने एक्स पर लिखा, "यह साफ़ है कि सरकार विरोध प्रदर्शनों को दिल्ली के बाहरी इलाक़ों में भेजना चाहती है. वे बड़े प्रदर्शनों के लिए रामलीला मैदान में भी अनुमति नहीं देंगे. यह दुर्भावनापूर्ण और गैरक़ानूनी है."
"वे विरोध प्रदर्शन के लिए जगह तय नहीं कर सकते. शांतिपूर्ण तरीक़े से इकट्ठा होना और विरोध प्रदर्शन करना लोगों का मौलिक अधिकार है. सरकार लोगों को केवल 'निर्धारित स्थानों' तक सीमित नहीं कर सकती."
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वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन ने जंतर-मंतर के इतिहास पर बीबीसी के लिए एक लेख लिखा था. उसके मुताबिक़, 1960 के दशक के उत्तरार्ध से 1980 के दशक तक बोट क्लब भारत का विशाल लोकतांत्रिक आवाज़ का केंद्र था.
साल 1993 के बाद के दौर में बढ़ते राजनीतिक तनाव के बीच विरोध-प्रदर्शनों को राजपथ (अब कर्तव्य पथ) से हटाकर दूसरी जगह भेजना शुरू कर दिया गया और उसी समय जंतर-मंतर एक बीच का रास्ता बनकर उभरा. यह संसद भवन के पास था, लेकिन बहुत ज़्यादा पास भी नहीं; सबके सामने, लेकिन नियंत्रण में रहने लायक.
31 जनवरी 2003 के दिल्ली पुलिस के स्टैंडिंग ऑर्डर संख्या 309 का उल्लेख करते हुए केंद्र सरकार ने 2015 में लोकसभा को बताया था कि जंतर मंतर पर पाँच हजार से अधिक लोगों का जमावड़ा नहीं होना चाहिए और वहाँ प्रदर्शनकारियों के वाहन लाने की अनुमति नहीं है.
संसद मार्ग पुलिस थाने के अभिलेखों के आधार पर उनके अध्ययन में दर्ज़ है कि जनवरी 2006 से अगस्त 2010 के बीच जंतर मंतर पर कम से कम 13,118 धरने और 5,491 प्रदर्शन, रैलियाँ और जुलूस हुए.
अकेले 2010 के पहले आठ महीनों में करीब डेढ़ लाख लोगों ने विभिन्न प्रदर्शनों में भाग लिया और कानून के उल्लंघन के आरोप में 12 हजार से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया था.
जंतर मंतर कुछ आंदोलनों के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है, जैसे 1990 के दशक के नर्मदा बचाओ आंदोलन, 2011 के अन्ना हजारे आंदोलन, 2012 में निर्भया आंदोलन, 2015 में न रैंक, वन पेंशन की मांग वाला आंदोलन, 2017 में तमिलनाडु के किसानों का आंदोलन आदि.
इसके बाद अक्तूबर 2017 में ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने जंतर मंतर पर विरोध-प्रदर्शन रोकने और उन्हें रामलीला मैदान स्थानांतरित करने का आदेश दिया.
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा और 23 जुलाई 2018 को मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में कोर्ट ने शांतिपूर्ण सभा के संवैधानिक अधिकार और निवासियों के अधिकारों के बीच संतुलन पर बल दिया.
कोर्ट ने कहा कि लोकतांत्रिक राजधानी को निषेधाज्ञा के स्थायी किले में नहीं बदला जा सकता; लेकिन विरोध की स्वतंत्रता भी दूसरे नागरिकों के जीवन को अनिश्चितकाल के लिए नष्ट करने का लाइसेंस नहीं है.
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